8 जनवरी को देशव्यापी आम हड़ताल, एनआरसी मुद्दा भी शामिल

आठ जनवरी को ऐतिहासिक भारत बंद की तैयारियां पुरजोर तरीक़े से चल रही हैं।

देश भर की ट्रेड यूनियनों के मंच ने मोदी सरकार के श्रम विरोधी और जन विरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ आठ जनवरी को देशव्यापी आम हड़ताल की घोषणा की है।

पिछले दो महीने से आम हड़ताल को लेकर तैयारियां चल रही थीं, इसी बीच सीएए और एनआरसी का मुद्दा मोदी सरकार ने ला दिया।

इसलिए इस आम हड़ताल में एनआरसी और सीएए का मुद्दा शामिल कर लिया गया है।

उल्लेखनीय है कि साल 2019 में मोदी सरकार 4 श्रम क़ानूनों को ख़त्म कर चार श्रम संहिताएं यानी लेबर कोड ला रही है।

दो लेबर कोड सरकार ने पास भी कर दिया है जिनमें वेज कोड और औद्यिक सुरक्षा कोड शामिल है।

ट्रेड यूनियन नेताओं के अनुसार, इस बार की हड़ताल रस्मी कार्रवाई भर नहीं रहेगी, बल्कि समाज के अन्य तबके भी इसमें शामिल होंगे।

पिछले कुछ महीनों से देश में मंदी का असर गहरा रहा है और दसियों लाख लोगों की नौकरियां जा चुकी हैं।

आर्थिक पस्ती और बड़े पैमाने पर मज़दूरों के बेरोज़गार होने से मोदी सरकार के ख़िलाफ़ मज़दूरों और आम लोगों में गुस्सा बढ़ रहा है।

ट्रेड यूनियनों ने सीएए को मोदी सरकार की ध्यान भटकाने वाली नीति करार दिया है जिसकी आड़ में श्रम क़ानूनों पर हमला किया जा रहा है।

कोई भी औद्योगिक क्षेत्र नहीं बचा है जहां किसी न किसी फैक्ट्री के मज़दूर धरने पर नहीं बैठे हों।

हरियाणा के मानेसर में स्थित दोपहिया वाहन बनाने वाली कंपनी होंडा के 2500 कैजुअल मज़दूर दो महीने से धरने पर बैठे हैं।

इसी तरह हरियाणा के ही बिनोला में शिवम ऑटो टेक लिमिटेड के मज़दूर धरने पर बैठे हैं। उत्तराखंड में भी श्रमिक असंतोष पिछले दो साल से गहरा रहा है।

कोलकाता से लेकर चेन्नई तक और दिल्ली से मुंबई तक श्रमिकों में मौजूदा सरकार के ख़िलाफ़ काफ़ी आक्रोश है।

ऐसे में माना जा रहा है कि इस बार का भारत बंद ऐतिहासिक साबित होने वाला है क्योंकि सीएए को लेकर भी देशभर में आंदोलन चल रहा है।

पूर्वोत्तर के राज्यों असम, मणिपुर, नागालैंड, मेघालय आदि में ट्रेड यूनियनें सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ सड़क पर उतर गई हैं।

बैंकों के विलय से बैंक यूनियनें भी नाराज़ हैं, इसलिए इस आम हड़ताल में वे भी शामिल हैं।

पिछले साल भी आठ नौ जनवरी को आम हड़ताल की घोषणा की गई थी जिसमें एक अनुमान के अनुसार 20 करोड़ मज़दूरों कर्मचारियों ने हिस्सा लिया था।

इतनी बड़ी संख्या में मज़दूरों के सड़क पर उतरने के बावजूद मोदी सरकार ने श्रम क़ानूनों को पूंजीपतियों के मुताबिक मरोड़ दिया है।

ये बात ट्रेड यूनियनों और मज़दूरों के गले नहीं उतर रही है। ऐसी ख़बर है कि रेलवे और ऑर्डनेंस फैक्ट्रियों के निजीकरण से भी इसके कर्मचारी खासे ख़फ़ा हैं, इसलिए वो भी भारत बंद में शामिल होंगे।

कई राज्यों के राजकीय परिवहन विभाग अपने यहां निजीकरण के ख़िलाफ़ संघर्षरत हैं।

तेलंगाना स्टेट ट्रांसपोर्ट निगम के कर्मचारियों ने निजीकरण के ख़िलाफ़ दो महीने की ऐतिहासिक हड़ताल की थी।

(वर्कर्स यूनिटी स्वतंत्र निष्पक्ष मीडिया के उसूलों को मानता है। आप इसके फ़ेसबुकट्विटर और यूट्यूब को फॉलो कर इसे और मजबूत बना सकते हैं।)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *