PF का पैसा शेयर बाज़ार में झोंकने जा रही मोदी सरकार, मज़दूरों की कमाई पर डाका डालने की मंशा

By आशीष सक्सेना

केंद्रीय श्रम मंत्रालय के जरिए सरकार की नजर अब मजदूरों के खून-पसीने का हिस्सा पीएफ़ पर है। इसके लिए योजना तो पहले ही बना ली गई, लेकिन अब अंजाम देने की ओर है।

हाल ही में 24 सितंबर को केंद्रीय श्रम व रोजगार मंत्री संतोष गंगवार की मौजूदगी में पीएफ़ पर नए कायदे बनाने को दिल्ली में बैठक की गई।

इस बैठक में संबंधित अधिकारियों के अलावा फिक्की, एसोचैम और कुछ श्रम संघों (इंटक, सीटू, एटक, एक्टू के अलावा) के प्रतिनिधि मौजूद रहे।

इस खास बैठक में कुछ मुद्दों पर विशेष चर्चा हुई। प्रमुख बातचीत में प्रस्ताव दिया गया कि मजदूरों पीएफ़ का हिस्सा एंप्लॉयीज पेंशन स्कीम (ईपीएस) से न्यू पेंशन स्कीम (एनपीएस) में जाने का विकल्प दिया गया है।

साथ ही जब वे चाहें एनपीएस से ईपीएस में फिर जा सकते हैं। इस पर यूनियनों ने कड़ा ऐतराज दर्ज कराया।

साथ ही ये भी पूछा कि एनपीएस के चार फायदे गिनाएं, जिसका कोई जवाब नहीं मिला। श्रमिक नेताओं ने कहा कि इस तरह पीएफ़ व्यवस्था को ध्वस्त करना बेतुका है, जिसका एसोचैम प्रतिनिधि ने भी समर्थन किया।

विवाद के पांच साल बाद ख़ारिज़ हो जाएगा मामला

इस मामले में बुनियादी बात यही है कि सरकार किसी भी तरह पीएफ़ की रकम को एनपीएस के जरिए शेयर मार्केट में पहुंचाने की फ़िराक़ में है।

इधर से उधर करने की छूट फिलहाल दी गई है, लेकिन ये कब तक रहेगी इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता।

इस व्यवस्था के लागू होने पर नतीजा ये भी होगा कि नियोक्ता एनपीएस का विकल्प चुनने पर ही रोजगार दे। फिलहाल इस पर ऐतराज दर्ज कराया गया है, असलियत गजट जारी होने पर सामने आएगी।

एक अहम मुद्दा पीएफ संबंधी विवादों के बारे में रखा गया, जिसमें प्रस्तावित किया गया कि पांच साल तक विवाद का केस न लाने पर ख़ारिज़ माना जाएगा।

केस फ़ीइल होने के बाद दो साल के अंदर मामला निस्तारित किया जाएगा।

इस पर श्रम संघों की ओर से कहा गया कि पांच साल की समय सीमा निर्धारित न की जाए, बल्कि कोई सीमा बनाई ही न जाए, क्योंकि काफी लोग इतने जागरूक नहीं होते और सामान्य जीवन की परेशानियों की वजह से वे लेट हो जाते हैं।

दो साल में निस्तारण के मामले में कहा कि इस समय को कम से कम किया जाए, अधिकतम छह महीने या सालभर होना चाहिए।

श्रमिकों की बड़ी रकम डूबने की आशंका

बैठक में भारतीय मजदूर संघ के प्रतिनिधि की ओर से इतनी ही बात आई कि सरकार को आने वाले चुनावों को देखते हुए श्रमिकों के बारे में सोचना चाहिए।

पांच साल पुराने विवादों को खारिज कर देने के पीछे आशंका ये है कि इससे श्रमिकों की बहुत बड़ी रकम डूब जाएगी।

देशभर में करीब 17 करोड़ पीएफ़ एकाउंट बताए जाते हैं, जिनमें पांच करोड़ सक्रिय हैं। यानी 12 करोड़ पीएफ़ खाते वे हैं जिनमें बड़ी तादाद विवादित मामलों की है और पुराने भी हैं।

जिन्होंने पांच-सात साल से कोई क्लेम या केस नहीं किया है, उनकी संख्या अगर सिर्फ दस हजार मान जी जाए और उनके खाते में औसत एक लाख रुपये प्रति व्यक्ति धन माना जाए तो ये रकम एक अरब रुपये हो जाती है।

ऐसे में ये अनुमान ही लगाया जा सकता है कि इस प्रस्ताव का फायदा कौन उठाएगा?

पीएफ़ संबंधी नए प्रावधानों के प्रस्ताव में तकनीकी तौर पर 12 प्रतिशत, दस प्रतिशत या फिर वेतन के अनुसार हिस्से की जगह 10, 12 या वेतन के अनुसार की बात कही गई।

पीएफ़ धनराशि की कटौती के लिए बेसिक के अलावा डीए और रिटेनिंग अलाउंस को आधार बनाने की बात कही गई।

श्रमिक नेताओं ने इसमें एचआरए, ओवरटाइम, टीए, बोनस आदि को भी जोडऩे की बात कही। हालांकि यहां पर एक चाल समझने में श्रमिक नेता चूक गए।

असल बात ये है कि पंद्रह हजार रुपये बेसिक होने पर पीएफ 12 प्रतिशत होगा। अगर बेसिक इससे कम है तो अन्य भत्ते और डीए जोडऩे पर 15 हजार तक पहुंचाना है, उससे ज्यादा का कोई खांचा ही नहीं  है।

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कंपनी पर ज़ुर्माना

विवाद के मामले में नियोक्ता पर पहली बार में पहले पांच हजार का जुर्माना था जिसे पचास हजार रुपये करने का प्रस्ताव आया, जिसको श्रमिक नेताओं ने न्यूनतम 75 हजार रुपये करने को कहा।

दूसरी बार विवाद पर पहले 25 हजार रुपये था जिसे ढाई लाख करने का प्रस्ताव आया, इसको श्रमिक नेताओं ने 25 लाख रुपये करने को कहा।

विवाद के मामले में नियोक्ता को जेल भेजे जाने का प्रावधान पूर्व की ही भांति रहेगा, इस पर कोई प्रस्ताव भी नहीं रखा गया।

यहां ये भी जानने की बात है कि इस संशोधन प्रस्ताव के विधेयक को लाने के लिए श्रम व रोजगार मंत्रालय ने बीस अगस्त को अपनी वेबसाइट पर अपलोड कर दिया, जिससे सुझाव मिल सकें।

सुझाव देने का अंतिम समय 20 सितंबर था। हालिया बैठक के बाद क्या फेरबदल होगा, कहना मुश्किल है।

बैठक में भारतीय मजदूर संघ के प्रतिनिधि की ओर से इतनी ही बात आई कि सरकार को आने वाले चुनावों को देखते हुए श्रमिकों के बारे में सोचना चाहिए।

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