होंडा परमानेंट वर्करों के इंसेटिव काटने पर विवाद, कंपनी पीछे हटी

होंडा मानेसर में 72 दिन बाद भी प्रोडक्शन पूरी तरह से शुरू नहीं हो पाया है। इस बीच परमानेंट वर्करों का इंसेटिव भी कंपनी ने रोक दिया।

पांच नवंबर से धरने पर बैठे क़रीब ढाई हज़ार कैजुअल मज़दूरों को निकालने के बाद कंपनी ने 1000 नए कैजुअल वर्करों की भर्ती की है।

लेकिन अनुभव की कमी के चलते कंपनी में पूरी तरह प्रोडक्शन नहीं हो पा रहा है।

हड़ताल पर बैठे मज़दूरों ने बताया कि कंपनी ने परमानेंट मज़दूरों का पिछले महीने का इंटेंसिव भी काट लिया है।

इसे लेकर परमानेंट वर्करों में भी खासा रोष दिखाई दे रहा है। हालांकि अभी कंपनी ने एक नोटिस लगाकर वादा किया है कि अगले महीने की सैलरी में ये जोड़ दिया जाएगा।

वर्तमान होंडा यूनियन के कुछ सदस्यों को कंपनी ने निलंबित भी कर रखा है।

कैजुअल वर्करों की समझौता वार्ता में ये भी सवाल जुड़ गया है और उनकी मांग है कि जबतक सारे मसलों का हल नहीं निकलता, हड़ताल जारी रहेगी।

उल्लेखनीय है कि नए कैजुअल वर्करों को 3000 रुपये अधिक सैलरी पर रखा गया है और कंपनी पुराने वर्करों को वापस लेने पर राजी नहीं है।

निकाले गए कैजुअल वर्करों का कहना है कि वे दस दस साल से काम कर रहे हैं और जब परमानेंट करने का समय आया, कंपनी ने मंदी का बहाना बनाकर छंटनी शुरू कर दी।

परमानेंट और कैजुअल वर्करों के बीच सैलरी और सामाजिक सुरक्षा की बहुत बड़ी खाई है।

जहां परमानेंट मज़दूरों को 70,000 रुपये के क़रीब वेतन मिलता है वहीं कैजुअल वर्करों को 14000 रुपये दिया जाता था इस आश्वासन में कि वो भी कभी परमानेंट हो जाएंगे।

पिछले ढाई महीने से डीएलसी, डीसी, दुष्यंत चौटाला आदि से मिलने के बावजूद होंडा विवाद का कोई समाधान होता नहीं दिख रहा है।

उधर मज़दूर कड़ाके की ठंड में भी, भारी किल्लत झेलते हुए मैदान में डटे हुए हैं।

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