मज़दूर नहीं चुका पाया बिल तो अस्पताल ने निकाल लीं आंखें और किडनी

आंध्र प्रदेश के नेल्लोर ज़िले में एक दिहाड़ी मज़दूर के साथ बिल के बदले किडनी निकाल लेने की वारदात सामने आई है.

बीबीसी की एक ख़बर के अनुसार, एक दुर्घटना में मज़दूर बुरी तरह घायल हो गया था उसके सिर में गंभीर चोट आ गई थी.

हालांकि उस मज़दूर की जान नहीं बच पाई लेकिन जबतक डाक्टरों ने उसे ब्रेन डेड घोषित किया तबतक अस्पताल का बिल 1 लाख 28 हज़ार रुपये हो चुका था.

नेल्लोर के उप्पिदीगुंटा गांव के रहने वाले मज़दूर इकोल्लु श्रीनिवास की पत्नी अरुणा ने आरोप लगाया कि अस्पताल का बिल न चुका पाने की वजह से अंगदान के लिए मजबूर किया गया.

परिवार का कहना है कि अस्पताल ने उन्हें 1 लाख 28 हज़ार रुपये का बिल थमा दिया जिसे चुकाने में वो असमर्थ थे.

अरुणा का दावा है कि उन्होंने दिए गए सभी दस्तावेज़ों पर अस्पताल के कहने पर हस्ताक्षर कर दिए.

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ईंट भठ्ठों पर देश की ग़रीब मज़दूर जनता के साथ होने वाले अकल्पनीय अत्याचारों पर सरकार और पुलिस प्रशासन भी आंखें मूदे रहता है। सांकेतिक तस्वीर। साभारः TadrosGamal
ज़िंदा होने के बावजूद शुरू कर दी प्रक्रिया

उनके अनुसार, “मैं शुक्रवार सुबह, 18 अप्रैल, को अस्पताल गई थी. उन्होंने मुझसे 1,28,000 रुपए चुकाने के लिए कहा. मैंने कहा कि हम ग़रीब लोग हैं और इतना पैसा हमारे पास नहीं है. उन्होंने कहा कि अगर बिल नहीं चुकाया तो हम मृतक की आंखें और किडनी रख लेंगे.”

वो कहती हैं, “उन्होंने मुझे कुछ काग़ज़ दिए और हस्ताक्षर करने के लिए कहा. उन्होंने मेरे पति को ले जाने से पहले मुझे एक बार चेहरा दिखाया. उनका मुंह खुला हुआ था और वो सांस ले रहे थे. पाइप लगी हुई थी.”

“मैंने पूछा कि क्या मैं उनसे बात कर सकती हूं. उन्होंने कहा नहीं और वो उन्हें ले गए. जब भर्ती कराया गया तो हम साथ नहीं थे. अगर हम होते तो ऐसा नहीं होता. हम दोनों ईंट भट्टे पर काम करते थे. हमारे तीन बच्चे हैं. अब मैं अकेले कैसे अपने बच्चे पालूंगी?”

अरुणा की शिकायत के बाद हुई जांच में भी अस्पताल दोषी पाया गया लेकिन अस्पताल का कहना है कि उसने बिल माफ़ करने के अलावा श्रीनिवास के परिवार को 20 हज़ार रुपए भी दिए थे. हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हुई है.

एकता गई तो जुल्म बढ़ गया

लेकिन ग़रीब मज़दूरों पर कार्यस्थल से लेकर इलाज़, शिक्षा और न्यायिक प्रक्रिया में होने वाली अमानवीय अत्याचार का ये नमूना बन गया है.

असंगठित क्षेत्र में होने के नाते श्रीनिवास के परिवार को मज़दूर कल्याण कोष से मदद मिलनी चाहिए, लेकिन ये मदद मिल पाएगी, कहना मुश्किल है.

जैसे जैसे संगठित मज़दूर आंदोलन कमज़ोर होता जा रहा है, मज़दूरों के साथ आए दिन होने वाले अत्याचार की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं.

तात्कालिक जीवन यापन की चुनौती और मज़दूर वर्ग के बीच धर्म जाति को लेकर बढ़ती दरार ने उनकी ताक़त को कमज़ोर किया है.

अगर मज़दूर वर्ग खुद को इकट्ठा नहीं करता, शासन को अपने हाथ में लेने के ऐतिहासिक लक्ष्य पर ध्यान नहीं देता, आने वाला समय इससे भी बुरा होने से कोई नहीं रोक सकता.

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