भीमा कोरेगांवः जेल में बंद कार्यकर्ताओं कि रिहाई के लिए दिल्ली में आज प्रदर्शन

मज़दूरों, किसानों, आदिवासियों, दलितों और अल्पसंख्यकों खासकर मुसलमानों पर भारत सरकार के बढ़ते दमन के ख़िलाफ़ आठ जून को जंतर मंतर पर एक विशाल धरना आयोजित हो रहा है।

कार्यक्रम ‘किस किस को कैद करोगे’ में क़रीब 35 संगठन शामिल हैं जो मज़दूरों, आदिवासियों के हितों के लिए आवाज उठाने वाले जेल में बंद सामाजिक कार्यकर्ताओं को रिहा करने की मांग कर रहे हैं।

इस संगठनों ने एक जनता और ख़ास कर मज़दूर वर्ग से अपील की है कि वो सरकारी दमन के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद करें, क्योंकि भारत सरकार सबसे पहले मज़दूर वर्ग के हितैषियों को जेल में डाल रही है, ताकि जब मज़दूर वर्ग पर हमला हो तो कोई आवाज़ उठाने वाला बचा ही न रहे।

इस प्रदर्शन की तीन प्रमुख मांगें हैं-

1- मुंबई में रिलायंस एनर्जी के मज़दूरों पर झूठे आरोप लगाकर कई महीनों से जेल में बंद करके रखा गया है, उन्हें तुरंत रिहा किया जाए।

2- भीमा कोरेगांव मामले में झूठे आरोप गढ़कर गिरफ़्तार किए गए वकील, प्रोफ़ेसर, कवि और सामाजिक कार्यकर्ताओं को तुरंत रिहा किया जाए।

3- ग़ैरक़ानूनी गतिविधि निरोधी क़ानून (यूएपीए) को तुरंत रद्द किया जाए।

इन संगठनों ने मज़दूर वर्ग को एक दिल छू देने वाला पत्र लिखा है।

मज़दूर वर्ग के नाम अपील-

एक जमाना था जब मजदूरों ने संघर्ष द्धारा आठ घंटे के मजदूरो, सम्मानजनक जीवन को पाया था और सरकार को कल्याणकारी होने पर बाध्य किया था।

आज पूरी दुनिया की तरह हमारे देश के मजदूरों पर भी पूंजीपति¬-सरकार गठजोड का साझा हमला हो रहा है। आये दिन मजदूर मालिक के मुनाफारुपी हवस का शिकार बन रहे हैं।

वहीं दूसरी तरफ बेरोजगारी के ये आलम है कि उन्हें 12 घंटे का अमानवीय काम, ओवरटाइम और अनुबंध पर काम करना पड़ रहा है।

इन सबके बावजूद मजदूर की संतान दो वक्त खाने, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा से वंचित है।

यदि कोई मजदूर आवाज उठाए तो उसके मालिक औऱ नुमाइंदे, पुलिस मारते पीटते और गिरफ्तार कर जेल में डाल देते है।

यदि कोई मदद के लिए आता है तो उसे नक्सली, देशद्रोही करार दे दिया जाता है।

एक दशक से ज्यादा समय से काम कर रही वकील और मज़दूर कार्यकर्ता, सुधा भारद्धाज इसकी एक मिसाल हैं।

भींमा कोरेगांव शौर्य दिवस के संबधं में हिंसा फैलाने के झूठे आरोपों में वकील सुरेन्द्र गाडलिंग, प्रोफ़ेसर शोमा सेन, सामाजिक कार्यकर्ता सुधीर, धावले, रोना विल्सन औऱ महेश राउत की गिरफ्तारी को आगामी जून 6 को एक साल पूरा होने जा रहा है।

उसके बाद 28 अगस्त 2018 को कवि वरवर राव, वकील और मज़दूर कार्यकर्ता सुधा भारद्धाज, वकील और लेखक अरुण फरेरा, सामाजिक कार्यकर्ता वरनन गोन्साल्वेस को भी गिरफ्तार कर लिया गया।

यह सिर्फ इन नौ सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी नहीं बल्कि इनके साथ हमारे लोकतन्त्र की, अन्याय औऱ शोषण के खिलाफ उठती हुई हमारी आवाजों की और हमारे मौलिक अधिकारों की गिरफ्तारी है।

सरकार मानती है कि एसे कार्यकर्ता जो जनता के हक औऱ बेहतर जिंदगी जीने के लिए लगातार संघर्ष करते हैं उनको तुरंत गिरफ्तार कर लेने से देश में ‘शाति‘ और ‘सुरक्षा‘ बनी रहेगी।

लेकिन सवाल उठता है कि ये शांति और सुरक्षा किसके लिए है, इससे किसको फायादा हो रहा है?

यकीनन यह शांति और सुरक्षा न तो उन लाखों आत्महत्या को मजबूर किसानों की है, न ही दलितों-आदिवसियों की जो जल जंगल जमीन की लड़ाई लड़ रहे और न ही उन मेहनतकश महिलाओं की जिनका सारा जीवन महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ संघर्ष हैं।

यह शांति और सुरक्षा संभाजी भिड़े (शिव प्रतिष्ठान हिंदुस्तान और राष्ट्र स्वयं सेवक के सरगना) और मिलिंद एकबोटे (समस्त हिन्दू अघाडी के सरगना) जैसे आतंक और हिंसा फैलाने वाले लोगों के लिए है जिन्हें सरकार का पूरा समर्थंन है।

इसीलिए भीमा कोरेगाँव शौर्य दिवस अभियान में हिंसा फैलाने पर, एफ.आई.आर. दर्ज होने और शुरुआती जांच में दोषी पाये जाने के बाद भी यह लोग खुले घूम रहे हैं।

दूसरी तरफ देश भर में ब्राह्मणवादी-साम्राज्यवादी अत्याचारों के खिलाफ आज जब शोषित-पीड़ित-दलित बहुजन, अल्पसंख्यक जनता आवाज़ उठा रही है तो उनको यूएपीए जैसे कानूनों के तंहत जेलों में सालों तक सड़ाया जा रहा है।

सरकार के खिलाफ षड्यंत्र रचने से लेकर, देश में अशांति फैलाने तक के झूठे आरोपों से लदे हुए सामाजिक कार्यकर्ता को मीडिया अपनी खुद की बनाई हुई कहानियों में लपेटकर देश-द्रोही कह सिरे से बदनाम करती आर ही है।

यह बिकी हुई मीडिया भी सिर्फ बड़े पूँजीपतियों और गुंडे नेताओं की चमचागीरी करती है।

आज भी (आज़ाद) देश में हजारों की संख्या में आदिवासी, मजदूर, और अल्पसंख्यक काले कानूनों के तहत झूठे आरोपों में जेल में बंद हैं और अपनी पूरी जवानी जेल में बिताकर बुढ़ापे के दिनों में बाइज्जत बरी हो पाते हैं।

या मुकदमा चलते-चलते ही जेल में दम तोड़ देते हैं। अल्पसंख्यक समुदाय पर सरकारी दमन इस कदर बढ़ा है कि जम्मू-कश्मीर में जमात-ए-इस्लामी संगठन को बिना सबूत सुनवाई के गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया एसे ही झारखंड में मजदूर संगठन एमएसएस और सामाजिक संगठंन पीएफआई को प्रतिबंधित कर दिया गया है।

फासीवादी ताकतें सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल एक तरफ प्रोफेसर साईबाबा को गलत आरोपों और सबूतों के आधार पर लोगों पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ बोलने पर (नक्सलवादी) करार दे दिया है और जानलेवा बीमारियों से ग्रस्त अवस्था में भी उन्हें बेल नहीं दी जा रही है।

दूसरी तरफ, 2002 के गुजरात जनसंहार में दोषी पाए गए बाबू बजरंगी और भीमा कोरेगांव धमाके की अभियुक्त प्रज्ञा ठाकुर जैसे लोग स्वास्थ्य कारणों के आधार पर बाहर घूम रहे हैं या चुनाव जीत कर सांसद बन रहे हैं।

पिछले एक साल में ही सरकारी दमन और आरएसएस-बीजेपी के आतकं के शिकार लोगों कि संख्या हजारों में पहुँच गयी है।

कुछ की नज़ीर देखिए-
  1. सालों से मजदूरों तथा रिलीयंस के अनुबंधित मजदूरों की समस्याओं को उजागर कर रहे 5 मजदूरों को यूएपीए कानून के अंतर्गत गिरफ्तार किया गया। मजदूरों पर नक्सल गतिविधि से जुडे होने और ट्रेड यूनियन के सदस्यों को सरकार के विरुद्ध भड़काने का झूठा आरोप लगाया गया। वो मज़दूर आज भी जेल में बंद हैं।झारखंड के मजदूर संगठन समिति (MSS)  पर प्रतिबंध लगाने के साथ संगठन के कार्यकर्ताओं पर यूएपीए लगा कर जेल में बंद कर दिया गया।
  1. तमिलनाडु में तूतीकोरिन में वेदांता कंपनी के स्टरलाइट काँपर के प्लांट के प्रदूषणकारी प्रभावों के विरोध में 20,000 निहत्थे लोगों के जुलूस पर पुलिस ने गोलीबीरी की जिसमें 13 लोगों की मौत हो गई। ये प्रदर्शनकारी अपनी मांगो को लेकर कलेक्टर आफिस जा रहे थे, तभी पुलिस ने शार्प शूटर लगा कर प्रदर्शनकारियों को मौत के घाट उतारा।
  2. स्वायत्त प्रशासनिक क्षेत्र के लिए लड़ रहे खूंटी, झारखंड के आदिवासियों के पत्थलगढ़ी आंदोलन को सरकार द्धारा दबाने का प्रयास किया जा रहा है। इसमें 3000 से ज्यादा आदिवासियों पर तथा साथ ही इनके लिए आवाज उठा रहे 36 लोगों पर देशद्रोह का आरोप लगा कर जेल में बंद कर दिया गया।
  3. दलित लेखक आनंद तेलतुंबड और झारखंड के सामाजिक कार्यकर्ता स्टैन स्वामी के घर छापा मारा गया। तेलतुंबडे को अदालत के आदेश की अवहेलना करते हुए गिरफ्तार भी किया गया पंरतु लगातार प्रतिरोध के कारण उन्हें छोड़ने पर मज़बूर होना पड़।

ये सूची बहुत लंबी है, अगर आप अपनी याददाश्त पर जोर डालेंगे तो ऐसे हज़ारों मामले मिल जाएंगे।

(वर्कर्स यूनिटी स्वतंत्र निष्पक्ष मीडिया के उसूलों को मानता है। आप इसके फ़ेसबुकट्विटर और यूट्यूब को फॉलो कर इसे और मजबूत बना सकते हैं।)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *