हिंदू अख़बार ने आईटी वर्करों के पक्ष में लिखा संपादकीय, कहा- यूनियन बनाने का अधिकार बुनियादी है

कर्नाटक सरकार द्वारा आईटी उद्योग को 15 साल से मिल रहे श्रम क़ानूनों से छूट को पांच साल और बढ़ाने की घोषणा के बाद अग्रणी अंग्रेज़ी अख़बार ने खुलकर कर्मचारियों के यूनियन बनाने के अधिकार को बुनियादी बताया है।

सात जून को हिंदू बिज़नेस लाइन ने आईटी कर्मचारियों को संगठित होने और यूनियन बनाने के पक्ष में संपादकीय लिखा है।

अपने संपादकीय में अख़बार ने आईटी सेक्टर के प्रबंध को यूनियन से झिझकना छोड़ देने की बात कही है।

आख़बार का कहना है कि टेक्नोलॉजी में आए विकास ने पहुंच को बहुत बढ़ा दिया है और काम के तौर तरीके भी बदल रहे हैं ऐसे में यूनियन कार्पोरेट के कामों में मदद ही करेंगी।

इस पूरे संपादकीय का अद्यतन रुपांतरण यहां साभार प्रकाशित किया जा रहा है।

हिंदू बिज़नेस लाइन का संपादकीय- ‘संगठित होने का अधिकार है’.

भारत के आईटी उद्योग में वर्करों के यूनियन को लेकर डर ग़ैरज़रूरी है.

कर्नाटक सरकार द्वारा आईटी सेक्टर की कंपनियों के लिए इंडस्ट्रियल एम्प्लायमेंट (स्टैंडिंग ऑर्डर्स) एक्ट, 1946 से पांच साल के लिए और छूट देने की इजाज़त देना दुर्भाग्यपूर्ण है। इस क़ानून के तहत वर्करों को यूनियन बनाने का अधिकार होता है।

कर्नाटक में केवल आईटी उद्योग ही जो इस तरह की दोहरी नीति का फायदा उठा रहा है. इस तरह की छूट तब दी गई थी जब यह सेक्टर उभर रहा था और ढीले ढाले क़ानूनों की ज़रूरत थी ताकि ये सेक्टर और आगे बढ़ पाए।

लेकिन अब मामला बिल्कुल बदल गय है। आईटी सेवाएं भारत के कुल निर्यात में एक तिहाई हिस्सा हैं और कर्नाटक के कुल निर्यात का दो तिहाई हिस्सा हैं।

और अगर सबसे कम कर देखा जाए तो भारत का आईटी सेक्टर 181 अरब डॉलर का व्यवसाय है और पूरी दुनिया के आउटसोर्सिंग सर्विस में इसकी 55 प्रतिशत की हिस्सेदारी है।

साफ़ है कि अब ये उद्योग स्टार्टअप का महज कोई छोटा समूह भर नहीं रह गया है। बल्कि अब मैन्युफ़ैक्चरिंग सेक्टर या ऐसे ही किसी अन्य सेक्टर के बराबर आ खड़ा हुआ है, जहां यूनियनें हैं।

the-Hindu-Business-Line @the Hindu

अब समय आ गया है कि आईटी उद्योग यूनियन और सामूहिक वेतन समझौते के प्रति अपने इस झिझक वाले रवैये से पल्ला झाड़ ले।

आईटी मैनेजरों का तर्क है कि यह उद्योग अपने कर्मचारियों के साथ अच्छे बर्ताव के लिए जाना जाता है, उन्हें अच्छे पैकेज दिए जाते हैं, काम में घंटा लचीला रखा जाता है और उन्हें अपनी कुशलता बढाने का मौका दिया जाता है।

बेशक ये बात सही है लेकिन ये तर्क आईटी सेक्टर में वर्करों को संगठित होने के दावे को ही सही ठहराता है, न कि इसे नकारे की वकालत करता है।

ख़ासकर कर्मचारियों के हितों की रक्षा करने वाली यूनियनें उत्पादन प्रक्रिया में मददगार ही साबित होंगी, न कि बाधक होंगी। इस बात के बहुत सारे उदाहरण हैं जहां पूरी दुनिया में यूनियनें कार्पोरेट रणनीति और प्रदर्शन में मुख्य भूमिका निभाती हैं।

उग्र यूनियन संघर्षों का भूत अब भारत ही नहीं, बल्कि कहीं भी नहीं हैं, जैसा कुछ दशक पहले था।

इसके अलावा संविधान की धारा 19 वर्करों को अपनी यूनियन बनाने और सामूहिक वेतन समझौते का अधिकार देता है। यूनियन बनाने के अधिकार देने से मना करना लोकतंत्र या समाजिक स्थिरता के लिए ठीक नहीं है, वो भी तब जबकि अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी की युग में काम का तौर तरीका बदल रहा है और टेक्नोलॉजी की पहुंच बढ़ रही है।

ऑटोमेशन और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से संबंधित कम कुशलता वाली आईटी नौकरियों के मद्देनज़र भारत ही नहीं और बाहर के आईटी सेक्टर में एक किस्म की अनिश्चितता है। कर्मचारियों को यूनियन बनाने का अधिकार देने से, असल में, औद्योगिक रिश्तों के माहौल में ये रचनात्मक भूमिका ही निभाएगा।

यूनियन के प्रति कार्पोरेट जगत में मौजूदा विरोध से टेक्नोलॉजी उद्योग के वर्कर उन तौर तरीकों पर चिंतन करने पर मज़बूर होंगे जो अन्य उद्योगों में यूनियनें ऐतिहासिक रूप से अपनी मोलभाव की क्षमता और संगठित होने की संवैधानिक गारंटी का दुरुपयोग करके आजमाती रही हैं।

उन्हें अब ये समझ ही होगा कि पूरी दुनिया में काम के तौर तरीके बदल रहे हैं और उन्हें आईटी नौकरियों के बाज़ार में आ रहे परिवर्तनों के साथ तालमेल बिठाने के लिए अपने सदस्यों को तैयार करना चाहिए।

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