फ़ेसबुक पोस्ट लिखने पर नौकरी से नहीं निकाला जा सकता

एक अदालत ने एक अहम फैसले में कहा है कि फ़ेसबुक पोस्ट लिखने से किसी कर्मचारी को नौकरी से नहीं निकाला जा सकता।

उल्लेखनीय है कि पिछले कुछ सालों में फ़ेसबुक पोस्ट लिखने पर कर्मचारियों को नौकरी से निकाले जाने का चलन तेज़ हुआ है।

त्रिपुरा हाईकोर्ट ने बीते गुरुवार को एक फैसले में राजनीतिक रैली में शामिल होने और फेसबुक पोस्ट लिखने के कारण नौकरी से निलंबित की गईं एक महिला कर्मचारी का निलंबन खारिज कर दिया।

अदालत ने कहा, ‘सरकारी कर्मचारी को बोलने की आजादी है।’

फैसले के मुताबिक त्रिपुरा सिविल सर्विस (कंडक्ट) रूल्स, 1988 के रूल 5 के तहत प्रतिबंधों को ध्यान में रखते हुए सरकारी कर्मचारी को अपने राजनीतिक विचार व्यक्त करने का अधिकार है।

मुख्य न्यायाधीश अकील कुरैशी ने कहा, ‘याचिकाकर्ता को एक सरकारी कर्मचारी के रूप में बोलने की आजादी से अछूता नहीं रखा जा सकता है। ये एक मौलिक अधिकार है, जिस पर पाबंदी सिर्फ कानून के आधार पर लगाई जा सकती है। आचरण नियमों के नियम पांच के उप-नियम 4 के तहत तय की गई सीमारेखा को ध्यान में रखते हुए उन्हें अपने विचार रखने और अपने तरीके से जाहिर करने का अधिकार है।’

नियम 5(1) के मुताबिक कोई भी सरकार कर्मचारी किसी भी राजनीतिक दल का सदस्य या उससे जुड़ा नहीं हो सकता है। नियम 5(4) के तहत कोई भी सरकारी कर्मचारी किसी भी चुनाव में हिस्सा नहीं ले सकता है। लिपिका पॉल नाम की याचिकाकर्ता को उनके रिटायरमेंट से चार दिन पहले ही राज्य मछली पालन विभाग ने दिसंबर 2017 में एक राजनीतिक कार्यक्रम में भाग लेने और फेसबुक पर राजनीतिक पोस्ट लिखने के कारण निलंबित कर दिया था।

उन पर आचरण नियमों के नियम 5 और केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1972 के नियम 9 (2) (बी) के तहत राजनीतिक रैली में भाग लेने और किसी राजनीतिक नेता के खिलाफ अपमानजनक और अभद्र टिप्पणी करके राजनीतिक पार्टी के खिलाफ प्रचार करने का आरोप लगाया गया था।

अनुशासनात्मक कार्रवाई के मामलों में अपने सीमित अधिकार क्षेत्र की ओर ध्यान दिलाते हुए अदालत ने कहा, ‘आमतौर पर कोर्ट उस समय दखल नहीं देता है जब विभाग ने सिर्फ चार्जशीट जारी किया हो और विभागीय कार्रवाई होनी बाकी हो। हालांकि ऐसे मामले जरूरत आते है जिसमें कोर्ट को तय करना होता है कि चार्जशीट में लगाए गए आरोप किसी दुराचार की श्रेणी में आते हैं या नहीं।’

कोर्ट ने पाया कि जबकि पॉल राजनीतिक रैली के दौरान उपस्थित थीं लेकिन इससे ये स्पष्ट नहीं होता कि वो रैली में भाग ले रही थीं। जस्टिस कुरैशी ने कहा कि ‘उपस्थित होने’ और ‘भाग लेने’ में अंतर होता है और सिर्फ याचिकाकर्ता के वहां उपस्थित होने से ये नहीं तय होता कि उनका राजनीतिक रूप से कोई ताल्लुक है। कोर्ट ने यह भी कहा कि पॉल के फेसबुक पोस्ट में कुछ भी ऐसा नहीं लिखा था जिससे ये पता चलता हो कि उन्होंने किसी राजनीतिक पार्टी के खिलाफ बोला है।

इस आधार पर कोर्ट ने पॉल के निलंबन और अनुशासनात्मक कार्यवाही को खारिज कर दिया और सरकार को निर्देश दिया कि वे दो महीने के भीतर रिटायरमेंट के बाद दी जाने वाली सभी सुविधाएं उन्हें दी जाएं। पिछले साल केरल हाईकोर्ट ने व्हाट्सएप पर केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के खिलाफ कथित रूप से अपमानजनक टिप्पणी प्रसारित करने के कारण निलंबित किए गए केएसआरटीसी कंडक्टर को बहाल करने के लिए राज्य को निर्देश दिया था।

जस्टिस मुहम्मद मुस्ताक ने अपने आदेश में कहा था, ‘किसी को भी सरकारी कर्मचारी होने के नाते उसे उसके विचार व्यक्त करने से मना नहीं किया जा सकता है। एक लोकतांत्रिक समाज में प्रत्येक संस्थान लोकतांत्रिक प्रणाली से संचालित होते हैं। सही आलोचना एक सार्वजनिक संस्थान को संचालित करने का एक बेहतर तरीका है।’

(मेहनतकश की ख़बर से साभार.)

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