आईटी सेक्टर को श्रम क़ानूनों से 5 साल की और छूट, यूनियनों-इंजीनियरों ने जताया विरोध

कर्नाटक की राज्य सरकार ने आईटी उद्योगों को पांच साल और स्पेशल छूट की घोषणा की है। यानी इस दौरान आईटी कंपनियों को श्रम क़ानूनों को लागू न करने की आज़ादी होगी।

डेक्कन हेराल्ड की ख़बर के अनुसार, सरकार के फैसले से ट्रेड यूनियनों ने काफ़ी रोष व्याप्त है। इनफ़ार्मेशन टेक्नोलॉजी में काम कर रहे कर्मचारियों ने सरकार के इस फैसले की आलोचना की है।

उनका कहना है कि इससे आईटी उद्योग में मनाना काम कराने और उत्पीड़न की छूट जारी रहेगी, जिसे ख़त्म करने की कई सालों से मांग हो रही है।

फ़ोरम फ़ार आईटी एम्प्लाईज़ के कर्नाटक के अध्यक्ष राजेश एन ने डेक्कन क्रानिकल को बताया कि ये बहुत बुरा काम हुआ है।

उन्होंने कहा कि आईटी सेक्टर पिछले 15 सालों से श्रम क़ानूनों को लागू न करने की छूट पाता रहा है।

वो कहते हैं, “सरकार को लगता है कि उसके इस कदम से कंपनियां और रोज़गार पैदा करेंगी। लेकिन इस समय ये कंपनियां इन क़ानूनों का फायदा उठाकर जो चाह रही हैं अपनी मनमर्ज़ी से कर रही हैं।”

पिछले साल 10,000 आईटी इंजीनियर बेरोज़ग़ार

कर्नाटक आईटी एंड आईटी एनाबल्ड एम्प्लाईज़ यूनियन (केआईटीयू) के अध्यक्ष वीजेके नायर के अनुसार, कर्नाटक में 10,000 कर्मचारी अकेले पिछले साल ही छंटनी, टर्मिनेशन आदि की की मार झेल चुके हैं।

नायर का कहना है कि ये कंपनियां स्पेशल स्टेटस पाने की वजह से जो चाह रही हैं कर रही हैं।

ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस के सेक्रेटरी सत्यानंद एम ने सरकार की इस बात पर आलोचना की है कि ये स्पेशल स्टेटस की सीमा बढ़ाने से पहले उसने यूनियनों से बात तक नहीं की।

डेक्कन हेराल्ड से उनका कहना है कि इस मनमाना कदम से राज्य सरकार ने 10 लाख आईटी वर्कर्स के हालात को नज़रअंदाज़ किया है।

एक जानी मानी कंपनी मान्यता टेक पार्क में काम करने वाले एक आईटी वर्कर ने बताया कि श्रम क़ानूनों में छूट मिलने से इस सेक्टर में उत्पीड़न चरम पर पहुंच गया है। न काम के घंटे तय हैं न, निश्चित सैलरी है और न अन्य सुविधाएं।

वो कहते हैं, “मुझे ठेके पर एक कंस्लटेंसी कंपनी ने हायर किया था। मुझे 3 लाख रुपये सालाना पैकेज देने की बात कही गई थी। लेकिन जब मैं ठेके के अंदर ठेके पर रखा गया तो मेरी तनख्वाह आधी हो गई। और विडंबना ये है कि मैं इसकी शिकायत भी किसी से नहीं कर सकता।”

श्रम क़ानूनों से आज़ादी

स्पेशल छूट मिलने पर आईटी कंपनियों को एक कमेटी बनानी होती है जो यौन उत्पीड़न और कर्मचारियों की अन्य शिकायतों का निपटारा करती है।

हालांकि जब लेबर डिपार्टमेंट ने इन कंपनियों का सर्वे किया तो पता चला कि 50 कर्मचारियों की शिकायत पर केवल 48 कंपनियों ने ही सुनवाई की।

सत्यानंद कहते हैं कि इसका मतलब ये हुआ कि राज्य में केवल 48 कंपनियों में ही ये कमेटियां बनी हैं, जबकि अकेले बेंगलुरू में ही 1800 आईटी कंपनियां रजिस्टर्ड हैं।

उधर राज्य के डिपार्टमेंट ऑफ़ इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के डायरेक्टर एसएस नकुल ने सरकार के इस कदम का बचाव किया है।

उनके अनुसार, “आईटी कंपनियां इनफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों जैसी नहीं होती हैं, जिनके काम का आंकलन किया जा सके। ये छूट देने से कंपनियों और स्टार्टअप को कुछ नया करने की आज़ादी मिलती है। उन्हें कुछ तो आज़ादी मिलनी ही चाहिए।”

लेकिन आईटी इंजीनियनों के काम के हालात बदतर हैं, इस पर वो और सरकार चुप्पी लगा जाते हैं।

कर्नाटक में कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर की गठबंधन सरकार है। कांग्रेस से संबद्ध यूनियन ने भी इस पर विरोध दर्ज कराया है।

कुछ ट्रेड यूनियन नेताओं का कहना है कि इससे पता चलता है कि श्रम कानूनों को लेकर कांग्रेस का भी रवैया अन्य सरकारों से अलग नहीं है।

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