सरकारी कंपनियां बेचने से निजी कंपनियों के मज़दूरों की सैलरी और घटेगी

By मुकेश असीम

ये  झूठा प्रचार है की मुनाफ़े में नहीं चल रहे सार्वजनिक उपक्रम या कंपनी को सरकार प्राइवेट कंपनी को सौंप देती है। पर पूंजीपतियों के संगठन सीआईआई को ऐसा कोई भ्रम नहीं है।

एक बयान के अनुसार उसने सरकार को कहा है कि वह सार्वजनिक क्षेत्र में अच्छी और व्यवहारिक तरीक़े से चल रहे बंदरगाह, हवाई अड्डे, बिजली संयंत्र, राजमार्ग, आदि में विनिवेश करे ताकि निजी क्षेत्र को कम जोखिम पर ऐसी कंपनियों में निवेश का मौका मिले।

वैसे तो सार्वजनिक क्षेत्र में जो कंपनियां अच्छी तरह नहीं चल रही हैं उनके बारे में भी पता किया जाये तो यही मालूम होगा कि उसके पीछे भी वजह इनकी कीमत पर किसी निजी पूंजीपति को पर्दे के पीछे से पहुँचाया गया फायदा ही होता है।

भारत में अधिकांश निजी पूंजीपति ऐसे ही सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा दिये गये ‘उपहारों’ के बल पर ही इतनी पूंजी खड़ा कर पाए हैं।

ओएनजीसी का ही उदाहरण लीजिये। पहले एनडीए व यूपीए दोनों ने उसकी गैस रिलायंस को चुराने दी, फिर सरकारी घाटे को पूरा करने के लिए उसके रिजर्व निकाल लिए।

बिजनेस स्टैंडर्ड ने खबर छापी है कि उसके द्वारा खोजे और विकसित किये तेल के कुओं को निजी क्षेत्र को देने की योजना है।

अरविंद पनगढ़िया की आधारहीन कुतर्क

यानी सारी कमाऊ संपत्ति निजी क्षेत्र को देकर इसे दिवालिया कर दिया जाएगा और तब कहा जाएगा कि सामाजिक स्वामित्व से अकुशलता पैदा होती है और निजी पूंजी ही कार्यकुशलता ला सकती है, पर यह चोरी करने की कार्यकुशलता है।

अरविंद पनगढ़िया ने हर हफ्ते एक सार्वजनिक कंपनी के निजीकरण की सलाह  तो देते ही  है पर शायद निजीकरण पक्ष में व्हाट्सअप्प वाला प्रचार भी लिखकर  उन्होंने ही दिया है ।

‘तर्क’ है कि सार्वजनिक कंपनी बाजार के मांग-पूर्ति के नियम से न चलकर वेतन को कृत्रिम रूप से ऊँचा कर देती हैं।

अर्थात जब 20-25 हजार रु मासिक में बाजार में कितने ही इंजीनियर उपलब्ध हैं।

तब सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा 75 हजार रु मासिक तनख्वाह देने से अन्य कंपनियों को भी अपना वेतन बढ़ाना पड़ता है।

इसकी वजह से पूंजीपति निवेश करने से हतोत्साहित हो जाते हैं, और बेरोजगारी बढ़ती है।

झूठे प्रचार के सहारे मज़दूरों का शोषण

ये प्रचार जोरोॆ पर है कि निजीकरण से सार्वजनिक क्षेत्र के उच्च वेतन बंद हो जाएं तो निजी कंपनी भी जहाँ 50 हजार वेतन देने को विवश हैं, फिर 25 हजार रुपये ही देंगी।

इससे देशी-विदेशी पूंजीपति ज़ोरों से निवेश करेंगे तथा मजदूरी आधी होने की वजह से एक के बजाय दो रोजगार देंगे।

क्योंकि उनके पास उपलब्ध कोष में अब दो श्रमिकों को मजदूरी देने लायक मुद्रा होगी।

ये 200 साल पुराना कुतर्क है, जिसके अनुसार पूंजीपति के पास श्रमिकों को मजदूरी देने के लिए एक निश्चित रकम का ‘श्रम कोष’ होता है।

अगर मजदूरी अधिक हो तो उस कोष की सीमा में वह कम मजदूर रख पाता है, मजदूरी कम हो तो उतनी ही रकम में अधिक श्रमिकों को रख सकता है।

दूसरों की आँखों से दुनिया देखने वाले सयाने ‘विशेषज्ञों’ के बजाय खुद की बुद्धि का जरा भी इस्तेमाल करने वाला कोई आम आदमी भी इस ‘तर्क’ की धूर्तता-मूर्खता को तुरंत पकड़ लेगा।

क्योंकि सबको पता है कि श्रम शक्ति खरीदने वाला हर मालिक कम से कम मूल्य में अधिक से अधिक श्रम का उपयोग करना चाहता है।
वो दो मजदूरों के काम को भी एक मज़दूर से करवाने की जुगत भिड़ता रहता है।

बेचने के बहाने

औद्योगिक प्रबंधन व तकनीक के नज़रिए से भी देखें तो अचल पूंजी में निवेश कितना है  यानी -उद्योग का आकर कितना बड़ा है,कितनी मशीनें लगी हैं।

वे किस गति से और कितने समय तक चलता है, उसे चलाने  के लिए कितने  हाथों की  ज़रूरत है और कितने  कच्चे माल की ख़पत है ।

इन सबके निश्चित अनुपात के आधार पर रखे मज़दूरों की संख्या तय होती है।

इससे अधिक एक भी नहीं क्योंकि पूंजीपति का मकसद मुनाफा कमाना है ना कि कोई पूर्वनिर्धारित रकम से रोजगार देने के लिये निर्धारित करना।

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