गुजरात मॉडल का सचः 17 राज्यों में सबसे कम मज़दूरी गुजरात में

By अमरीश पटेल

गुजरात मॉडल में हिंदुओं में मुसमानों का डर बैठाया जा रहा है और बताया जा रहा है कि अगर कोई रक्षा कर सकता है तो वो है बीजेपी।

मुसलमान को एक ख़ौफ़ में रखा गया है। दोयम दर्जे की तरह उन्हें बुनियादी अधिकारों से भी वंचित रखा गया है।

यानी एक तरफ़ हिंदू और मुसलमान  के बीच फूट डालने की कोशिश की गई।

दूसरी तरफ़ ये साफ़ देखा जा सकता है कि गुजरात में पैदा होने वाली दौलत कुछ चंद पूंजीपति बटोर रहे हैं।

जबकि इस दौलत को गुजरात के मज़दूरों, किसानों, अन्य मेहनतकश वर्ग के लोग पैदा कर रहे हैं।

इसका एक बड़ा हिस्सा बड़े पूंजीपतियों के पास जा रहा है।

इसका बहुत साधारण सा उदाहरण है कि गुजरात में 10,000 रुपये से अधिक की नौकरी ढूंढने में एड़ी चोटी पसीना एक करना पड़ता है।

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राज्य के पूंजीपतियों की दौलत तेजी से बढ़ी

यही कारण है कि अडानी अम्बानी की तरह राज्य के बड़े पूंजीपतियों की दौलत तेजी से बढ़ रही है।

उदारहण के लिए अरविंद ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज़, जाइडस ग्रुप ऑफ़ इंडस्ट्रीज़, इंटास फार्मास्यूटिकल्स और निरमा आदि।

इनकी दौलत बहुत तेजी से बढ़ी है जबकि दूसरी तरफ़ आप देख सकते हैं कि आम मज़दूरों की हालत दिनों दिन खस्ता होती जा रही है।

स्थिति ये है कि गुजरात में न्यूनतम वेतन भी मिल पाए, वही बड़ी बात बन चुकी है।

उनसे 12-12 घंटे काम लिया जा रहा है। कोई श्रम कानून अमल में नहीं लाया जा रहा है।

परमानेंट किस्म के कामों में भी ठेका मज़दूरों को लगाकर उनसे काम कराया जा रहा है।

पूरे देश में बड़ी निर्ममता से गुजरात में ठेकेदारी सिस्टम को लागू किया गया।

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gujrat model @workersunity

बेरोज़गारी से जूझ रहा गुजरात

यहां सरकारी या प्राईवेट क्षेत्र में हर जगह ठेका मज़दूर काम कर रहे हैं।  जबकि आप देखें तो ये सारे काम परमानेंट किस्म के हैं।

हाल के दिनों में बेरोज़गारी की समस्या ने एक भयावह रूप ले लिया है। हार्दिक पटेल का आंदोलन पाटीदारों को आरक्षण देने की मांग को लेकर हुआ।

लेकिन मेरा मानना है कि ये पटेलों का नहीं बल्कि बेरोज़गारों का आंदोलन था।

क्योंकि वो चाहे पटेल हो, ब्राह्मन हो, बनिया हो या दलित हो…बेरोज़गारी से बुरी तरह जूझ रहे हैं युवा।

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इतनी भारी बेरोज़गारी के बीच एक मज़दूर को 7,800 रुपये से अधिक सैलरी नहीं मिल पा रही है।

आज गुजरात में 95 प्रतिशत मज़दूर 10,000 रुपये से कम में काम कर रहा है।

पूरे देश में दौलतमंदों और मज़दूरों की कमाई में जो खाई आज दिखाई दे रही है, गुजरात उसका नायाब उदाहरण है।

यहां कम मज़दूरी देकर अकूत मुनाफा कमा रहे उद्योगपतियों की दौलत आसमान छू रही है, जबकि मज़दूर बदहाल है।

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bihar landless labourer protest @workersunity
तीन मार्च दिल्ली चलो अभियान की तैयारी के लिए इकट्ठा हुए बिहार के करगहर प्रखण्ड के महुली गांव में लोग। (फ़ोटो साभारः मज़दूर पत्रिका)
तीन मार्च को मज़दूरों का संसद मार्च

ठेकाकरण के ख़िलाफ़ हज़ारों मज़दूर 3 मार्च को दिल्ली में संसद मार्ग पर पहुंच रहे हैं।

पूरे देश से आने वाले मज़दूर 2 मार्च की शाम रामलीला ग्राउंड में इकट्ठा होंगे और वहां से संसद तक मार्च करेंगे।

मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) के बैनर के तले ये रैली आयोजित हो रही है जिसमें डेढ़ दर्जन से ज्यादा ट्रेड यूनियनें शामिल हैं।

उनकी मांग है कि देश में न्यूनतम मज़दूरी 25,000 रुपये प्रति माह की जाए जिससे अमीरी ग़रीबी की खाई कम होगी।

(अमरीश पटेल अहमदाबाद हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील और श्रम कानूनों के विशेषज्ञ हैं।)

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