मारुति की बिक्री घटते ही, वेंडर कंपनियों में बड़े पैमाने पर छंटनी शुरू

जब अर्थव्यवस्था में उछाल हो तो पूंजीपति खूब मुनाफ़ा कमाता है लेकिन मंदी आती है तो पूंजीपति वर्ग मुनाफ़े का रिकॉर्ड तोड़ देता है।

मोदी सरकार के आखिरी तीन सालों में आर्थिक मंदी की चौतरफ़ा ख़बरों के बीच भारतीय पूंजीपति वर्ग भी इसी पूंजीवादी नियम का पालन कर रहा है।

गुड़गांव-मानेसर औद्योगिक क्षेत्र में कार निर्माता कंपनी मारुति के प्लांटों और उसे पार्ट्स बेचने वाली कंपनियों में बड़े पैमाने पर छंटनी होनी शुरू हो गई है।

पिछले दिनों देश की अग्रणी चारपहिया वाहन निर्माता मारूति से दो ख़बरें आईं। पहली ख़बर की मारुति कारों की बिक्री में भारी गिरावट आई है।

और दूसरा मारुति अपनी डीज़ल कारों का उत्पादन अप्रैल 2020 से बंद कर देगी।

इन दोनों ख़बरों का असर मारुति पर निर्भर बाकी छोटी छोटी वेंडर कंपनियों पर पड़ना तय था। और इसकी ख़बर भी जल्द आ गई है।

मारुति के पार्ट्स बनाने वाली मानेसर की बेलसोनिका कंपनी ने अपने सारे कैजुअल कर्मचारियों को निकाल बाहर किया है।

बेल सोनिका यूनियन के एक मज़दूर नेता ने वर्कर्स यूनिटी को बताया कि मैनेजमेंट ने क़रीब 180 अन्य कर्मचारियों को भी कंपनी से निकालने का मन बना लिया है।

बेलसोनिका कंपनी में छंटनी की गाज़ लोकसभा चुनावों के तुरंत बाद मज़दूरों पर गिर सकती है।

इसी तरह मारूति, होंडा, हीरो आदि ब्रांडों के लिए इलेक्ट्रिक पार्ट्स बनाने वाली मानेसर की डेंसो कंपनी ने पिछले एक हफ़्ते में सैकड़ों मज़दूरों को निकाल बाहर किया है।

डेंसो में काम करने वाले एक मज़दूर ने बताया कि कंपनी गेट पर छंटनी की लिस्ट पहुंचा दी गई है और मज़दूरों को गेट से ही मना कर दिया जा रहा है।

उनके अनुसार, “मज़दूरों से कहा जा रहा है कि उनकी एक महीने की सैलरी उनके खाते में डाल दी गई है और अब आगे से यहां आने की ज़रूरत नहीं है।”

denso @denso

ये मज़दूर डेंसो में तकरीबन 3-4 से काम कर रहे थे और कंपनी ने छंटनी की प्रक्रिया का भी पालन नहीं किया।

खुद मारुति कंपनी का बहुत बुरा हाल है। गुड़गांव और मानेसर के तीन प्लांटों में क़रीब 35 हज़ार मज़दूर काम करते हैं।

तक़रीबन साढ़े छह हज़ार मज़दूर परमानेंट हैं और बाकी टेंपरेरी वर्कर, कैजुअल, ट्रेनी, अप्रेंटिस हैं।

गुड़गांव प्लांट के एक यूनियन नेता ने वर्कर्स यूनिटी को बताया कि कंपनी परमानेंट वर्करों की छंटनी नहीं कर रही है लेकिन टेंपरेरी, कैजुअल, ट्रेनी अप्रेंटिस की संख्या को कम कर रही है।

असल में मारूति में टेंपरेरी वर्करों को 7-7 महीने के लिए भर्ती किया जाता है। जब उनका समय पूरा हो जाता है तो उन्हें सर्टिफिकेट के साथ बाहर कर दिया जाता है।

यही हाल ट्रेनी और अप्रेंटिस वर्करों के साथ होता है। इसलिए कंपनी को औपचारिक छंटनी करने की ज़रूरत नहीं होती है।

जब कंपनी को वर्करों की संख्या कम करनी होती है, वो टेंपरेरी, कैजुअल, ट्रेनी, अप्रेंटिस वर्करों की भर्तियां कम कर देती है।

देश की अग्रणी दोपहिया वाहन निर्माता कंपनी हीरो की स्थिति भी कमोबेश यही है।

इस कंपनी के नीमराना प्लांट में टेंपरेरी, अप्रेंटिस वर्करों की भर्ती का रिकॉर्ड कायम किया गया है। यहां परमानेंट कर्मचारी नाममात्र के भी नहीं हैं।

गुड़गांव में मज़दूरों के बीच काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता श्यामबीर शुक्ला कहते हैं, “मोदी सरकार के नोटबंदी और जीएसटी जैसे दो विनाशकारी फैसलों ने उद्योगों पर दबाव बढ़ा दिया है जिससे छंटनी और तालाबंदी आम हो गई है।”

उनके मुताबिक, मोदी सरकार ने पिछले पांच सालों में श्रम कानूनों को रद्दी बना दिया है, जिससे पूंजीपति वर्ग अब बेधड़क हायर एंड फ़ायर की नीति पर अमादा हो गया है।

वो कहते हैं कि जबतक मज़दूर वर्ग संगठित होकर लड़ाई को आगे नहीं बढ़ाएगा, अलग अलग फैक्ट्रियों की लड़ाईयों की लड़ाई को नहीं जीत सकता है।

और पिछले दो सालों में ये दीवार पर लिखी इबारत की तरह साफ़ हो गया है। गुड़गांव से लेकर धारूहेड़ा और बावल तक के औद्योगिक क्षेत्र में क़रीब दो दर्जन कंपनियों में छंटनी और तालाबंदी हुई।

इसका प्रतिरोध करने के लिए एक तमाम ट्रेड यूनियनों की एक यूनिटी काउंसिल भी बनी लेकिन पूंजीपति वर्ग के हमले का जवाब देना तो दूर, उसे कोई चुनौती भी नहीं दी जा सकी है।

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