होंडा ठेकेदारों की ओर से प्रति वर्ष सेवा के लिए 15000 रु. की पेशकश, मज़दूरों ने ठुकराया

क़रीब एक महीने से संघर्षरत होंडा के कैजुअल मज़दूरों को ठेकेदारों की ओर से प्रति वर्ष 15,000 रुपये का मुआवज़ा देने की पेशकश की जा रही है।

यहां 10-10, 12-12 साल से काम करने वाले कैजुअल मज़दूरों ने इस पेशकश को न मानने की बात कही है।

दो दिसम्बर को जारी एक जैसी सूचना में केसी इंटरप्राइजेज़, कमल इंटरप्राइजेज़, सुखमा संस एंड एसोसिएट्स की ओर से मज़दूरों को अपना हिसाब लेने की बात कही गई है।

सूचना में सभी श्रमिकों से अपील की गई है कि वे अपना हिसाब कार्यालय से ले लें और इसके अलावा प्रति वर्ष की सेवा के लिए 15,000 रुपये देने की पेशकश की गई है।

मज़दूरों में ऐसी भी चर्चा है कि समझौते में हर मज़दूर को प्रति वर्ष सेवा के बदले 20,000 रुपये देने की बात पर ट्रेड यूनियन नेताओं की भी सहमति बन गई थी।

हालांकि मज़दूरों ने प्रति वर्ष सेवा के बदले एक लाख रुपये की मांग रखी थी।

कम से कम 10 लाख रु. मिलने चाहिए

कुछ मज़दूरों ने नाम न ज़ाहिर होने की शर्त पर कहा कि, “अगर 15-20 हज़ार का ही मुआवज़ा मिलना था तो एक महीने की हड़ताल के बिना भी ये मिल सकता था।”

उन्होंने कहा कि “इतने दिनों तक कैजुअल के रूप में काम करने के पीछे ये उम्मीद थी कि उन्हें कभी न कभी परमानेंट कर दिया जाएगा, लेकिन ज़िंदगी के बेशकीमती 10 साल गुजारने के बाद अब कंपनी चाहती है कि डेढ़ दो लाख लेकर मामले को रफ़ा दफ़ा कर दिया जाए।”

उनका कहना है कि अगर 10 साल तक किसी कैजुअल मज़दूर ने काम किया है तो उसे प्रति वर्ष की सेवा के लिए एक लाख रुपये के हिसाब से 10 लाख रुपये कम से कम मिलने ही चाहिए।

गौरतलब है कि लगातार छंटनी से प्रभावित कैजुअल मज़दूरों ने पांच नवंबर से कंपनी के अंदर और बाहर अनिश्चितकालीन हड़ताल कर दी थी।

हड़ताल के 14 दिनों बाद प्लांट के अंदर बैठे कैजुअल मज़दूर कई ट्रेड यूनियनों के संघ ट्रेड यूनियन काउंसिल (टीयूसी), होंडा में सक्रिय परमानेंट मज़दूरों की यूनियन, डीएलसी के बीच हुए समझौते के बाद बाहर निकले।

तबसे क़रीब ढाई हज़ार मज़दूर प्लांट के बाहर धरने पर बैठे हैं। होंडा मैनेजमेंट ने आश्वासन दिया था कि प्लांट से निकलने के दो दिन के अंदर को सकारात्मक फैसला करेंगे।

लेकिन वार्ता में शामिल रहे टीयूसी नेता अनिल पवार का कहना है कि अब मैनेजमेंट वार्ता में भी आना बंद कर दिया है।

वार्ता रुकी

वार्ता में कोई प्रगति न होता देख मज़दूरों में आक्रोश बढ़ रहा है। कुछ मज़दूरों ने वर्कर्स यूनिटी को बताया कि अब कैजुअल वर्कर संगठन बनाकर लड़ने की सोच रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि गुड़गांव से धारूहेड़ा और रेवाड़ी तक कंपनियों में बहुसंख्या होने के बावजूद कैजुअल वर्करों का अपना कोई संगठन या ट्रेड यूनियन नहीं है।

होंडा के परमानेंट मज़दूरों की यूनियन के प्रतिनिधियों का कहना है कि मज़दूर अपनी जायज मांगों को लेकर संघर्ष कर रहे हैं और मैनेजमेंट को सकारात्मक सोच के साथ इसका समाधान करना चाहिए।

जबसे कैजुअल मज़दूर धरने पर बैठे हैं, यूनियन उनका समर्थन कर रही है और इसकी वजह से यूनियन के छह पदाधिकारियों को मैनेजमेंट ने निलंबित कर दिया है।

हालांकि यूनियन कैजुअल मज़ूदरों के हड़ताल में शामिल नहीं हुई, लेकिन बाहर से समर्थन देना जारी रखा।

व्यापक समर्थन

लेकिन पूरे इलाक़े की तमाम कंपनियों की यूनियनों, मज़दूरों, प्रतिनिधियों ने होंडा आंदोलन को अपना समर्थन दिया है।

इसे लेकर दो बार मानेसर से गुड़गांव में डीसी ऑफ़िस तक पैदल और मोटर साइकिल यात्र निकालकर ज्ञापन भी दिया गया।

अनिल पवार ने बताया कि तीन दिसम्बर को मानेसर और गुड़गांव में मानव शृंखला बनाने और छह दिसम्बर को एक सम्मेलन करने की घोषणा हुई है।

वो कहते हैं, “छंटनी को लेकर श्रम कार्यालय का रवैया बहुत रूखा और उदासीन है। जनवरी से अबतक 14 ज्ञापन दिए गए लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। अगर किसी किस्म की औद्योगिक अशांति फैलती है तो मैनेजमेंट और शासन प्रशासन खुद इसका ज़िम्मेदार होगा।”

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