post साहित्य Archives - Workers Unity

आज़ादी को याद करतीं चंद कविताएं और नज़्म

(इस तस्वीर में जो दो बच्चे हैं उनमें से एक नौ साल के हैदर ख़ान का नाम असम में चल

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जो भूख तक पहुंचते है,वे सलाखों तक पहुंचते हैं :अनुज लुगुन

प्रतिष्ठित हिंदी कवि अनुज लुगुन, जिन्हें आदिवासी संवेदनाओं के लिए जाना जाता है और जो बहुत कम ही उम्र में

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डॉक्टर के नाम एक मज़दूर की चिट्ठी: बर्तोल्ल ब्रेख़्त

(ये कविता जर्मनी के प्रसिद्ध कवि, नाटककार और नाट्य निर्देशक बर्तोल्त ब्रेख्त  की है। आज के हालात पर इस मौजूं कविता को हम

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अँग्रेज बुनकरों की जिन्दगी की एक झलक किताब “कंडिशन ऑफ़ वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड” से एक अंश

एंगेल्स ने पूँजीवाद के यौवन काल में इंग्लैण्ड के मजदूरों की दुर्दशा पर एक किताब लिखी थी 1844 में आई  ‘कंडिशन

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मां मुझे अपने गर्भ में पालते हुए मज़दूरी करती थी  मैं तब से ही एक मज़दूर हूं :सबीर हका

सबीर हका का जन्‍म 1986 में ईरान के करमानशाह में हुआ. अब वह तेहरान में रहते हैं और इमारतों में निर्माण-कार्य के

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इतिहास के झरोखे सेः 01 आज़ादी से पहले की कुछ महत्वपूर्ण हड़तालें

By सुकोमल सेन (आज से हम दस्तावेजी लेखों की एक शृ्ंखला शुरू कर रहे हैं, जिसमें मज़दूर आंदोलन के इतिहास

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सू लिज्ही की कविताएंः ‘मज़दूरी पर्दों में छुपी है, जैसे नौजवान मज़दूर अपने दिल में दफ्न रखते हैं मोहब्बत’

चार साल पहले मज़दूर वर्ग के कवि सू लिज्ही को व्यवस्था ने आत्महत्या करने पर मज़बूर किया था। 30 सितम्बर

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सू लिज्ही की कविताएंः ‘मालूम पड़ता है, एक मुर्दा  अपने ताबूत का ढक्कन हटा रहा है’

ठीक चार साल पहले मज़दूर वर्ग के कवि सू लिज्ही को व्यवस्था ने आत्महत्या करने पर मज़बूर किया था। 30

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‘मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती’

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो

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