होंडा आंदोलनः गुड कंडक्ट बांड भरकर परमानेंट मज़दूर गए काम पर

आइएमटी मानेसर में होंडा मोटरसाइकिल एंड स्कूटर इंडिया (HMSI) प्लांट में गुड कंडक्ट बांड भरने के बाद कंपनी में लगभग सभी परमानेंट मज़दूर वापस चले गए हैं।

इसके साथ ही कैजुअल वर्करों की ओर से पांच नवंबर को शुरू की गई हड़ताल के बाद प्लांट में सोमवार से उत्पादन की ख़बरें आनी शुरू हो गई हैं।

दैनिक जागरण अख़बार ने प्लांट में उत्पादन शुरू होने की बात कही है, जबकि हकीक़त ये है कि कंपनी में सिर्फ 300 स्थाई मज़दूर ही पहुंचे।

जबकि अमर उजाला की ख़बर के अनुसार, गुड कंडक्ट बांड का कुछ मज़दूरों ने विरोध किया। होंडा प्रबंधन ने स्थाई कर्मचारियों से 22 नवंबर को ड्यूटी पर आने का नोटिस दिया था लेकिन 25 नवंबर तक केवल 300 कर्मचारी ही अंदर गए।

ये सभी कर्मचारी गुड कंडक्ट बांड भर कर ही अंदर गए।

11 नवंबर को प्लांट में अनिश्चित काल के लिए प्लांट को मैनेजमेंट ने बंद कर दिया था। हालांकि पांच नवंबर के बाद से ही कंपनी में उत्पादन ठप पड़ गया था।

प्लांट के अंदर की जानकारी रखने वाले एक मज़दूर ने वर्कर्स यूनिटी को बताया कि बिना कैजुअल मज़दूरों को प्लांट में विधिवत उत्पादन टेढ़ी खीर है।

कंपनी के कुछ सूत्रों का दावा है कि मोटरसाइकिल उत्पादन शुरू हो गया है लेकिन स्कूटी की लाइन अभी भी बंद है।

पांच नवंबर को टूल डाउन कर अंदर बैठे क़रीब 1800 कैजुअल मज़दूरों ने होंडा ट्रेड यूनियन और ट्रेड यूनियन काउंसिल (टीयूसी) के साथ मैनेजमेंट के आश्वासन के बाद 18 नवंबर को बाहर निकलने का फैसला किया।

बांड भरने का विरोध

मैनेजमेंट ने सभी स्थाई मज़दूरों को काम पर लौटने के लिए 28 नवंबर की तारीख़ तय की है इसके बाद न आने वाले मज़दूरों पर कार्रवाई की चेतावनी दी है।

गुड कंडक्ट बांड दरअसल विरोध और हड़ताल न करने का एक सहमति पत्र होता है जो गैरक़ानूनी रूप से कंपनियां मज़दूरों पर थोपती हैं।

2012 के मारुति आंदोलन में भी कंपनी ने मज़दूरों पर गुड कंडक्ट बांड भरने का दबाव बनाया था, तब बहुत हंगामा हुआ था।

असल में ये बांड या सहमति पत्र भरने के बाद क़ानूनी रूप से कंपनी का गुलाम बन जाने का ख़तरा होता है, हालांकि इसको अदालत में चुनौती दी जा सकती है और इसकी वैधता को ग़लत ठहराया जा सकता है।

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कंपनी का वादा खोखला साबित हुआ

मैनेजमेंट ने आश्वासन दिया था कि कैजुअल मज़दूरों को नरमी दिखानी चाहिए और इसी के बाद मैनेजमेंट कोई सकारात्मक निर्णय लेगा।

लेकिन बाहर निकलने के बाद एक हफ़्ता होने को है, मैनेजमेंट कोई सकारात्मक बातचीत करने की बजाय होंडा एम्प्लाईज़ यूनियन के प्राधन सुरेश गौड़ समेत बॉडी के पांच सदस्यों को निलंबित कर दिया।

साथ ही मैनेजमेंट ने गुड कंडक्ट बांड भरने की शर्त रख दी, जिसके बाद लगभग सभी परमानेंट मज़दूर इसे भरकर अंदर चले गए।

वैसे भी परमानेंट मज़दूर कैजुअल मज़दूरों का केवल बाहर से समर्थन कर रहे थे। जब हड़ताल हुई तो परमानेंट वर्करों की यूनियन उसमें शामिल नहीं हुई, बल्कि मध्यस्थता करती रही।

टीयूसी की अपील पर 22 नवंबर को होंडा के हड़ताली मज़दूरों के साथ अन्य ट्रेड यूनियनों से जुड़़े नेता और मज़दूरों ने मानेसर से गुड़गांव तक 22 किलोमीटर का पैदल मार्च किया।

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मज़दूरों ने होंडा कंपनी प्रबंधन की मनमानी के ख़िलाफ़  डिस्ट्रिक्ट कमिश्नर को ज्ञापन सौंपा, लेकिन अभी तक इस मामले का कोई हल नहीं निकला है।

कुछ मज़दूर प्लांट के अंदर से धरना तोड़ने की बात से दबी ज़ुबान में ही असहमत दिखे, तो नेताओं को लगता है कि मैनेजमेंट अपना वादा निभाएगा।

एक मजदूर नेता ने कहा कि मैनेजमेंट आंदोलनरत मज़दूरों को थका देने की रणनीति पर अमल कर रहा है और कैजुअल मज़दूरों का अपना नेतृत्व न होने से वो निर्णय लेने में आत्मनिर्भर नहीं हो पा रहे हैं।

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