इतिहास के झरोखे सेः 01 आज़ादी से पहले की कुछ महत्वपूर्ण हड़तालें

By सुकोमल सेन

(आज से हम दस्तावेजी लेखों की एक शृ्ंखला शुरू कर रहे हैं, जिसमें मज़दूर आंदोलन के इतिहास का कोई पन्ना हमारे सामने खुलेगा। आज पढ़िये  इतिहास के झरोखे की पहली कड़ी। सं.)

टाटा आइरन एंड स्टील वर्कर्स, जमशेदपुर में एक बड़ी हड़ताल सितंबर 1922 में हुई।

लोहा और स्टील के क्षेत्र में इसी समय बड़े परिवर्तन हो रहे थे। विश्व में स्टील की कीमत गिर रही थी और यूरोप में मजदूरी कम की जा रही थी।

जबकि टाटा कंपनी ने इसी दौरान व्यवसाय का विस्तार करने और अपनी पूंजी को दुगना करने का साहसिक कदम उठाया। ऐसी ही परिस्थितियों में लेबर एसोसिएशन ने प्रंबधकों के समक्ष अपनी मांगों का ज्ञापन पेश किया।

अपने ज्ञापन में मजदूरों ने मजदूर यूनियन को मान्यता, आठ घंटे की जनरल पारी कोई अनिवार्य ओवर टाइम नहीं, बोनस और बरखास्त कर्मचारियों को पुनः काम पर बहाली की मांगें पेश कीं।

19 सितंबर 1922 को पूर्ण हड़ताल हो गई। लेकिन प्रंबधन के अड़ियल रूख के कारण हड़ताल लंबी चलने से मजदूरों में थकान आने लगी।

ए.आई.टी.यू.सी. के प्रतिनिधि के रूप में दीवान चमल लाल 20 अक्टूबर को जमशेदपुर पहुंचे और कुछ शर्तों के साथ प्रंबधन प्रतिनिधि लेकर एक समाधन समिति का गठन करने का निर्णय हुआ।

यूनियन की मान्यता के लिए ए.आई.टी.यू.सी ने आश्वासन दिया। इन शर्तों पर 23 अक्टूबर को मजदूर काम पर वापस लौटे, लेकिन लगभग इसके तुरंत बाद ही प्रंबधन ने लेबर एसोसिएशन के सचिव जी. सेठी सहित कई कर्मचारियों को बरखास्त कर दिया।

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टाटा स्टील का पहला शेयर सर्टिफ़िकेट। फ़ोटो साभारः @tatasteel100.com

परिणामस्वरूप गंभीर तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई। इसके बाद गैर हड़तालियों के प्रतिनिधि को समाधान समिति में शामिल करने के प्रंबधन के दबाव के कारण संकट और गहरा हो गया।

इसी तनाव और अशांति की स्थिति में अंततोगत्वा सन् 1924 में समाधान समिति की बैठक जमशेदपुर में हुई।

मज़दूरों की तरफ से सी.आर. दास के नेतृत्व में चमन लाल, एन.एम. जोशी, सी.एफ. आन्द्रीव और अन्य लोगों ने लेबर एसोसिएशन के सदस्य और साथ ही साथ बाहर से आए लोगों के रूप में भागीदारी की।

इसके अतिरिक्त मोती लाल नेहरू और रंगास्वामी अय्यर ने अतिथि के रूप में बैठक में भागीदारी की। अधिकतर मुद्दों पर आपसी समझ बन गई लेकिन लेबर एसोसिएशन को मान्यता और खासकर जी. सेठी को शामिल करने  के मुद्दे पर गतिरोध उत्पन्न हो गया।

इस समस्या का समाधान सी.एफ. आन्द्रीव की अध्यक्षता में यूनियन को पुनर्गठित करके मान्यता प्राप्त करने से हुआ। प्रबंधन ने यूनियन को मान्यता प्रदान की और जी. सेठी को पुनः नौकरी में ले लिया।

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हड़तालों का मुख्य मुद्दा बोनस की मांग

इस दौर की सूती कपड़ा मिल मजदूरों की हड़तालें विशेष रूप से ध्यान देने योग्य हैं। इन हड़तालों का मुख्य मुद्दा बोनस की मांग थी। इस समय तक मजदूर बोनस को “ विलंबित वेतन” (डिफर्ड वेज) समझते थे।

अक्टूबर 1922 में सूरत के कपड़ा मिलों के करीब तीन हजार मजदूरों ने औसत मासिक वेतन का 42.5 बोनस की मांग करते हुए हड़ताल शुरू कर दी।

सूरत के आयुक्त ने मामले में हस्तक्षेप किया और मजदूरों से 25%  बोनस स्वीकार करने को कहा। मजदूर समुचित ढंग से संगठित नहीं थे, परिणामस्वरूप हड़ताल असफल हो गई और दो सौ मजदूर नौकरी से निकाल दिए गए।

अहमदाबाद के मिल मालिकों द्वारा गत वर्ष का एक पंचनिर्णय न लागू करने से वहां के मजदूरों में गंभीर अंसतोष व्याप्त था।

इसके बाद 1 अप्रैल 1923 से मिल मालिकों को संगठन (मिल ओनर्स एसोसिएशन) ने मजदूरों के वेतन में 20% कटौती की घोषणा कर दी।

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सांकेतिक तस्वीर। फ़ोटोः वर्कर्स यूनिटी
दो महीने की ऐतिहासिक हड़ताल

वेतन कटौती के इस निर्णय के खिलाफ 56 मिलों से 43,000 मजदूर सड़कों पर निकल पड़े। दो माह से अधिक समय तक हड़ताल जारी रही और 24,00,000 कार्यदिवस की हानि हुई।

मजदूर बहुत कठिन संघर्ष में शामिल थे लेकिन हड़ताल को जारी रखने के लिए समुचित कोष नहीं था। लंबी हड़ताल से थक कर बहुत से मजदूर औद्योगिक केन्द्रों को छोड़कर अपने गांव वापस चले गए।

अंततोगत्वा अहमदाबाद टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन ने पंचनिर्णय के द्वारा वेतन में 16% की कटौती को स्वीकार कर मजदूर काम पर वापस गए।

अहमदाबाद के मिल मालिकों द्वारा वेतन कटौती लागू करने की सफलता से प्रेरित होकर बांबे मिल ओनर्स एसोसिएशन ने भी जुलाई 1923 से वार्षिक बोनस बंद करने का निर्णय कर दिया।

मजदूर विगत पांच वर्षों से यह बोनस प्राप्त कर रहे थे। मिल मालिकों के इस निर्णय ने मजदूरो को काफी उत्तेजित कर दिया और उन्होंने प्रतिरोध करने का निर्णय किया।

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जोसफ बपतिस्ता  की अध्यक्षता और सहस्त्रबुद्धे के मंत्रीत्व में  समिति का गठन

17 जनवरी 1924 से मुंबई के सूती कपड़ा मिलों के 1,60,000 मजदूर हड़ताल पर चले गए। यह हड़ताल दो माह से अधिक समय तक जारी रही। इस दौरान 7,75,000 कार्यदिवसों का नुकसान हुआ।

ए.आई.टी.यू.सी. के पूर्व अध्यक्ष जोसेफ बपतिस्ता और अन्य मजदूर नेताओं ने मजदूरों को हड़ताल न करने की सलाह दी लेकिन जब हड़ताल शूरू हो गई तो उन्होंने समाधान के लिए कठिन प्रयास किए।

मजदूरों को बोनस रोके जाने के बाद वेतन कटौती की आशंका थी। किसी प्रकार जोसफ बपतिस्ता की अध्यक्षता और सहस्त्रबुद्धे के मंत्रीत्व में हड़ताल का समाधान निकालने के लिए एक समिति का गठन हुआ।

समिति के अन्य सदस्य एन.एम.जोशी, एच.एस झबवाला, एफ.ए. गिनवाला, कांजी द्वारकादास और अन्य दो मजदूर थे। इस समिति ने सरकार से पंच नियुक्त करने का आग्रह किया लेकिन मिल मालिकों ने इससे इनकार कर दिया।

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मुंबई में ऐसी सैकड़ों कॉटन मिलें थीं, जिनमें एक समय जुझारू मज़दूर आंदोलन था। जब मालिकों को इससे भी अधिक मुनाफ़ा देने वाला बिजनेस मिला तो ये धीरे धीरे अपनी मौत मर गईं। फ़ोटो साभारः @Film Fixer Mumbai
जब बोनस लेने की लड़ाई

मिल मालिकों का तर्क था कि बोनस, मुनाफा और मिल मालिकों की शुभेच्छा पर निर्भर है। बोनस वेतन का हिस्सा नहीं है। मिल मालिकों ने तालाबंदी की घोषणा कर दी।

लेकिन जब मिल मालिकों के इस निर्णय से मजदूर नहीं झुके और सरकार की सिफारिशों का सहारा लेकर बोनस का निर्णय करने के लिए इस शर्त पर सहमत हुए कि कमेटी द्वारा तय नियम और शर्तें, मालिकों द्वारा स्वीकृति होनी चाहिए।

तब सरकार ने मुंबई के मुख्य न्यायधीश की अध्यक्षता में एक जांच समिति गठित कर दी और मालिकों द्वारा निर्देशित नियम और शर्तों के अनुसार कमेटी को सूचित करना था : क्या बोनस के बारे में मजदूरो को कोई दावा, प्रचलित नियम, कानूनी या इसके समतुल्य नियम लागू करने लायक है।

गत वर्षों के मुनाफे की तुलना में उस वर्ष का मुनाफा चाहे जो हो बोनस की मांग न्यायसंगत नहीं है, इस परिस्थति में जांच समिति का निर्णय पहले से ही मालूम हो गया।

12 मार्च को जांच समिति की प्रकाशित रिपोर्ट पूर्णतः मालिकों के पक्ष में थी। रिपोर्ट में कहा गया  कि बोनस के लिए मजदूरों का कोई दावा नहीं बनता और मुनाफा भी ऐसा था कि उस पर बोनस देना संभव नहीं है।

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दीर्घकालीन संघर्ष को चलाने की शानदार मिसाल

यह हड़ताल अनेक विपरीत परिस्थितियों के बीच मजदूरों के दृढ़ संकल्प, कठोर निर्णय और बेहद परेशानियों से भरे दीर्घकालीन संघर्ष को चलाने की शानदार मिसाल है।

एक लंबे अरसे तक मजदूरों का वेतन रूका रहा, कोई भी हड़ताल कोष नहीं था, बाहर से कोई मदद भी नहीं थी और सबसे बड़ी बात थी कि मजदूर सुसंगठित नहीं थे।

तब भी लगभग ढाई माह तक मजदूर दृढ़ता से हड़ताल चलाते रहे। जांच समिति की रिपोर्ट आने के बाद 25 मार्च 1924 को हड़ताल वापस हो गई और तभी मिलों से पुलिस वापस बुलाई गई।

अति उत्साहित मिल मालिकों ने मजदूरों पर एक और हमला किया। उसी वर्ष जुलाई में मालिकों ने भोजन भत्ता में कटौती की घोषणा की जिसके प्रभाव स्वरूप वेतन में 11.5% की कटौता हो गई।

यह कटौती थोक मूल्य सूचकांक के बढ़ने और उपभोक्ता सूचकांक के 180 से 190 तक बढ़ने पर की गई। जबकि मुंबई के श्रम कार्यालय ने उसी माह 1914 को 100 आधार मान कर अपनी सांख्यकी गणना रिपोर्ट प्रकाशित की थी।

मिल मालिकों द्वारा एक के बाद एक हमले ने मुंबई के सूती कपड़ा उद्योग में गंभीर परिस्थिति पैदा कर दी।

आल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस बुरी तरह से क्षुब्ध हो उठी और सरकार से इन उद्योगों की हालत के बारे में एक जांच समिति गठित करने और वेतन कटौती संबंधी सभी रिपोर्ट का प्रकाशन स्थगित करने की मांग की।

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दक्षिणी मुंबई ज़िले में क़रीब 135 कॉटन मिलें थीं, जिनकी हालत आज इससे भी बुरी हो गयी है। फ़ोटो साभारः @Vinay Kumar/Facebook
मुंबई कपड़ा मिलों की 26 सितम्बर की हड़ताल

मोतीलाल नेहरू के नेतृत्व में विधानपरिषद के कुछ सदस्यों द्वारा भोजन भत्ते में कटौती के प्रश्न पर मध्यस्थता करने का प्रयास हुआ लेकिन मिल मालिक ने किसी भी प्रकार की मध्यस्ता से  इनकार कर दिया।

मुंबई के राज्यपाल ने भी इस विवाद में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और मिल मालिकों द्वारा मिलों पर बढ़ते कथित आर्थिक दबाव के कारण रूई पर लगाए गए।

आबकारी कर में छुट की मांग पर भी विचार करने में असमर्थता प्रकट की। मजदूर पुनः हड़ताल पर जाने को बाध्य हुए। पहले चरण के कुछ मिलों के मजदूरों ने 15 सितंबर 1925 से काम बंद कर दिया।

लेकिन 26 सितंबर तक हड़ताल ने सभी मिलों के मजदूरों को अपने आगोश में ले लिया। एक लाख साठ हजार से अधिक मजदूर हड़ताल में शामिल हुए।

परिणामस्वरूप एक करोड़ दस लाख कार्यदिवसों को हानि हुई। मुंबई के सूती कपड़ा मिलों की हड़तालों में यह गंभीर और लंबी चलने वाली हड़ताल थी।

लगभग 6 सप्ताह तक, तमाम कठिनाइयों को झेलते हुए मजदूरों ने दृढ़ता से संघर्ष चलाया और सफलता की दहलीज तक पहुचं गए।

11 दिसंबर को भारत के वायसराय ने रूई पर आबकारी कर स्थगित करने की घोषणा की और इस फैसले के बाद ही 3 दिसंबर को मिल मालिकों ने मजदूरों का वेतन कम करने का निर्णय वापस ले लिया।

1 दिसंबर को स्थगित किया गया रूई का आबकारी कर धीरे-धीरे समाप्त हो गया। यह अजीब बात थी कि मिल मालिकों ने सरकार से अपनी मांग मनवाने के लिए मजदूरों पर आर्थिक हमला कर उनको हड़ताल करने के लिए मजबूर कर दिया और इस दबाव के द्वारा सरकार से अपनी मांग मनवा ली।

मजदूरों द्वारा इस दीर्घकालीन हड़ताल को जितनी दृढ़ता से चलाया गया इससे सभी लोग आश्चर्यचकित थे।  हड़ताल के दौरान लगभग 60% मजदूर अपने गांवो को वापस चले गए और बहुत से मजदूरों ने सब्जी आदि बेचकर मुश्किल से जीवन चलाया।

एन.एम. जोशी की अध्यक्षता में हड़तालियों की सहायता के लिए एक सहायता कमेटी भी गठित की गई। बांबे म्यूनिसिपल काउंसलिग के सदस्यों ने भी हड़ताली मजदूरों के लिए राहत सामाग्री वितरित की।

देश के अनेक संगठनों ने भी हड़ताली मजदूरों को आर्थिक सहयोग भेजा।

इस दौर की एक और महत्वपूर्ण हड़ताल

इस दौर की एक और महत्वपूर्ण हड़ताल उत्तर पश्चिम रेलवे (एन.डब्ल्यू.आर.) में हुई। यह हड़ताल के मुख्य नेता, भूतपूर्व गार्ड जे.बी. मिलर, एम.ए.खान और एच.टी. हाल थे।

हड़ताल 15 मार्च 1925 को उत्तर पश्चिम रेलवे वर्कशाप से शुरू हुई और शीघ्र ही पूरे उत्तर-पश्चिम अंचल में फैल गई।

यद्यपि हड़ताल कार्यकर्ता के खिलाफ अनुशासिक कार्रवाई के कारण शुरू लेकिन वेतन वृद्धि, आठ घंटे का कार्यदिवस, छंटनी किए गए मजदरों की पुनः वहाली का मांग भी इसमें शामिल की गई।

oldest railway strike in india @SUNDARmyth
भारतीय रेलवे में पहली बड़ी हड़ताल 1882 में हुई, यानी इसकी स्थापना के 9 साल के अंदर। हावड़ा के 1200 रेलवे कर्मचारी आठ घंटे के काम की मांग को लेकर हड़ताल पर चले गए। फ़ोटो साभारः @SUNDARmyth/twitter
जब इंग्लैंड की ट्रेड यूनियनों ने दिया समर्थन

इस दीर्घकालीन हड़ताल में 22,000 मजदूरों ने भागीदारी की। मजदूरों के संघर्ष को ध्वस्त कर देने के लिए रेलवे अधिकारियों ने बर्बर दमन किया। जुलाई के पहले सप्ताह में हड़ताल टूट गई।

हड़ताल वापसी के बाद आठ हजार मजदूरों की सेवाएं समाप्त कर दी गई और केवल चौदह हजार मजदूरों को ही काम पर लिया गया।

इस हड़ताल ने इंगलैंड की भी ट्रेड यूनियनों का ध्यान आकर्षित किया। 22 मई 1925 को लंदन के वरकर्स वीकली सप्ताहिक ने लिखा, ‘यह मुद्दा इस देश के ट्रेड यूनियन आंदोलन के विचार योग्य है….।

भारत में एक ट्रेड यूनियन पर हमला हो रहा है। ट्रेड यूनियन कांग्रेस ने भारतीय मजदूर संगठनों के मसलों के बारे में जांच पड़ताल करने की घोषणा की है। इस हड़ताल के मसले से ही उसकी शुरूआत की जा सकती है।

जब खून से झंडा लाल हो गया…

4 जुलाई को लैंसबर्ग से प्रकाशित ‘लंदन वीकली’ ने लिखा, विगत माह उत्तर-पश्चिम रेलवे (एन.डब्ल्यू.आर.) के मजदूरों ने अखबार में छपे हड़ताल टूटने के बयान के खिलाफ प्रदर्शन किया।

उनके हाथों में लाल झंडा था जो पहले सफेद होता था लेकिन हड़तालियों के खून से यह लाल हो गया था।

`इस उल्लेख का संदर्भ देते हुए सर डेविड पीटर ने अंतिम सांस तक संघर्ष करने की दृढ़ता प्रदर्शित करने के लिए भावुकतापूर्वक अपने शरीर से खून निकाल कर झंडे को रंगा।’

(सुकोमल सेन की किताब ‘भारतीय मज़दूर वर्गः उद्भव और आंदोेलन का इतिहास’ से साभार। टंकण- शोभा मेहता)

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