मज़दूरों के नाम पर इकठ्ठा किये गए करोड़ों रुपए कहाँ गये ?

by:नित्यानंद गायेन 

बीते मंगलवार को कंस्ट्रक्शन बंद होने पर निर्माण मज़दूरों को दिहाड़ी न देने के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र और दिल्ली सरकार को कड़ी फटकार लगाई है।

कोर्ट ने केंद्र और दिल्ली सरकार से पूछा है कि मज़दूरों के कल्याण के नाम पर इकठ्ठा किये गए हजारों करोड़ रुपए

जब निर्माण काम पर रोक लगी होती है तब श्रमिकों की मज़दूरी देने के लिए इसका इस्तेमाल क्यों नहीं किया जाता ?

दिल्ली निर्माण मजदूर
दिल्ली निर्माण मजदूर@दिल्ली निर्माण मजदूर
श्रमिक कल्याण के नाम पर करोड़ों रुपए

अदालत ने कड़े शब्दों में केंद्र और दिल्ली सरकार से कहा कि जब आप निर्माण कार्य पर रोक या प्रतिबन्ध लगा देते हैं तब मज़दूरों को बिना वेतन रहना पड़ता है।

चीफ़ जस्टिस राजेन्द्र मेनन और जस्टिस ए जे भम्भानी की बेंच ने कहा कि-कर्मचारियों के कल्याण के लिए बिल्डरों और उपभोक्ताओं से सेस के रूप में हजारों करोड़ रुपये इकट्टा किए जाते हैं,

लेकिन सरकारें मजदूरों को एक पैसा नहीं दे रही हैं और मज़दूर बिना काम भूखा रहने पर मज़बूर हो जाता है।

 

सरकार की जवाबदेही तय होनी चाहिए

कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई करते हुए कहा है कि मज़दूरों के प्रति केंद्र और राज्य सरकार की जवाबदेही तय होनी चाहिए।

इस मामले में अदालत ने दोनों सरकारों से जवाब माँगा है।

अदालत के दो सदस्यीय बेंच ने भवन व अन्य निर्माण श्रमिक कल्याण बोर्ड (बी ओ सी डबल्यू ) के उस जवाब में पूछा है जिसमें बोर्ड ने कहा था कि

वह कल्याणकारी फंड से ग़ैरपंजीकृत मज़दूरों को मज़दूरी का भुगतान नहीं कर सकता। क्योंकि यह उसके नियम के अधीन नहीं आता है।

इस सवाल के जवाब में कोर्ट ने पूछा है कि यदि मज़दूर कल्याण एक्ट और सेस एक्ट 1996 के तहत इकठ्ठा किये गए करोड़ों रुपए

असंगठित मज़दूरों को नहीं दिया जा सकता जब निर्माण कार्य पर रोक लगी हो तो ऐसे में यह पैसे क्यों इकठ्ठा किया गया है ?

दिल्ली निर्माण मजदूर
दिल्ली निर्माण मजदूर@दिल्ली निर्माण मजदूर
लाखों मज़दूर बिना मज़दूरी भूखे रहने पर मज़बूर

गौरतलब है कि दिल्ली एनसीआर क्षेत्र में किसी न किसी बहाने समय -समय पर निर्माण कार्यों पर आंशिक और दीर्घकालिक रोक लगती रहती है।

इन तमाम निर्माण कार्यों में अधिकतर प्रवासी  और  असंगठित मज़दूर किसी निजी ठेकेदार के अधीन कार्य करने आते हैं।

किन्तु  जब किसी सरकारी आदेश या अदालती आदेश के बाद निर्माण कार्यों पर रोक लग जाती है, तब ये लाखों मज़दूर बिना मज़दूरी भूखे रहने पर मज़बूर हो जाते हैं।

ऐसे में दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा सरकारों को जवाबदेही तय करने की बात कुछ उम्मीद जगाती है।

 

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