रोहतक आइसिन के निलंबित मज़दूरों के पक्ष में आया फ़ैसला

हरियाणा के रोहतक में स्थित आइसिन कंपनी से क़रीब ढाई साल पहले सस्पेंड किए गए 30 मज़दूरों के पक्ष में फैसला आया है।

लेबर डिपार्टमेंट रोहतक ने पेमेंट ऑफ वेज एक्ट के तहत निलंबन भत्ता पूरा न दिए जाने पर कंपनी को फटकार लगाई है और बकाया भुगतान एक महीने के अंदर करने को कहा है।

साथ ही कोर्ट ने प्रति मज़दूर 3000 रुपये मुआवज़ा देने का भी आदेश दिया है। मज़दूरों का कहना था कि कंपनी कानून अनुसार वेतन भत्ता पूरा नहीं दे रही थी।

आइसिन ऑटोमोटिव हरियाणा मज़दूर यूनियन के महासचिव अनिल कुमार ने बताया, “हमारे द्वारा लगाए गए केसों में लगभग पिछले 2 सालों से कार्यवाहियां चलती रहीं जिसके दौरान कंपनी ने बहुत बार हमारे द्वारा लगाए गए केसों में आनाकानी करते हुए आपत्तियां उठाईं।”

आईसिन मज़दूर यूनियन के संघर्ष के दो साल

“लेकिन कानून अनुसार हम सही थे और उसी के दौरान कार्यवाहियां चलीं और अंत में दोनों पक्षों में बहस के बाद श्रम विभाग रोहतक ने हमारे हक में ऑर्डर पास कर दिया है।”

उन्होंने कहा कि कोर्ट के आर्डर में साफ़ साफ़ लिखा है कि एक महीने के अंदर श्रमिकों का जितना भी निलंबन भत्ता बकाया है उसे जमा करवा दिया जाए और उससे अलग 3000 का कंपनसेशन अलाउंस प्रति मज़दूर देने का भी आर्डर किया है।

अनिल ने बताया कि इससे पहले कंपनी में लॉक आउट के मामले में भी मज़दूरों के पक्ष में फैसला आ चुका है।

वो कहते हैं कि यूनियन बनाने की कोशिश करने पर मैनेजमेंट ने 600 वर्करों को एक झटके में ही निकाल बाहर किया। यूनियन फाइल करने की भनक लगते ही तीन मई 2017 को इन अगुवाई कर रहे सभी वर्करों का गेटबंद कर दिया गया।

ये सभी वर्कर ए शिफ्ट में पहुंचे थे। मैनेजमेंट ने वर्करों से अंडरटेकिंग देने को कहा। शर्त थी, वर्कर कोई मांग नहीं करेंगे। वर्करों ने साइन करने से मना कर दिया।

इसमें लिखा था कि श्रमिक कंपनी से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष कोई भी मांग नहीं मांग सकते।

वर्करों ने प्रबंधन से कहा कि उन्हें ड्यूटी पर कंपनी के अंदर कार्य के लिए जाने दिया जाए लेकिन कंपनी प्रबंधन ने यूनियन गतिविधियों की वजह से सभी श्रमिकों का लगातार गेट बंद रखा।

कंपनी ने श्रमिकों की यूनियन गतिविधियों की वजह से 20 श्रमिकों को निकाल सभी श्रमिकों का गेट बंद कर दिया।

इसके बाद तीन महीने तक वर्करों का प्रदर्शन चला। इसी बीच 31 मई को मैनेजमेंट की शिकायत पर पुलिस ने 426 वर्करों को जेल भेज दिया।

इसमें 35 महिला मज़दूर और वर्करों के परिजन बीबी बच्चे भी शामिल थे। अप्रैल में 12 को छोड़कर सभी बाइज्जत बरी हो गए।

अभी 12 श्रमिकों का माननीय न्यायालय में केस चल रहा है।

कोर्ट में केस अभी भी चल रहा है।  ढाई साल से ये वर्कर दर दर की ठोकर खाने पर मज़बूर हैं। इस कंपनी में 18 राज्यों के मज़दूर थे, जिनमें महिलाएं भी शामिल थीं।

सभी लोग आज भी आईसन कंपनी में नौकरी पाने के लिए कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहे हैं।

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