Exclusive… नियमगिरी आंदोलनः ऐतिहासिक जीत के बाद भी संकट टला नहीं है

By संदीप राउज़ी

(सुप्रीम कोर्ट की ओर से बॉक्साइट खनन करने वाली वेदांता कंपनी के भूमि अधिग्रहण प्रस्ताव को खारिज़ किए जाने के दो साल बाद ये यात्रा, उस आंदोलन के कुछ महत्वपूर्ण पड़ावों पर रोशनी डालती है। अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की ओर से देश भर के आदिवासियों को उनके जंगलों से बेदखल किए जाने के आदेश के बाद उस पर भले स्टे लग गया हो, लेकिन आदिवासी आबादी जिन दुश्वारियों में जीवन जी रही है, उसका अंत नहीं दिखता। ये लेख तीन साल बाद भी प्रासंगिक है। अभी हाल ही में नियमगिरी आंदोलन के चेहरा रहे लिंगराज आज़ाद को पुलिस ने फिर गिरफ़्तार कर लिया है। सं.)

एक पहाड़ जैसी जीत का भार कितनी बड़ी होती है इसका अंदाज़ा नियमगिरी के आंदोलन को देखकर सहज ही लगाया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद नियमगिरी में हुई पल्ली सभाओं द्वारा खनन को नकारने के दो साल बाद आज डोंगरिया कोंध आदिवासियों की जीत और ख़तरे उससे भी बड़े और पहले से भी साफ दिखने लगे हैं।

46,000 करोड़ रुपये की पूंजी करण वाली वेदांता रिसोर्स के सामने आदिम समाजवाद के युग में रह रहे डोंगरिया कोंध आदिवासियों को अपनी जीत पर यकीन नहीं है। पहाड़ों में एक अदृश्य सा भय अभी भी टंगा हुआ है।

ओडिशा के रायगढ़ ज़िले से क़रीब में स्थित नियमगिरी रेंज के सैकड़ों छोटे बड़े पहाड़ों में से एक में बाक्साइट का भंडार दबा हुआ है।

इसी लालच में वेदांता लिमिटेड ने इससे सटे मैदानी इलाक़े लांजीगढ़ में एल्यूमीनियम रिफ़ाइनरी बना दी।

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कंपनी ने क्षमता बढ़ाई

नियमगिरी में पहाड़ खनन पर तो ब्रेक लग गया है बावजूद, कंपनी ने अपनी क्षमता को एक लाख मिट्रिक टन से बढ़ाकर पांच लाख मिट्रिक टन कर लिया है।

यही कारण है उस डर का, जो आज भी डोंगरिया कोंध, कुटिया और कोंध आदिवासियों को चैन से सोने नहीं दे रहा।

जैसे हार से उबरने में वक़्त लगता है, हर आंदोलन को भी एक जीत के बाद आगे का रास्ता तलाशने में समय लगता है। हार या जीत के बाद विलीन होने का ख़तरा मुद्दा आधारित आंदोलनों के साथ कहीं गंभीर होता है।

यह ख़तरा तब और बढ़ जाता है जब व्यवस्था परिवर्तन का पहलू नज़रों से ओझल हो या सतत् परिवर्तन की ज़रूरत को नज़रअंदाज़ किया जाए। नियमगिरी आंदोलन आज इन्हीं सवालों से रूबरू है।

लेकिन इस पर बात करने से पहले आईए ज़रा उस पृष्ठभूमि पर नज़र दौड़ा लें, जिसकी परिणति ने कार्पोरेट जगत और आम जन के लिए एक मिसाल पेश की है।

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लांजीगढ़ में वेदांता की बॉक्साइट रिफ़ाइनरी। फ़ोटोः वर्कर्स यूनिटी
लांजीगढ़, वेदांता की बॉक्साइट रिफ़ाइनरी

दिल्ली की शानदार सड़कों, अट्टालिकाओं, मेट्रो और ऐसी ही बहुत सी आलीशान बातों के आदी किसी के लिए भी नियमगिरी की यात्रा अतीत की यात्रा जैसी लग सकती है।

नियमगिरी का सबसे क़रीबी क़स्बों में से एक है मुनिगुड़ा, लेकिन यहां से सड़क के रास्ते आपको क़रीब 40 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ेगी और फिर सबसे नीचे बसे डोंगरिया गांव तक पहुंचने के लिए 10 किलोमीटर पहाड़ी पगडंडी का सफर पैदल तय करना होगा।

आगे का रास्ता इससे भी लंबा और कई घंटों का हो सकता है।

हालांकि किसी डोंगरिया कोंध के लिए, सिर पर 20 से 30 किलो के वज़न के साथ क़रीबी क़स्बे मुनिगुड़ा या लांजीगढ़ (जो दूसरे रास्ते से 10 किलोमीटर की दूरी पर) तक पैदल पहुंचने में डेढ़ से दो घंटे लगते हैं।

आदिवासी महिलाएं पत्तों के दोने, थालियां, लकड़ी, हल्दी, केले, संतरे और अन्य वन उत्पाद बेचने नीचे आती हैं।

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ऊपर वनउत्पादों को इकट्ठा कर आदिवासी महिलाएं नीचे बाज़ार तक ले जाती हैं। फ़ोटोः वर्कर्स यूनिटी
वन्य उत्पादों से भरा हुआ है जंगल

हालांकि यहां जाड़े में जाना हुआ था लेकिन आच्छादित पेड़ों को देख इस बात का अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं कि गर्मी के दिनों में यहां की घाटियां आम, कटहल, अन्नानास जैसे फलों से लदी होती होंगी।

स्थानीय लोगों का मानना है कि नियमगिरी के पहाड़ों में उगाई जाने वाली हल्दी दुनिया की सबसे बेहतरीन हल्दी में से एक है।

पहाड़ों पर उगने वाले वन उत्पादों की नीचे बहुत डिमांड है, लेकिन यहां का अर्थशास्त्र ज़रा उल्टा है।

बीस तीस रुपये में ही सब्जियों और फलों से कितना ही बड़ा झोला भर सकता है, आदिवासी महिलाओं के पास तराजू और बाट नहीं होते, वो हाथ के अंदाजे से ही काम चलाती हैं।

आप जैसे जैसे डोंगरिया (जिसका मतलब होता है पहाड़) या झरनिया (झरनों के पास बसने वाले) कोंध इलाक़े की ओर बढ़ेंगे, आपके दृष्टि पटल पर आने वाली तस्वीर रंगीन से ब्लैक एंड व्हाइट होनी शुरू हो जाएगी।

मुनिगुड़ा से लांजीगढ़ के वेदांता कारखाने तक की सड़क दिल्ली से सटे किसी हाईवे को टक्कर देती नज़र आती है।

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लांजीगढ़ में रिफ़ाइनरी का गेट। फ़ोटोः वर्कर्स यूनिटी
रिफ़ाइनरी और आगे का रास्ता

मुनिगुड़ा में बिसलरी से लेकर एटीएम तक और पेट्रोल पंप व गैस एजेंसी से लेकर मोटरसाइकिल के शोरूम तक, हर मध्यवर्गीय ज़रूरत की चीज़ मौजूद है।

सड़कें चकाचक हैं, होटल हैं, बस अड्डा है, रेलवे स्टेशन है जहां से सीधे महानगरों और देश की राजधानी के लिए सीधे ट्रेनें जाती हैं।

क़स्बे से महज क़रीब 35 किलोमीटर दूर ओडिशा में निवेश करने वाली सबसे बड़ी कंपनियों में से एक वेदांता का कारखाना है, यहां तक दुनिया रंगीन दिखती है,  लेकिन इसके आगे की यात्रा में इस सतरंगी दुनिया का एक एक रंग निचुड़ता जाता है।

कारखाने के आगे पुनर्वासित कोंध आदिवासियों (पहाड़ के नीचे रहने वाले आदिवासियों कोंध कहलाते हैं) के दड़बेनुमा घरों की कालोनी, वेदांता का अत्याधुनिक स्कूल और अस्पताल… और फिर एक पगडंडी।

यह पंगडंडी आधुनिकऔर पुरातन के द्वंद्व की ओर ले जाती प्रतीत होती है।

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नियमगिरी पहाड़ों के नीचे तलहटी में रहने वाले आदिवासियों के घरों में सोलर पैनल लगे हुए हैं। फ़ोटोः वर्कर्स यूनिटी
तलहटी में बसे आदिवासियों की जीवन शैली

तलहटी में मिश्रित आबादी से सामना होता है, यहां कोंध, दलित और पिछड़ी जातियां (खासकर यादव) रहती हैं।

थोड़ा ऊपर जाने पर बीच बीच में पिछड़ी जातियों के घर मिलते हैं। यहां बच्चे दस किलोमीटर दूर स्थित स्कूल जाते हैं, घर लिपे पुते, सहन साफ सुथरे और अलगनी पर सूखते कपड़े देखने को मिलेंगे।

महिलाएं साड़ी के पूरे लिबास में दिखती हैं। इक्का दुक्का घरों में डिश एंटीना भी दिख जाएगा।

लेकिन जैसे जैसे आगे बढ़ते जाएंगे, लुंगी और शर्ट में आदिवासी मर्द कंधे पर कुल्हाड़ी लिए और एकमात्र धोती को साड़ी की तरह लपेटे औरतें सिर पर टोकरी लिए दिखना शुरू हो जाएंगी।

डोंगरिया कोंध आदिवासियों के नेता क़रीब 40 साल के लाडो सिकोका जहां रहते हैं, उस 20-25 घरों वाले गांव का नाम है लकपदर।

यहां की दृश्यावली बिल्कुल बदली हुई सी लगती है। पहाड़ के ढलान पर दो क़तारों में बसे घर दूर से देखने पर दड़बे जैसे दिखते हैं।

इन घरों के दड़बेनुमा दरवाजों के सामने लिपाई पुताई दिखती है। यहां मैंने किसी के घर धूप में सूखते कपड़े नहीं देखे। कोई बच्चा स्कूल जाता नहीं दिखा।

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पहाड़ों के ऊपर नियमगिरी में एक बस्ती जहां इस आंदोलन के नेता लाडो सिकोका का घर है। फ़ोटोः वर्कर्स यूनिटी
बीमारी से औसत आयु बहुत नीचे

बच्चे सुबह उठकर सबसे पहले भात खाते दिखे। यहां आने से पहले मैं नियमगिरी सुरक्षा समिति के नेता लिंगराज आज़ाद से मिला था।

उन्होंने बताया कि डोंगरिया कोंध अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए राजी नहीं हैं क्योंकि उनको डर है कि ‘वो पढ़ लिखकर कंपनी के दलाल बन जाएंगे।’

यात्रा से वापसी के वक्त लांजीगढ़ और मुनिगुड़ा के बीच पड़ने वाले राजुलगढ़ा में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता भालचंद्र शाडांगी ने बताया कि सीएसआर (कार्पोरेट सोशल रेस्पांसबिलिटी) के तहत आदिवासी बच्चों को पढ़ाने के लिए भारी भरकम पैसे खर्च किए जा रहे हैं।

यहां 50 से ऊपर के औरत और मर्द मुश्किल से ही मिलेंगे। इतनी कम औसत आयु? यहां के लोग बताते हैं कि आम तौर पर मौतें दुर्घटना से नहीं बल्कि बीमारी से होती हैं।

यह इलाक़ा एक्यूट सेरिब्रल मलेरिया का इलाक़ा है। फिर भी महिलाएं बिना ब्लाउज के, सिर्फ एक धोती लपेटे रहती हैं। सभी लोग झरने का पानी पीते हैं।

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ये लाडो सिकोका की बेटी हैं। यहां के बच्चे स्कूल नहीं जाते। फ़ोटोः वर्कर्स यूनिटी
‘जबतक कंपनी है, बच्चों को पढ़ने नहीं भेज सकते’

लोग सर्दियों में भी ज़मीन पर ही सोते हैं और शाम होते ही घरों में लकड़ी सुलगा लेते हैं, जिसका धुंआ सारी रात बना रहता है।

घर भी एक बंद दड़बे जैसा है, हालांकि ज़मीन की कोई कमी नहीं दिखती। यही हाल साफ पानी का है, ईंधन की कोई कमी है, जंगल में लकड़ियां पर्याप्त हैं, लेकिन पानी उबाले कौन और क्यों? पुरुष मुंह अंधेरे खाली पेट खज़ूर की ताड़ी से दिन की शुरुआत करते हैं।

पुरुषों में तम्बाकू खाकर यहां वहां थूकने की आदत है। हमें क़रीब 25 साल का एक लड़का मिला जिसे पिछले तीन चार साल से टीबी है।

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नियमगिरी आंदोलन के नेता लाडो सिकोका। फ़ोटोः नीरा जलक्षत्रि

इस संक्रामक बीमारी और इस आदत के साथ बीमारी के फैलने का ख़तरा कितना बड़ा है, इसे समझा जा सकता है।

शिक्षा के अभाव में बहुत सारी चीजें नज़रअंदाज़ हैं, लेकिन सिकोका का कहना है कि, ‘जबतक वेदांता की कंपनी घाटी में है, हम अपने बच्चों को पढ़ने नहीं भेज सकते।’

ये सही है कि बाहरी दुनिया की चालबाजियों का वो खामियाजा भुगत रहे हैं, उनका अस्तित्व बाल बाल बचा है और ख़तरा टला नहीं है, लेकिन समाज को अंदर से मजबूत करने का काम तो नहीं टाला जा सकता। शिक्षा का ढांचा बनाने और जागरूकता फैलाने की ज़रूरत हर समय हर जगह रहती है।

ऐसा लगता है कि इस आंदोलन में खुद को न्यौछावर करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का इस ओर अभी ध्यान नहीं गया है।

भालचंद्र शाडांगी ने स्वीकार किया कि अब सामाजिक आंदोलन की ज़रूरत बड़ी शिद्दत से महसूस की जा रही है।

लेकिन इसमें भी एकमत नहीं है, लिंगराज आज़ाद की ‘लाचारी’ उन्हें उनके हाल पर छोड़ने जैसी दिखती है।

क्योंकि ये मानना बहुत मुश्किल है कि पहाड़ पहाड़, गांव गांव जाकर जिन लोगों ने डोंगरिया कोंध आदिवासियों को अपने हक़ के लिए खड़ा होने के लिए समझाया, वो उनकी ही बात को न मानें!

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सामाजिक कार्यकर्ता हंशराज मिश्रा। फ़ोटोः वर्कर्स यूनिटी
‘पहले आदिवासी उड़िया भी नहीं जानते थे’

सत्तर के दशक में सर्वोदय आंदोलन से जुड़ कर इस इलाके में काम करने वाले वयोवृद्ध हंशराज मिश्रा बताते हैं कि जब उन्होंने यहां से क़रीब 50 किलोमीटर दूर स्थित आदिवासी इलाके चंद्रपुर में काम करना शुरू किया तो उन्हें सबसे बड़ी समस्या भाषा की आई।

वे बताते हैं कि उस समय स्कूलों में न तो अध्यापक जाते थे और ना ही बच्चे। फिर उन्होंने सबसे पहले उड़िया पढ़ना लिखना सिखाने का अभियान शुरू किया।

नियमगिरी के साथ भी कुछ ऐसा ही है, डोंगरिया कोंध आदिवासियों की भाषा कुई है।

विडम्बना ये है कि पुरुष थोड़ा थोड़ा उड़िया समझ और बोल लेते हैं, लेकिन महिलाओं से संवाद में कुई एक दीवार बनकर खड़ी हो जाती है, क्योंकि उन्हें सिर्फ यही भाषा आती है।

कुई को विकसित करने के लिए सरकारों ने भी कुछ नहीं किया। शिक्षा को लेकर ये भी एक डर है कि उनकी भाषा ख़त्म हो जाएगी!

साफ सफाई, रहन सहन, शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर यहां एक सशक्त आंदोलन चलाने की ज़रूरत जान पड़ती है। अगर बाहरी शिक्षा नहीं चाहिए, तो शिक्षा की अपनी पद्धति और कुई भाषा को विकसित करना चाहिए।

भुवनेश्वर से निकलने वाला साप्ताहिक अख़बार ‘जनवादी’ के संपादक लेनिन ने बताया कि इस इलाक़े में काम करने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता ने कुई भाषा की लिपि बनाई थी, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद वो काम ठप हो गया।

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लांजीगढ़ रिफ़ाइनरी से नियमगिरी पहाड़ तक जाने वाली कन्वेयर बेल्ट। फ़ोटोः वर्कर्स यूनिटी
आंदोलन और सामाजिक सुधार

जनआंदोलनों की पुरानी परम्परा रही है कि समुदाय के अंदर भी सामाजिक सुधार को आंदोलन चलाया जाए।

आज़ादी के आन्दोलन में एक तरफ़ अंग्रेजों से मुक्ति की लड़ाई चल रही थी तो दूसरी तरफ छुआछूत, सतीप्रथा और अन्य सामाजिक बुराईयों से भी टक्कर हो रही थी। चीन की साम्यावादी क्रांति के दौरान तो ऐसे ढेरों तथ्य हैं।

गुरिल्ला दस्ते जहां भी रुकते थे, स्थानीय आबादी की शिक्षा दीक्षा और स्वास्थ्य को लेकर काम करते थे। यहां तक कि उनके साथ फसलें उगाने, काटने और अनाज निकालने तक का काम भी करते थे।

माओवादियों के दावों को मानें तो वो भी अपने इलाक़ों में सामाजिक सुधारात्मक आंदोलन चलाते हैं।

असल में सामाजिक आंदोलन, मुख्य आंदोलन का पूरक है, उसे और बल प्रदान करने वाला है।

लेकिन मुश्किल ये है कि वामपंथी आंदोलन के विपर्यय और नव उदारवादी नीतियों के हमलों ने सामाजिक आंदोलनों की नज़रों से उन्हीं के सबकों को भुला दिया है।

‘पेंशन हमारे बुढ़ापे की दवाई, बच्चों की पढ़ाई और हमारी बहनों के लिए रक्षाबंधन की बधाई है मोदी जी!’

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कंपनी को सुप्रीम कोर्ट से झटका लगने के बाद कच्चे माल के लिए वो अब पास के कालाहांडी के पहाड़ों पर नज़र गड़ाए हुए है। फ़ोटोः वर्कर्स यूनिटी
खनन का मुद्दा और एनजीओ की भूमिका

इसमें एक बड़ी भूमिका एनजीओ की है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता।

हालांकि सामाजिक आंदोलनों की देखा देखी, गैर सरकारी संगठन भी शिक्षा, चिकित्सा, जागरूकता जैसे कार्यक्रम हाथ में लेते हैं, लेकिन उनका उद्देश्य बहुत हद तक सीमित बल्कि शासक वर्गों के हित सध जाने तक ही रहता है।

नब्बे के दशक के बाद वैश्विक पूंजी के हमले के साथ ही एनजीओ का प्रसार भी व्यापक हुआ है।

हर जगह जहां जनआंदोलन उभर रहा है, एनजीओ आक्रामक रूप से सक्रिय है, बल्कि जहां कार्पोरेट की नज़र है वहां उसकी पूर्व पीठिका वही तैयार कर रहे हैं।

नियमगिरी भी अपवाद नहीं है। खनन का मुद्दा एनजीओ वालों ने ही उठाया। हालांकि अब उनकी उनकी भूमिका न के बराबर रह गई है।

एनजीओ के दबाव ने जन आंदोलनों पर भी एक हद तक असर डाला है और उसे मुद्दों के इर्द गिर्द महदूद करने की कोशिश की है।

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नियमगिरी में छोटे छोटे चेकडैम बने हैं जो झरने के पानी को संरक्षित करते हैं। फ़ोटोः वर्कर्स यूनिटी
विस्थापित आदिवासियों में धर्म प्रचारकों का बोलबाला

इस पर बहस हो सकती है कि किसी समुदाय को अपना रास्ता चुनने की आज़ादी होनी चाहिए या सामाजिक आंदोलनों के मार्फ़त जैसा वो चाहते हैं, उसमें मदद की जानी चाहिए!

लेकिन सामाजिक सुधार के आंदोलनों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता।

नियमगिरी रेंज का उत्तरी छोर दक्षिण के मुकाबले थोड़ा विकसित है। मुनिगुड़ा के दूसरी तरफ 30 किलोमीटर दूर इस इलाक़े के आदिवासी बच्चे स्कूल जाते हैं, इनमें से कई को अंग्रेजी भी बोलनी आती है।

डोंगरिया कोंध के घर वैसे ही रेल के डिब्बों की तरह हैं, लेकिन हर घर में डिश टीवी है।

बस्ती के बीचोबीच गायत्री परिवार का मंदिर भी खुल गया है और वहां गायत्री मंत्र का सुबह शाम पाठ होता है।

एक समतामूलक और खुला समाज बिना सामाजिक आंदोलन के प्रतिक्रियावादी संस्कृति की भेंट चढ़ सकता है।

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लांजीगढ़ की ओर से पहाड़ पर पहुंचने के बाद दूसरी तरफ़ विस्थापित आदिवासी आबादी रहती है। फ़ोटोः वर्कर्स यूनिटी
लड़ाई अभी ख़त्म नहीं हुई है…

और अतीत में इसकी कई मिसालें भी मिल चुकी हैं। ऐसा नहीं है कि आदिवासी संस्कृति, बुर्जुआ संस्कृति के मुकाबले कमतर है।

बल्कि अपने मूल में प्रकृति और सामाजिक संबंधों में वो समाजवादी समाज से कहीं ज़्यादा क़रीब है।

लेकिन हर अच्छी बात में भी सुधार की पर्याप्त गुंजाईश होती है। नियमगिरी के आदिवासियों और उस आंदोलन के लिए भी यही बात कही जा सकती है।

ये बात तब और महत्वपूर्ण हो जाती है जब लड़ाई अभी ख़त्म नहीं हुई हो।

ऐसी ख़बरें हैं कि वेदांता नियमगिरी के पास बॉक्साइट डिपाजिट वाले एक अन्य पहाड़ को ख़रीदने की कोशिश में है। नियमगिरी को सामाजिक सुधार के जनआंदोलन की सख़्त ज़रूरत है।

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