मज़दूरों के वज़ूद की लड़ाई में बीएमएस सरकार के साथ क्यों खड़ी है?

आठ जनवरी को पूरे देश का चक्का जाम है। औद्योगिक इलाक़ा ठप है, बैंक बंद हैं, विश्वविद्यालय बंद हैं, डिफ़ेंस फैक्ट्रियां बंद हैं, यहां तक कि दुकानें बंद हैं।

देश की लगभग सभी बड़ी केंद्रीय ट्रेड यूनियनें और फ़ेडरेशन इस हड़ताल की अगुवाई कर रहे हैं।

देश के क़रीब 175 किसान संगठन इस हड़ताल में हिस्सा ले रहे हैं लेकिन आरएसएस से जुड़ी ट्रेड यूनियन भारतीय मज़दूर संघ (बीएमएस) इसमें शामिल नहीं है।

पिछले साल भी जब आम हड़ताल हुई तो बीएमएस ने खुद को अलग कर लिया था। हालांकि श्रम क़ानूनों को लेकर जबतक वो आवाज़ उठाती रही है।

लेकिन सवाल उठता है कि क्या बीएमएस श्रम क़ानूनों को ख़त्म करने वाली मोदी सरकार के साथ खड़ी है?

असल में संघ का संगठन होने के नाते मोदी सरकार में बीएमएस का सीधा दखल है लेकिन इन छह सालों में बीएमएस ने कभी मोदी सरकार की खुलकर मुख़ालफत नहीं की।

हालांकि सीटू के जनरल सेक्रेटरी तपन सेन का कहना है कि बीएमएस के अलग होने के बावजूद कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा और ये हड़ताल ऐतिहासिक होगी।

पिछले साल भी हमने देखा कि बीएमएस के अलग होने के बावजूद उससे जुड़े निचले स्तर के मज़दूर संगठन हड़ताल में शामिल हुए थे।

लेकिन इस बार का मामला कहीं गंभीर है। मोदी सरकार ने 44 श्रम कानूनों को ख़त्म करने का ऐलान ही नहीं किया बल्कि दूसरी बार सत्ता में आते ही उन्हें ख़त्म करना भी शुरू कर दिया।

ईएसआई और पीएफ़ के खजाने पर मोदी सरकार की नज़र लगी थी और अब वो इस खजाने पर हाथ लगा दिया है। सार्वजनिक कंपनियों को थोक के भाव बेचने का ऐलान भी हो चुका है।

आर्थिक हालत बदतर हो गई है और बेरोज़गारी और महंगाई चरम पर पहुंच गई है। इन सब से जनता में भारी आक्रोश पैदा हो गया है।

इस आक्रोश से ध्यान हटाने के लिए मोदी सरकार ने हिंदू मुस्लिम मुद्दे को हवा दी और पहले कश्मीर, फिर राम जन्म भूमि और फिर सीएए-एनआरसी का मुद्दा ले आई।

लेकिन हिंदू मुस्लिम को लड़ाने की इस नीति से मोदी सरकार को कोई फायदा मिला हो या न, जनता में आक्रोष और बढ़ गया है और अब वो सड़क पर है।

ऐतिहासिक रूप से बीते दिसम्बर से देश में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हो रहे हैं। गुवाहाटी से लेकर दिल्ली, अहमदाबाद से लेकर बैंगलोर, हैदराबाद, चेन्नई, मुंबई, केरल, तमिलनाडु, यूपी, बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और पूर्वोत्तर के राज्यों में जनता सड़क पर उतर गई है।

ये आम हड़ताल इन आंदोलनों के ज्वार के बीच हो रही है। इसमें सिर्फ ट्रेड यूनियन, मज़दूर, कर्मचारी ही शामिल नहीं हो रहे हैं।

इसमें किसान भी शामिल हो गए हैं, विश्वविद्यालयों के शिक्षक और छात्र संगठन भी शामिल हो गए हैं। यातायात और परिवहन के कर्मचारी संगठन भी शामिल हैं।

और इन सबके अलावा एनआरसी और सीएए के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रहे लोग भी आम हड़ताल में शामिल हो गए हैं। इसलिए इस बार की आम हड़ताल बिल्कुल अलग है।

ये हड़ताल ऐतिहासिक साबित होने वाली है और मोदी सरकार को हिलाकर रख देने वाली है। शायद बीेएमएस के नेता खुद को तसल्ली दे लें लेकिन मज़दूरों को कैसे समझाएंगे, जो उनके साथ जुड़े हैं।

एक ऐसी लड़ाई में जब मज़दूरों के वजूद पर ही मोदी सरकार ने सवाल खड़ा कर दिया है, आठ घंटे के काम के अधिकार, हड़ताल का अधिकार और ट्रेड यूनियन बनाने का अधिकार छीना जा रहा है, बीएमएस अलग खड़ी रहकर एक ऐसी ग़लती कर रही है जो आने वाले समय में खुद उसके वजूद के लिए घातक साबित हो जाएगा।

ये तय है कि मीडिया में इस हड़ताल की व्यापकता की ख़बर की जगह कितना नुकसान हुआ, ये प्रचारित होगा।

लेकिन ज़मीन के आंदोलन का जो असर होगा वो मोदी सरकार की श्रम विरोधी और जन विरोधी नीतियों के पीछे के आत्मविश्वास को हिला देने के लिए काफ़ी होगा।

मोदी सरकार इसके नतीजे समझती है इसलिए अभी से सरकारी कर्मचारियों को हड़ताल में शामिल न होने की हिदायतें जारी की जा रही हैं, लेकिन कर्मचारी भी समझ रहे हैं कि जब नौकरी ही नहीं रहेगी तो वो किसके आदेश का पालन करेंगे।

भले ही ये हड़ताल एक दिन के लिए बुलाई गई है लेकिन रेलवे के कर्मचारी अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने की सोच रहे हैं, डिफ़ेंस, रेलवे और कोयला क्षेत्र में लगे मज़दूर संगठन और तगड़ी लड़ाई लड़ने के लिए कमर कस चुके हैं।

तपन सेन का कहना है कि ये हड़ताल उस बड़ी लड़ाई का बिगुल है जो आने वाले समय में लड़ी जानी है।

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