बजट 2019 में जनता को राहत देने की बात तो दूर, आर्थिक हालात की फ़िक्र तक नहीं दिखी

By गौतम मोदी

गए आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने देशवासियों से कोई ठोस भौतिक वादे किये ही नहीं थे इसीलिए यह केंद्रीय बजट सिर्फ देशी और विदेशी पूंजीपतियों की ताबेदारी करता है।

बजट की इब्तिदाई कथन में ही भाजपा सरकार मानती है कि ‘इंडिया इंक’ यानि भारत की निजी बड़ी कंपनियां ‘रोजगार के सृजनकर्ता हैं’ और ‘राष्ट्र की संपदा के सृजनकर्ता हैं’ जिनके साथ मिल कर ‘आपसी विश्वास के साथ’ ‘उत्प्रेरक तीव्रगति’ से अर्थव्यवस्था का विकास किया जा सकता है।

चुनांचे बजट में इस बात का ज़िक्र एक बार भी नहीं आता है कि आखिर भाजपा सरकार के तथाकथित सफल 5 साल के शासनकाल के बाद अर्थव्यवस्था को ‘उत्प्रेरक तीव्रगति’ की आवश्यकता आखिर क्योंकर है?

साथ ही मौजूदा बजट आगामी वर्षों की नीति तय करने से ज्यादा बीते 5 सालों की तथाकथित उपलब्धियों को गिनाता है।

क्षमता, जरूरत व इच्छा से कम कार्य पाने वाली लाखों की आबादी जिनकी एक बड़ी तादात ग्रामीण क्षेत्रों में है, से इतर कार्यशील आबादी के 7.5% से भी ज्यादा लोग बेरोजगार हैं।

अर्थव्यवस्था की स्थिति माह-दर-माह बदतर ही होती जा रही है। मांग में हो रही गिरावट का सीधा बुरा असर निवेश पर पड़ रहा है जिसके कारण मजदूरी में घटोतरी और बेरोज़गारी में इजाफा होने की ही संभावना है।

भाजपा की विफल आर्थिक नीतियों का सबसे बुरा असर देश के ग्रामीण क्षेत्रों पर पड़ा है और खेती बुरी तरह से प्रभावित हुई है। इस आर्थिक संकट की घड़ी में सरकार को चाहिए कि सामने आ कर अर्थव्यवस्था की बाग़-डोर संभाले न कि यह जिम्मेदारी निजी पूँजी के हवाले छोड़ दे।

लेकिन भाजपा की सरकार के लिए आर्थिक जिम्मेदारी ठेके पर निजी पूँजी को सौंप देना अपरिहार्य है क्योंकि बजट में सरकार ने स्वयं ही यह माना है कि विदेशी निवेश के बगैर और ख़ास कर शेयर बाज़ार व रियल एस्टेट में विदेशी निवेश के बिना तो अर्थव्यवस्था का भठ्ठा ही बैठ जायेगा।

अतः आर्थिक रूढ़िवादिता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाते हुए सरकार ने मनरेगा, आंगनवाड़ी सेवाओं, मध्याहन-भोजन योजना, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, आयुष्मान भारत, शहरी व ग्रामीण आवास योजना, पेंशन योजना, राष्ट्रीय खाद्य योजना, स्वच्छ भारत आदि पर खर्च की असल दर में कटौती कर दी है।

यदि महंगाई का संज्ञान न भी लें तो सामाजिक सुरक्षा व सामाजिक कल्याण वाली योजनाओं पर होने वाले खर्च में 7% की कटौती हुई है। इसके कारण लोगों की व्यय करने की क्षमता में कमी आएगी जिसके फलस्वरुप निवेश कम होगा, मजदूरी घटेगी और बेरोज़गारी में बढ़ोतरी होगी। यह सब मिल कर मौजूदा आर्थिक संकट को और गहरा कर देंगे।

बजट में निजी पूँजी के सभी वर्गों के लिए टैक्स में भिन्न-भिन्न प्रकार से छूट दी गयी है। इसमें सबसे बड़ी छूट है सालाना 250 करोड़ से 400 करोड़ का धंधा करने वाली कंपनियों के कॉर्पोरेट टैक्स को 30% से घटा कर 25% कर देना।

साथ ही भाजपा सरकार ने टैक्स को भिन्न श्रेणियों में बांटे रखा है जिसके पीछे उनका तर्क यह है कि इससे निजी कंपनियों व निवेशकों का विकास होता है। टैक्स की दर को भिन्न श्रेणियों में बांटना न सिर्फ टैक्स की सुचारू नीति के विरुद्ध है, बल्कि इन भिन्न श्रेणियों के कारण ही कंपनियों को टैक्स से बचाव, टैक्स में चोरी व घपला करने का मौका मिल जाता है।

हालांकि मजदूरों के मामले में इसी सरकार यह सोच ठीक उलटी हो जाती है। भाजपा चाहती है कि श्रम कानूनों को 4 श्रम संहिताओं में समो कर उन्हें मानकीकृत व सुवीही बनाया जाये।

बजट इस बात का दिखावा भी नहीं करता कि उसके इस कदम से मजदूरों का फायदा करने की कोई मंशा है बल्कि सीनाजोरी से बताती है कि इससे मालिकों को पंजीयन और दस्तावेजीकरण में आसानी होगी।

अर्जित लाभ और ‘सस्ते आवास’ पर बनी टैक्स नीतियाँ सटोरियों और रियल एस्टेट खिलाड़यों को अपने फंसे हुए स्टाक बाज़ार में बिना मौजूदा टैक्स के दायरे में आये बेचने की छूट और लाभ पहुंचाने की दिशा में केन्द्रित है।

गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफ़सी) से जुड़े निवेश के नियमों में कोई ख़ासा बदलाव किये बगैर उनको को दी गई छूट का तर्क समझ नहीं आता है। ऐसे में सरकारी क्षेत्र के बैंकों द्वारा एनबीएफसी को दिए जाने वाले कर्ज़ दिए जाने में इजाफा होगा और इससे आर्थिक व्यवस्था और भी अस्थिर होगी।

साथ ही बजट में सार्वजनिक उद्यमों में ‘रणनीतिक विनिवेश’ कर उनका निजीकरण करने की एक प्रतिबद्धता दिखाई देती है। यह स्थिति सार्वजनिक उद्यमों के भंडार का 5 साल तक लगातार दोहन करने के बाद उत्पन्न की गयी है।

बजट में सभी क्षेत्रों को 100% विदेशी मुद्रा निवेश के लिए खोलने की बात भी कही गयी है, इसमें उड्डयन, बीमा व मीडिया क्षेत्र भी शामिल हैं।

बजट में सफाई कर्मचारियों की दशा सुधारने, महिलाओं के लिए रोज़गार के नए आयाम खड़े करने और महिलाओं के लिए स्वरोजगार सुगम बनाने की बात कही गयी है।

सच्चाई यह है कि पिछले 5 सालों में सफाई कर्मचारियों की मौत में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है जबकि महिला बेरोज़गारी दर 2014 से 2019 के बीच दोगुनी हुई है। खैर हर मुद्दे की तरह ही इस मुद्दे पर भी सरकार क्या कदम उठाएगी और उसके क्या परिणाम अपेक्षित हैं उसका बजट में कोई उल्लेख नहीं है।

हमारी अर्थव्यवस्था में मांग में सबसे ज्यादा गिरावट ग्रामीण क्षेत्रों में महसूस की गयी है।

भाजपा सरकार के शासन में खेती से होने वाली आमदनी और खेतिहर मजदूरों की मजदूरी पर सबसे गहरा प्रहार हुआ है। इस बजट में ग्रामीण अर्थव्यवस्था कहीं दिखाई ही नहीं देती।

2017 में भाजपा सरकार ने 5 साल में यानी 2022 तक ग्रामीणों की कमाई दोगुनी करने का वादा किया था।

इस गणना के हिसाब से ग्रामीण आय दोगुनी होने के लिए जरूरी है कि अगले तीन सालों तक आय में साल दर साल 25% वृद्धि हो। यह कैसे होगा इसका भी बजट में कोई उल्लेख नहीं है।

भाजपा सरकार अपने प्रस्तावित खर्च का भार कैसे उठाएगी इस पर भी जानकारी नदारद है। जीएसटी के तहत उम्मीद से बहुत कम राजस्व जमा हुआ है, जबकि आयकर राजस्व यह कमी पूरी करने में नाकाम रहा है।

ऐसे में बजट में प्रस्ताव है कि वर्तमान अप्रत्यक्ष कर की कमरतोड़ दर को और बढाते हुए पेट्रोल व डीजल की कीमतों में 1 रुपये का अतिरिक्त उपकर जोड़ा जाये जिसका खर्च भी आखिरकार मेहनतकश वर्ग और गरीब जनता को ही वसूल करना होगा।

यह बजट न सिर्फ लोगों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता बल्कि अपारदर्शी है और इसमें अपेक्षित परिणाम गायब हैं। गरीब मेहनतकश वर्ग को राहत पहुंचाने की बात तो छोड़िये इस बजट में संकटग्रस्त बीमारू अर्थव्यवस्था को मौजूदा स्थिति से उबारने के लिए किसी समाधान का भी ज़िक्र नहीं मिलता।

सार्वजनिक निजी भागीदारी व्यवस्था (पीपीपी मॉडल) के गोले में परोसी गयी स्ट्रेटजिक निवेश की नीति और निजी क्षेत्र के नेतृत्व में होने वाले औद्योगिक विकास का गणित मेल नहीं खाता।

भाजपा सरकार द्वारा कल जारी किये गए आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 में भारतीय आर्थिक विकास को 7% की नई उंचाई पर ले जाने का जो दावा किया गया है वह कैसे हासिल किया जायेगा इस पर भी सवालिया निशान है।

शायद इसका हल जैसा कि खुद भाजपा सरकार ने अपने आर्थिक सर्वेक्षण में लिखा है कि, ‘सरकार को आर्थिक नीति की चिंता नहीं करनी चाहिए’ इसी मंत्र में निहित हो।

बल्कि यह कहा गया है कि सरकार को समझना चाहिए की लोग कैसे आचरण करते और सोचते हैं, सरकार की क्षमता होनी चाहिए कि वह लोगों की सोच व उनके आचरण का जवाब दे सके।

सर्वोत्तम स्थिति वह है जब सरकार लोगों की सोच और उनके आचरण को प्रभावित कर सके और उन्हें बदल सके। बजट का मकसद यह कतई नहीं है कि देश को आर्थिक संकट से उबारा जाये इसका काम बस इतना है कि जनता को लगे की भाजपा के शासन में सब कुछ ठीक-ठीक चल रहा है।

वास्तविक परिस्थिति और उसमें निहित संकट को लोगों के सामने उजागर करना ही हमारे समय और आन्दोलनों की चुनौती है।

(गौतम मोदी एनटीयूआई के महासचिव हैं।)

(वर्कर्स यूनिटी स्वतंत्र निष्पक्ष मीडिया के उसूलों को मानता है। आप इसके फ़ेसबुकट्विटर और यूट्यूब को फॉलो कर इसे और मजबूत बना सकते हैं।)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *