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हमारे बारे में

क्या एक ऐसे मज़दूर वर्ग की ताक़तवर मीडिया के बारे में कल्पना की जा सकती है जो पूरे भारत के मज़दूर वर्ग की केवल ख़बरें ही न प्रकाशित करे बल्कि एक इलाक़े के आंदोलन की ख़बर को दूसरे इलाक़े के मज़दूरों तक पहुंचा कर एकता के धागे को और मज़बूत करे?

साल 2018 में जब वर्कर्स यूनिटी की संकल्पना की गई तो उसके पीछे ये एक मुख्य वजह थी। इस देश में मज़दूर वर्ग की आबादी अनुमानतः 46 करोड़ है, अगर मुख्य धारा की मीडिया उसके दुख, दर्द और आंदोलनों का संज्ञान नहीं ले रहा है तो इतनी बड़ी आबादी को अपनी खुद की मीडिया खड़ी करनी पड़ेगी।

इस देश की पत्रकारिता में आज़ादी से पहले से लेकर आज तक बहुत बड़े बदलाव होते आए हैं। अधिकांश अख़बारों, पत्रिकाओं, टीवी चैनलों ने श्रमिक मामलों को कवर करने वाले रिपोर्टर के पद पहले ही समाप्त कर दिए हैं।

और जो मौजूदा परिदृश्य है वो कुछ ऐसा है कि ज़मीनी पत्रकारिता अब टेलीविज़न के स्टूडियो में मारकाट वाली बहसों में तब्दील हो कर गया है। वही ख़बर है जो प्राइम टाइम की बहस बने। इस तरह ख़बर और मुद्दे भी अब स्टूडियो में तय होने लगे हैं।

डिज़िटल मीडिया के ज़माने में ध्यान सिर्फ वायरल ख़बरों पर केंद्रित हो चुका है। ऐसे में ज़मीनी आंदोलनों, मज़दूर वर्ग के बारे में तथ्यात्मक रिपोर्टिंग और खोजी पत्रकारिता का बचा खुचा मौका भी जा चुका है।

निजीकरण और वैश्विकरण के चलते मीडिया संस्थानों पर भी कुछ चंद कॉरपोरेट घरानों के क़ब्ज़े ने मज़दूर वर्ग की ख़बर को निष्पक्ष रूप से प्रस्तुत करने की सारी संभावनाएं ख़त्म कर दी हैं।

जैसे जैसे पूंजी का केंद्रीयकरण बढ़ा है उसी अनुपात में मीडिया संस्थानों पर मालिकाने भी कुछ चंद कॉरपोरेट घरानों के हाथों में सिमट गए हैं।

अब ख़बरों को प्रकाशित करने की बजाय उसे छुपाने की कोशिश का नाम पत्रकारिता हो चुका है। विज्ञापन, मीडिया मालिक का हित, सरकार परस्ती, राजनीतिक पार्टी के इशारे को देखकर जब ख़बरें प्रकाशित होंगी, मज़दूर, किसान, आदिवासी, दलित और महिलाओं की ख़बरें हाशिये पर भी नहीं दिखेंगी और मौजूदा समय इसका गवाह है।

ये हक़ीक़त है और आज हमारे सामने है।

वर्कर्स यूनिटी अपनी स्थापना से ही ज़मीनी और तथ्यात्मक रिपोर्टिंग से लेकर आंदोलन को कवर करने पर अपना ध्यान केंद्रित किये हुए है।

हमारा मक़सद है कि मज़दूर वर्ग की एक ताक़तवर मीडिया खड़ी हो। इसमें आपका सहयोग समर्थन ज़रूरी है।

आप हमारे वेबसाइट, फ़ेसबुक पेज, यूट्यूब और ट्विटर पर जाएं, लाइक, शेयर और सब्सक्राइब करें।

पूरा उपक्रम जन सहभागिता से चलाया जा रहा है और विदेशी एजेंसियों से आर्थिक मदद न लेने का संकल्प है।

शुरुआती तौर पर ये एक छोटा क़दम भले हो लेकिन मज़दूर वर्ग पर भरोसा है कि हम एक दिन ज़रूर क़ामयाब होंगे। मज़दूर एकता ज़िंदाबाद!

संस्थापक सदस्य

संतोष कुमार वर्कर्स यूनिटी के संस्थापक सदस्य हैं। मज़दूर आंदोलनों में वो काफ़ी सक्रिय रहे हैं और देश के अलग अलग औद्योगिक इलाक़ों के मज़दूर वर्ग पर उनका व्यापक अध्ययन और अनुभव है। सन्हति वेबसाइट के वह प्रमुख सहयोगियों में से एक रहे हैं।

वर्कर्स यूनिटी के दूसरे संस्थापक हैं संदीप राय। पेशे से पत्रकार रहे हैं और कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। मज़दूर वर्ग से संबंधित पत्रिका श्रमजीवी पहल और ब्लॉग मज़दूरनामा का संपादन कर चुके हैं।

इमरान ख़ान वर्कर्स यूनिटी के तीसरे संस्थापक सदस्य हैं। मज़दूर वर्ग में काम करने के अलावा उनका मज़दूर वर्गीय राजनीति से गहरा जुड़ाव रहा है।

संपादकीय सलाहकार मंडल

श्यामवीर शुक्ला, मज़दूर कार्यकर्ता

डॉ. सरोज गिरी, राजनीति शास्त्र के प्राध्यापक, दिल्ली विश्वविद्यालय

रवींद्र गोयल, रिटायर्ड प्रोफ़ेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय

कार्यकारी टीम

ख़ालिद ख़ान, सामाजिक कार्यकर्ता

विशाल, सामाजिक कार्यकर्ता

सिद्धार्थ, टेक्निकल एक्सपर्ट

आकृति भाटिया, रिसर्च स्कॉलर एवं श्रमिक बुद्धिजीवी

प्रियंका गुप्ता, पत्रकार

आशीष सक्सेना. पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता

अजित सिंह, मज़दूर नेता

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