इतिहास के झरोखे से-5: कब और कैसे हुआ इंडियन ट्रेड यूनियन का गठन

By सुकोमल सेन

(‘इतिहास के झरोखे से’, यानी लेखों की एक ऐसी शृंखला जिसमें मज़दूर आंदोलन के इतिहास का कोई पन्ना हमारे सामने खुलेगा। आज पढ़िए  पांचवी कड़ी में  ‘इंडियन ट्रेड यूनियन फेडरेशन ‘के निर्माण  की  कहानी  )

ए.आई.टी.यू.सी. सम्मलेन का बहिष्कार करने के बाद अलगाववादियों ने कुछ नेताओं ने 1 दिसंबर 1923 को अलग बैठक की और नया संगठन बनाने का निर्णय लिया।

इसे अस्थाई रूप से इंडियन ट्रेड यूनियन फेडरेशन का नाम दिया गया।

इस कार्य के लिए वी.वी गिरी की अध्यक्षता वाली अस्थाई समिति का गठन किया गया और तीन माह में सम्मेलन बुलाने का निर्णय किया गया।

यह भी निर्णय किया गया कि नए संगठन के प्रस्तावित सविंधान में ‘कम्युनिस्ट प्रवृतियों वाली यूनियनों और व्यक्तियों के फेडरेशन में प्रतिनिधित्व या सम्बन्ध्ता न प्रदान करने सम्बन्धी धारा अवश्य होनी चाहिए।

एन. एम. जोशी, चमन लाल और कुछ अन्य गण्यमान बुज़ुर्गों की पहलकदमी से निर्मित यह फेडरेशन, भारत के मज़दूर आंदोलन में घोर दक्षणपंथी विचारधारा के उदय और सुदृढ़ीकरण का संकेत देता है।

सर्वेंट्स आफ इंडिया सोसाइटी  के सदस्यों के विचार

एन.एम.जोशी “सर्वेंट्स आफ इंडिया सोसाइटी ” के सदस्य और सुधारवादी राजनीतिक थे।

उनके सहयोगी वी.वी. गिरी, चमन लाल,  बी.शिवा राव आदि यद्यपि राष्ट्रीय राजनीतिक प्रश्नों पर ब्रिटिश विरोधी विचार व्यक्त करते थे।

परन्तु ट्रेड यूनियन मोर्चे पर वे इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियन एम्स्टर्डम और ब्रिटिश ट्रेड यूनियन कांग्रेस से सम्बन्ध बनाये रहते थे।

वे बुनियादी रूप से मज़दूर वर्ग आंदोलन विकसित करने से अधिक आयोगों और सम्मेलनों में सहयोग करने के प्रति ज्यादा ध्यान देते थे।

 दक्षिणपंथी संगठन का गठन

सरकार ने गोलमेज सम्मलेन बुलाकर जन आंदोलन के बढ़ते उभार और आक्रोश शांत करने का प्रयास किया।

इस अवसर पर वह उदारवादी राष्ट्रवादियों, लिवरल फेडरेशन के अनुयायियों या अन्य लोग जिन्होंने साइमन कमीशन को सहयोग करने का प्रस्ताव रखा उनसे समर्थन की आशा की।

इस राजनीतिक सूझबूझ ने ब्रिटिश सरकार द्वारा एन. एम. जोशी को 1931 में पुनः सेन्ट्रल लेजिस्लेटिव असेम्बली का सदस्य नामित करने और तीन बार 1930,1931 और 1932 में गोलमेज सम्मलेन में आमंत्रित किए जाने का अवसर दिया।

भारतीय मज़दूर आंदोलन का यह नेतृत्वकारी दक्षिणपंथी हिस्सा, ए.आई.टी.यू.सी. के अंदर जुझारू और समझौताहीन संघर्ष चलाने वाले क्रांतिकारियों से भयभीत हो गया

और अपने पैतृक संगठन को छोड़कर एक दक्षिणपंथी संगठन खड़ा करने में लगा गया। इस बात से विश्व के तमाम सुधारवादी मज़दूर संगठन बहुत प्रसन्न हुए।

ब्रिटिश ट्रेड यूनियन कांग्रेस द्वारा आर्थिक सहयोग

ब्रिटिश ट्रेड यूनियन कांग्रेस और इंटरनेशनल ट्रेड यूनियन्स, एम्सटर्डम ने इंडियन ट्रेड यूनियन फेडरेशन को स्थापित करने के लिए क्रमशः 672-11-00 रु. और 3520-3-7 रु. की मदद तुरंत भेज दी।

इस संगठन के प्रथम सम्मेलन में इन संगठनों के महत्वपूर्ण आर्थिक सहयोग के लिए धन्यवाद प्रस्ताव पारित किया गया।

सन् 1931 में इंडियन ट्रेड यूनियन फेडरेशन ने औपचारिक रूप से इंटरनेशनल फेडरेशन आफ ट्रेड यूनियन, एमस्टर्डम से संबद्धता हासिल कर ली।

दक्षिणपंथी गतिविधियों के लिए सरकारी उत्साहवर्धन और सहयोग कोई आकस्मिक घटना नहीं थी।

दक्षिणपंथी का जन्म ही शासक वर्ग का हित साधने के लिए हुआ है और इसलिए उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के औपनिवेशिक हितों की सेवा की।

(सुकोमल सेन की किताब ‘भारतीय मज़दूर वर्गः उद्भव और आंदोेलन का इतिहास’ से साभार। टंकण- शोभा मेहता)

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