इतिहास के झरोखे से-7: वैश्विक आर्थिक संकट में मजदूर वर्ग की दशा

By सुकोमल सेन

(‘इतिहास के झरोखे से’, यानी लेखों की एक ऐसी शृंखला जिसमें मज़दूर आंदोलन के इतिहास का कोई पन्ना हमारे सामने खुलेगा। आज पढ़िए सातवीं कड़ी में  वैश्विक आर्थिक संकट के समय मजदूर वर्ग की दशा क्या थी?)

भारत की औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था पर विश्व मंदी की प्राणघातक प्रतिक्रिया हुई।  कृषि उत्पादों के मूल्यों में तेजी से गिरावट होने से भारतीय अर्थव्यवस्था बिल्कुल टूटने के कगार पर आ पहुंची।

यहां अस्सी प्रतिशत आबादी कृषि पर ही निर्भर करती थी। भारतीय किसानों की दुर्दशा कल्पना से परे थी। उनकी क्रय क्षमता न्यूनतम सीमा पर पहुंच गई थी।

इस आर्थिक संकट का बोझ जनता के कंधो पर डालने के लिए ब्रिटिश सरकार ने अनेक पक्षतापूर्ण आर्थिक उपाए लागू किए।

साम्राज्यवाद की भेदभावपूर्ण नीति का प्रभाव

साम्राज्यवाद को वरीयता देने वाली जो भेदभाव पूर्ण नीति उन्होंने लागू की थी उसका प्रभाव भारत के स्टील और कपड़ा उद्योग पर भी पड़ा।

सेंट्रल लेजिस्लटिव असेंबली में जोरदार प्रतिरोध को नकारते हुए ब्रिटिश सरकार ने ओटावा व्यापार समझौते (ओटावा ट्रेड एग्रीमेंट) पर हस्ताक्षर कर भारतीय अर्थव्यवस्था को सर्वाधिक बुरी हालत में पहुंचा दिया।

भारत का सूती कपड़ा उद्योग भारी व्यपारिक मंदी का शिकार हुआ और भारतीय पूंजीपतियों ने संपूर्ण संकट का बोझ मजदूरों पर डालने के लिए बड़े पैमाने पर उनकी छटनी शूरु कर दी।

अभिनवीकरण योजना (रेशनलाइजेशन) के तहत विश्व आर्थिक संकट से पहले ही मुंबई की सूती मिलों के कुल 140000 मजदूरों में से 10000 को नौकरी से निकाला जा चुका था।

इस बार फिर कई मिलों ने काम के घंटे घटा दिए और कई ने मिल बंद कर दीं।

सन् 1934 में मुंबई की लगभग पचास प्रतिशत सूती कपड़ा मिले बंद कर दी गई और 61000 मजदूरों को काम से हाथ धोना पड़ा। इसके साथ ही वेतन कटौती भी लागू हो गई।

परिणामस्वरूप सन् 1926 को आधार मान कर दिसंबर 1933 में 16.94 प्रतिशत और अप्रैल 1934 में 21 प्रतिशत वेतन की कमी दर्ज की गई।

@Film Fixer Mumbai
मुंबई में ऐसी सैकड़ों कॉटन मिलें थीं, जिनमें एक समय जुझारू मज़दूर आंदोलन था। फ़ोटो साभारः @Film Fixer Mumbai
 मज़दूरों के वेतन में भारी कटौती

इससे उत्साहित होकर मिल मालिकों ने भी 20 प्रतिशत की वेतन कटौती भी लागू कर दी इससे सूती कपड़ा उद्योगों में एक प्रतिमान स्थापित हो गया और अन्य औद्योगिक केन्द्रों पर भी मजदूरों के वेतन में भारी कटौती होने लगी।

यह कटौती मद्रास में 15 प्रतिशत, शोलापुर में 12.5 प्रतिशत, नागपुर में 20 प्रतिशत और ओकला में और एक दो और स्थानों पर 25 प्रतिशत तक लागू हुई।

इसी प्रकार का आक्रमण बंगाल के जूट मिल मजदूरों पर भी हुआ। व्हिटले कमीशन ने 1929 में 347000 जूट मजदूरों का आकड़ा दिया था।

भारतीय सरकार द्वारा 1934 में प्रकाशित सांख्यिकी रिपोर्ट में जूट मिल मजदूरों की संख्या केवल 263739 ही बताई गई।

इन दोनों संख्या में 83000 का बड़ा अंतर है।

वास्तव में ये 83000 वे मजदूर हैं जिनको 1929 से 1934 के दौरान नौकरी से निकाल दिया गया था।

इसके बाद मिलों में दो पाली की जगह एक पाली में काम करा कर और भी 25 से 33 प्रतिशत मजदूरों को कम कर दिया गया। इन मजदूरों का वेतन भी घटा दिया था।

“अमृत बाजार पत्रिका” का आंकलन

“अमृत बाजार पत्रिका” से सन् 1931 में जूट मजदूरों पर पड़ने वाली विपत्ति की भविष्यवाणी पहले ही कर दी गयी थी।

उसने लिखा जूट मिल मजदूरों के बारे में जूट मिलों ने जो नियम बनाए हैं या बनाने वाले हैं वे बहुत गंभीर है। व्यापार में मंदी आई है इसलिए मिल मालिकों ने अपने मजदूरों में कमी करने का विचार किया है।

उद्योग मालिक 62 मिलों से करीब 40000 मजदूरों को मिलों से निकालेंगे। मिलों द्वारा लागू की गई जटिल वेतन पद्धति को क्या कहा जाए जहां मजदूरों की छंटनी को धूर्तता नहीं समझा जाता।

40 हजार स्त्री पुरूष नौकरी से बाहर हो जाएंगे। क्या बचे हुए लोगों को भी पहले जैसा वेतन मिलेगा? न ही यहां भी मिलें कई साधनों से, बुनकर को पहले जितना काम करने को कहते हैं।

लेकिन कम मजदूरी देते है……”यह भविष्यवाणी तब सही हुई जब 1928-29 में स्पिनर (बिनता) का मासिक वेतन 6 से 7 रु. था। यह राशि 1935-36 में घटाकर 5 से 6 रु. कर दी गई।

इसी अवधी में एक अकुशल मजदूर का वेतन जो 7 से 8 रु. था घट कर 2 से 7 रु. के बीच हो गया।

जूट मालिकों का पूरे देश में एकाधिकार होने के बावजूद इस विश्व मंदी में पर्याप्त मुनाफा कमाने के लिए उन्होंने बड़े पैमाने पर मजदूरो की छटनी कर दी। इसे वे उचित ठहराते हैं।

सांकेतिक। फोटो साभारः @ nuneatonhistory.
भारतीय रेल में भी बड़ी संख्या में छंटनी

भारतीय रेल में भी बड़ी संख्या में छंटनी शुरू हो गई। सन् 1930-31 में रेलवे में कुल मजदूरों की संख्या 7,8,759 थी, जो दूसरे वित्तिय वर्ष में घटकर 730290 हो गई।

अर्थात 51569 मजदूरों की छंटनी हुई। रेलवे में बड़ी संख्या की इस छंटनी के पहले ही स्थानीय स्तर पर खड़गपुर, लिलुहा, गोल्डनराक, परेल और अजमेर के रेलवे कारखानों (वर्कशाप) में भी काफी संख्या में मजदूर निष्कासित किए गए थे।

इस प्रकार मजदूरों की छंटनी करने का तरीका बिल्कुल औपनिवेशिक था। निचले स्तर पर मजदूरों की छंटनी हो रही थी लेकिन अत्याधिक वेतनभोगी यूरोपीय अधिकारियों को छुआ भी नहीं गया।

इस भेदभाव को चिन्हित करते हुए अमृत पत्रिका ने लिखा भारतीय रेलवे में छंटनी बड़े पैमाने में शुरू हो गई है। लेकिन विडंबना है कि तलवार कम वेतन पाने वाले भारतीय मजदूर पर ही गिर रही है।

सफेद चमड़ी वाले उच्च वेतनभोगी अधिकारियों का कुछ नहीं हो रहा है… उच्च वेतनभोगी, बड़े अधिकारियों के लिए भारतीय मजदरों को बलि चढ़ाना ही इस छंटनी के लिए दुखद है तब पत्रिका ने व्याग्रता के साथ लिखा, हमें आशा है कि

ऑल इंडिया रेलवे मेंस फेडरेशन अपनी मुंबई की बैठक में इस मुद्दे को उचित प्राथमिकता देगी।

इस छंटनी के साथ-साथ रेलवे, डाक और तार विभाग के मजदूरों और कर्मचारियों के वेतन में इमरजेंसी रिडक्शन रूल 1931 के तहत अनिवार्य कटौती हो गई।

सरकारी कर्मचारी भी प्रभावित

अन्य श्रेणियों के सरकारी कर्मचारियों का वेतन कम कर दिया गया। यहां पर भी वही भेदभाव वरता गया। इसका संदर्भ देते हुए अमृत बाजार पत्रिका में तख्त भाषा में लिखा, दिल्ली के लिपिकों में काफी व्याकुलता है।

एक अफवाह है कि वित्त विभाग का एक आई.सी.एस अधिकारी जिसकी सेवानिवृत्ति का समय पहले ही बीत चुका है वह सभी सरकारी कर्मचारियों के वेतन में कटौती की योजना बना रहे है।

केवल उन लोगों को छोड़कर जिनको साम्राज्य में नियुक्त किया है जैसे आई.सी.एस., भारतीय पुलिस की सेवाएं और उच्च वेतन भोगी गैर भारतीय अधिकारी।

यदि राजस्व में कमी होती है तो गरीब लिपी को ही भुगतना होगा न कि अत्यधिक वेतनभोगी नौकरी वाले अधिकारियों को जो भारत की पीठ पर सवार हैं। सभी श्रेणी के मजदूर को चोट पहुंची थी।

अन्य क्षेत्र के कर्मचारियों पर भी असर

टाटा आइरन एंड स्टील वरकर्स, जमशेदपुर में सन् 1929 से 1932 के बीच मजदूरों का मासिक वेतन रु.35.35 से घटाकर रु. 29.79 कर दिया गया।

व्हिटले कमीशन की रिपोर्ट के मुताबिक मुंबई में गोदी कर्मचारियों का वेतन 14 आना से 1 रु. 8 आना था। यहां तक कि इतने अल्प वेतन में भी 30 से 40 प्रतिशत की कटौती की गई।

इसके अतिरिक्त मजदूरों को एक माह में 10-12 दिन से अधिक काम नहीं मिलता था। म्युनिसिपलिटी के मजदूरों को भी इस छंटनी और वेतन कटौती को भोगना पड़ा।

कानपुर में सन् 1921 की तुलना में इन कर्मचारियों का वेतन 40% कम कर दिया गया। संपूर्ण रूप से 130-34 तक की मंदी ने भारत के संपूर्ण मजदूर वर्ग को बुरी तरह प्रभावित किया।

मजदूर वेतन कटौती और छंटनी दोनों से आतंकित थे। बहुत बड़े पैमाने पर मजदूरों की छंटनी और किसी नए काम के न होने से भयंकर रूप से बेरोजगारी उत्पन्न हो गई।

बहुत से निराश और भ्रमित युवकों ने आत्महत्या कर ली। औपनिवेशिक शासन ने भारतीय युवाओं को यही सब प्रदान किया।

(सुकोमल सेन की किताब ‘भारतीय मज़दूर वर्गः उद्भव और आंदोेलन का इतिहास’ से साभार। टंकण – शोभा मेहता)

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