मज़दूर कौन है? डॉक्टर, वकील, इंजीनियर, सुपरवाइज़र क्या मज़दूर हैं? (मज़दूर आंदोलन-1)

(आज से हम माइकल डी येट्स की क़िताब ‘क्या मज़दूर वर्ग दुनिया को बदल सकता है’ का धारावाहिक ‘मज़दूर आंदोलन’ का प्रकाशन करने जा रहे हैं। पढ़ें पहला भाग। सं.) 

मजदूर वर्ग क्या है

सही अर्थों में मजदूर वर्ग क्या है? क्या हर वह व्यक्ति जो मज़दूरी के बदले काम करता है, वह मज़दूर की श्रेणी में आता है?

शायद अमूर्त अर्थ में यह ऐसा ही है। लेकिन दुनिया को बदलने के लिहाज से यह एक बेकार परिभाषा है। पुलिस और जेल रक्षकों की यूनियनें हैं। उन्हें मज़दूरी दी जाती है और वे अपने ऊपर वालों का आदेश पालन करते हैं।

वे स्पष्टतः मजदूर हैं। लेकिन वे दूसरे कर्मचारियों के अधिकारों के समर्थक नहीं हैं, बल्कि इसके ठीक विपरीत हैं, जैसा कि पूँजीवाद के समूचे इतिहास ने दिखाया है।

इससे भी कहीं ज्यादा हास्यास्पद होगा इस श्रेणी में प्रमुख काॅरपोरेट कर्मियों (वकीलों, अकाउंटेंट और दूसरे ऊँचीं तनख्वाह वाली योग्यताओं और पूँजीवाद के समर्थकों सहित) ऊँचे राजनीतिक पदों पर आसीन लोगों, शेयर बाज़ार के कुलीनों इत्यादि को शामिल करना।

जो लोग इन पदों पर विराजमान होते हैं वे तनख्वाह भले ही पाते हों लेकिन वे सभी, जिन्हें हम सामान्यतः मज़़दूर वर्ग मानते हैं उनके हितों में उठाए जाने वाले हर क़दम के ख़िलाफ़ होते हैं।

वे दुनिया को बदलने का इससे अलग कोई अलग तरीक़ा नहीं अपना सकते कि उनकी नौकरी क़ायम रहे, उनके अधिकार बढ़ें और उनकी दौलत में इजाफ़ा हो।

गोल्डमैन सैक्स के मैनेजर को खेत मज़दूर के साथ एक ही वर्ग में शामिल करना एक ऐसे वर्ग की अवधारणा का ही मज़ाक उड़ाना है जो एक नयी दुनिया का निर्माण कर सकता है।

इससे उलट, पेशेवर खिलाड़ी, अभिनेता और संगीतकर्मी, जिनमें से कुछ को कम से कम अमरीका और कुछ दूसरे देशों में बहुत ऊँची तनख्वाह मिलती है, वे बुनियादी बदलाव के सम्भावित सहयोगी हैं।

बेरोज़गार मज़दूर वर्ग का हिस्सा हैं या नहीं?

वे आमतौर पर ग़रीबी में पले-बढ़े होते हैं और उन लोगों से सहानुभूति रखते हैं जो उत्पीड़ित हैं, खासकर अश्वेत लोगों के साथ, जैसा कि अल्पसंख्यक समुदाय के ऊपर पुलिस बर्बता ख़त्म करने की माँग का उनके द्वारा समर्थन किये जाने में दिखायी देता है।

इसके अलावा, इनमें से सभी लोग धनी नहीं हैं और वे भी अधिकांश मजदूरों की तरह ही खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं।

तुलनात्मक रूप से बेहतर तनख्वाह पाने वाले पेशों जैसे– डाॅक्टर, इंजीनियर और काॅलेज के प्रोफ़ेसरों का श्रम भी दिनों-दिन अधिकांश मज़दूरों के समान ही होता जा रहा है।

डाॅक्टर आज निजी प्रेक्टिस करने की जगह अस्पतालों में नौकरी करने लगे हैं। उनकी नौकरी भी दूसरे पेशेवालों की तरह ही श्रम प्रक्रिया के पूँजीवादी नियंत्रण के तमाम आधुनिक तौर-तरीकों का सामना कर रही है, जैसे लगातार निगरानी, योग्यता की अवहेलना, मशीनीकरण, जिसे दूसरे मज़दूर लम्बे समय से झेल रहे है।

अगर हम मज़दूर वर्ग में शामिल होने के लिए मज़दूरी पर काम करने को एक ज़रूरी शर्त मान लें तो करोड़ों लोगों को खो देंगे जिनको मज़दूरी तो नहीं मिलती लेकिन वे ऐसे तरीकों से काम करते हैं जिससे पूँजी को फायदा होता है।

बहुत सारे व्यवसाय जो अक्सर काॅलेज और विश्वविद्यालयों के साथ मिलकर काम करते हैं वे प्रशिक्षुओं से मुफ्त में काम करवाते हैं। कुछ स्कूल इस वजह से इसे बढ़ावा देते हैं ताकि छात्रा उनकी संस्था में दखिला लेंगे।

वे दावा करते हैं कि प्रशिक्षुओं को अनमोल अनुभव हासिल होंगे जिससे उनके लिए स्थायी रोजगार का रास्ता साफ होगा। दूसरी तरफ व्यवसायी को मुफ्त प्रचार और मुफ्त श्रम हासिल होता है।

ट्रेनी मज़दूर

एक हद तक वे प्रशिक्षु आम तौर पर उतना ही काम करते हैं जितना मज़दूरी पाने वाले श्रमिक, और मालिक को उतना ही फ़ायदा पहुँचाते हैं जितना तनख्वाह पाने वाले मज़दूर।

एक ज्यादा बड़े समूह में वे सभी लोग शामिल हैं जो पूरे समय बिना तनख्वाह के उत्पादक श्रम करते हैं और ऐसे प्रयास करते हैं जो श्रम-बल के उत्पादन के लिए बेहद ज़रूरी है।

पूरी तरह महिलाओं से बने इस समूह के काम में न केवल बच्चे पैदा करना, बल्कि उनके लालन-पालन का सारा काम, खाने का सामान खरीदना और पकाना, पालन-पोषण, परिवार में मेहमान-नवाजी और छुट्टियों के दौरान काम, स्कूल के लिए बच्चों को तैयार करना, मोटर चलाना और ऐसे ही तमाम काम शामिल हैं।

इन सभी कामों से मालिकों का काफ़ी मुनाफ़ा बढ़ता है क्योंकि उनको बिना एक भी पैसा खर्च किये कम्पनी की ज़रूरत के लायक, कुशलता में प्रवीण नौजवान कभी मिल जाते हैं, जैसे- आज्ञा पालन, साक्षरता, अच्छी सेहत, प्रतिस्पर्धी होना इत्यादि।

मज़दूर वर्ग के बीच से पूरे समय इन कामों को करने वाले करोड़ों लोगों को बाहर कर देना, उन असंख्य लोगों को अपने से दूर करना है जिनकी परेशानियाँ इतनी ज्यादा हैं कि वे जरूर इस दुनिया को बुनियादी तौर पर बदलना चाहेंगे।

पूँजीवादी अर्थव्यवस्थाओं में बेरोज़गारी जीवन की एक सच्चाई है जो बिना इस्तेमाल मज़दूरों की असंख्य आरक्षित सेना पैदा करती है। इस जमावड़े के ज्यादातर सदस्य साधनहीन होते हैं तथा काम और पैसे के लिए लालायित रहते हैं।

लगभग हमेशा ही ऐसा होता है कि बेरोज़गारों में नस्लीय अल्पसंख्यों की तादाद बहुत ज्यादा होती है चूँकि बेरोजगार सम्भावनाशील मज़दूर होते हैं, इसलिए वे मज़दूर वर्ग के हिस्से हैं।

आधी दुनिया किसान

नियाभर में करोड़ों लोग ऐसे भी हैं जो श्रम-बल में शामिल नहीं हैं, जिनको रोज़गारशुदा के अलावा बेरोजगार के रूप में परिभाषित किया जाता है।

धनी पूँजीवादी देशों में हतोत्साहित मज़दूर, जिन्होंने रोज़गार के अवसर कम होने के चलते काम की तलाश बन्द कर दी, उनकी संख्या पिछले दशक के गम्भीर वित्तीय संकट के दौरान काफी तेजी से बढ़ी।

दूसरे ऐसे लोग भी हैं जिनका श्रम-बाज़ार से छिटपुट जुड़़ाव है लेकिन वे नौकरी पाना चाहेंगे। बेरोज़गारों की तरह ही इनमें से अधिकांश लोगों को भी मज़दूर वर्ग का ही मानना ज़रूरी है।

जाने-माने अर्थशास्त्राी समीर अमीन का कहना है कि आज दुनिया में तीन अरब किसान हैं। किसान अधिकार संगठन ला विया कम्पेसीना कहता है कि दुनिया के आधे लोग किसान हैं।

ये दुनिया के देहातों में रहने वाले छोटे किसान हैं। आगे म देखेंगे कि किस तरह सामन्ती भू-दासों की जमीन छीनकर पूँजीवाद के जन्म को आसान बनाया गया था और किस तरह आज दुनियाभर में जमीन की ऐसी ही चोरी सरकार की मदद और काॅरपोरेट की धमकियों, हिंसा और सन्देहास्पद कानूनी फरमानों के जरिये आज भी जारी है।

इन कार्रवाइयों ने किसानों को उनकी ज़मीन से उजाड़ कर कंगाली और बग़ावत की ओर धकेल दिया है। कई देशों में, यहाँ तक कि धनी देशों में भी किसान आत्महत्या करते आ रहे हैं।

एक अनुमान के अनुसार भारत में हर दिन 47 किसान आत्महत्या करते हैं जिसका कारण उनका कर्ज में दबा होना, खराब मौसम, फसलों की गिरती कीमतें और वैश्विक पूँजीपतियों की लूट की हवस है, जो उनकी जमीनों के बड़े-बड़े टुकड़े खरीदते हैं या ज़बरन कब्जा लेते हैं।

वे उन ज़मीनों पर उन्नत तकनीक और कम लागत से व्यवसायिक खेती करते हैं और किसानों की प्रतिस्पर्धा क्षमता को खोखला कर देते हैं।

लेकिन किसान सिर्फ अपना जीवन ही समाप्त नहीं कर रहे हैं, वे बगावत भी कर रहे हैं भारत को फिर से उदाहरण के तौर पर लें तो चीनी क्रान्तिकारी माओ त्से-तुंग की रचनाओं और कार्रवाइयों से प्रेरित गुरील्लाओं की अगुआई में ये बाग़ी किसान दीर्घकालीन सैन्य कार्रवाई और ज़मीन पर कब्जे में लगे हैं।

माओ की प्रेरणा इसलिए उचित है कि उन्होंने एक किसान सेना के अगुआ के रूप में एक सफल क्रान्ति का नेतृत्व किया था।

(नोटः माइकल डी येट्स की किताब ‘क्या मज़दूर वर्ग दुनिया को बदल सकता है?’ का धारावाहिक। इसका अनुवाद किया है दिगंबर ने और गार्गी प्रकाशन ने इसे प्रकाशित किया है।)

(क्रमशः)

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