उत्तराखंडः श्रम क़ानूनों में बदलाव पहाड़ी मज़दूरों को बना देंगे गुलाम

अपने अन्य राज्यों की तरह ही उत्तराखंड की बीजेपी सरकार ने यहां मज़दूरों को गुलाम बनाने के पुख़्ता इंतजाम कर दिए हैं।

अब यूनियन बनाने के नियम कड़े कर दिए गए हैं और मालिकों को छूट दी गई है कि 50 से कम मज़दूरों वाले कारखानों, फ़ैक्ट्रियों में कोई श्रम क़ानून नहीं लागू होगा।

इसके अलावा फ़ैक्ट्रियों को लाइसेंस रिन्यू कराने पर भारी छूट दी गई है, यानी मालिकों को श्रम क़ानूनों के उल्लंघन की लंबी छूट मिल जाएगी।

जैसा बीजेपी शासित अन्य राज्यों में हुआ है, यहां भी श्रम क़ानूनों को फ़ैट्री मालिकों के हक में इतना तोड़ मरोड़ दिया गया है कि उत्तराखंडी मज़दूरों के लिए कारखानों में नौकरी करना किसी गुलामी से कम नहीं होगा।

त्रिवेंद्र सिंह रावतके नेतृत्व वाली राज्य की बीजेपी सरकार ने फ़ैक्ट्री और विभागों में कर्मचारी यूनियन को मान्यता देने का नियम और कड़ा कर दिया है। अब उन्हीं यूनियन की मान्यता लेने के लिए एक तिहाई यानी कम से कम 30 प्रतिशत मज़दूरों की सदस्यता ज़रूरी कर दी गई है।

यूनियन पर नकेल डालने की कोशिश

हिंदुस्तान अख़बार के मुताबिक, ‘यूनियन बनाने के नए क़ानून से कर्मचारी यूनियनों पर नकेल कसी जा सकेगी।’

यह नियम लागू होते ही राज्य में कई यूनियनों की मान्यता खटाई में पड़ गई है।

हिंदुस्तान ने सरकारी प्रवक्ता मदन कौशिक के हवाले से कहा है कि पहले यूनियन बनाने के लिए 10 फ़ीसदी सदस्यता ज़रूरी थी, जिससे एक फ़ैक्ट्री में कई यूनियनें बन जाती थीं। इससे कामकाज प्रभावित हो रहा था।

राज्य की कैबिनेट बैठक में ये मज़दूर विरोधी फैसले लिए गए।

मज़दूरों को गुलाम बनाने वाला एक और क़ानून बीजेपी सरकार ने पास किया है। इसके तहत विभागों में काम करने वाली फर्म, एजेंसियां और ठेकेदारों को अब 50 से अधिक कर्मचारी रखने पर ही लाइसेंस लेना होगा।

यानी 50 से कम कर्मचारी रखने पर ठेकेदार को श्रम कानून का पालन करने या सरकार के प्रति जवाबदेही की ज़रूरत नहीं रह जाएगी।

50 से कम मज़दूरों वाले ठेकेदारों को लाइसेंस की ज़रूरत नहीं

पहले ये 20 कर्मचारी के बाद लाइसेंस लेना ज़रूरी था। और श्रम विभाग से लाइसेंस लेना ज़रूरी था।

उल्लेखनीय है कि सिर्फ उत्तराखंड में ही नहीं पूरे देश में दो तिहाई उद्योग मझोले या छोटे किस्म की इकाईयों में काम कराते हैं।

इस तरह राज्य के दो तिहाई मज़दूरों को गुलामों की स्थिति में धकेलने का पूरा इंतजाम बीजेपी सरकार ने किया है।

एक और फैसले में राज्य सरकार ने श्रम विभाग के व्यालर क़ानून 1923 में संशोधन किया है। इसके तहत श्रम विभाग में सहायक निदेशक के पद बढ़ा दिए गए हैं। पहले सहायक निदेशक का सिर्फ एक पद होता था, जो अब चार हो गए हैं।

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