इस चुनाव में मज़दूर के पास विकल्प क्या हैं ? 

By नित्यानंद गायेन

अब जब चुनाव प्रचार अपने चरम पर हैं और 11 अप्रैल से 6 चरणों में शुरू होने जा रहा है। ऐसे में देश के ज्यादातर मज़दूर इस  कशमकश में हैं  कि उसे किस पार्टी को समर्थन व मतदान करना चाहिए?

 प्रवासी मजदूरों का सवाल

मज़दूर रोज़ी रोटी के लिए गाँव से शहर-दर-शहर भटकता है, किन्तु उसका सबसे महत्वपूर्ण नागरिक अधिकार यानी मतदान का अधिकार उससे छीन जाता है।

मज़दूर जब अपने गाँव से देश की राजधानी या फिर किसी अन्य राज्य या शहर में काम की तलाश में जाता है तो उसका वोट गाँव में ही रह जाता है।

इस तरह लाखों नागरिक अपने मताधिकार का उपयोग करने से वंचित रह जाते हैं और दो बार वोट नहीं देने पर वोटर लिस्ट से उनके नाम कट जाते हैं।

ऐसे में उन मजदूरों के सामने क्या विकल्प बचता है ? उन्हें क्या करना चाहिए ?

 

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कहीं चुनाव बहिष्कार तो कहीं प्रत्याशियों से सवाल

इन प्रश्नों पर न तो किसी राजनीतिक दल ने सोचा है, न ही कथित स्वतंत्र चुनाव आयोग ने कुछ कहा है।

अभी दो दिन पहले उत्तराखंड के रामनगर में स्थित डेल्टा के मजदूरों ने बीते कई महीने से वेतन न मिलने पर सरकार की उदासीनता पर रोष प्रकट करते हुये इस लोकसभा चुनाव में अपने परिवार के साथ

मतदान प्रक्रिया का बहिष्कार करने का निर्णय लिया है।

उधर असम में चाय बागान के मज़दूर कई महिनों से मज़दूरी न मिलने के कारण विरोध प्रर्दशन कर रहे है ।

चाय बागान मज़दूर संघर्ष समिति ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगे नहीं मानी गयी तो वे भी इस चुनाव का बहिष्कार करेंगे।

इसी कड़ी में  3 अप्रैल को गुडगाँव के मानेसर स्थित बेलसोनिका ऑटो कम्पोनेंट इंडिया एम्पोलोईज यूनियन ने इस चुनाव के उम्मीदवारों से कुछ सवाल करते हुए  सभी दलों  को दो पन्ने का एक पत्र जारी किया है।

इस पत्र के आरम्भ में यूनियन की ओर से यूनियन के प्रेसिडेंट अतुल कुमार और महासचिव जसबीर सिंह ने लिखा है-

“आज जबकि आप लोकसभा प्रत्याशी देश की बहुसंख्यक मज़दूर-मेहनतकश जनता के पास वोट मांगने आ रहे हैं और बड़े -बड़े वादे कर रहे हैं, तो हम मज़दूर -मेहनतकशों का आपसे भी कुछ सवाल हैं।”

 

घोषणाएं और जवाब

सवालों की फेहरिस्त लम्बी है किन्तु उनके सवाल बहुत अर्थपूर्ण और जायज़ लगते हैं।

ऐसे में इन सवालों का जवाब तमाम दलों और उम्मीदवारों को देना है।

साथ ही मज़दूरों की राजनीति करने वाली तमाम ट्रेड यूनियनों को भी इन सवालों पर गौर करने की आवश्यकता है।

अब जब चुनाव सामने हैं तो सभी पार्टियाँ मजदूरों के लिए कुछ न कुछ घोषणाएं कर रही हैं अपने-अपने घोषणा पत्र में।

कोई  72 हजार हर साल देने की बात कह रहा है तो कोई 18000 न्यूनतम मज़दूरी देने का वादा कर रहा है।

 

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कोई इसे बढ़ा कर 26 हजार करने की मांग के साथ चार्टर जारी कर रहा है ।

15 लाख का वादा करने वाली जुमला पार्टी का तो कोई भरोसा नहीं रहा।

इस बार चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी द्वारा आदर्श आचार संहिता की धड़ल्ले से धज्जियां उड़ाई जा रही है

और चुनाव आयोग उनको हरी झंडी दे रहा है ऐसे में यह चुनाव कितना स्वतंत्र और निष्पक्ष होगा यह एक बड़ा सवाल है।

 

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One thought on “इस चुनाव में मज़दूर के पास विकल्प क्या हैं ? 

  • April 6, 2019 at 6:11 pm
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    Such A big vacuum is there. In spite of very objective conditions for mass uprising political leadership is non existent. Nobody else is responsible except left. Independent left block is only alternative

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