इतिहास के झरोखे से-3ः कैसे बना ट्रेड यूनियन एक्ट 1926

By सुकोमल सेन

(‘इतिहास के झरोखे से’, यानी लेखों की एक  ऐसी  शृ्ंखला  जिसमें मज़दूर आंदोलन के इतिहास का कोई पन्ना हमारे सामने खुलेगा। आज पढ़िए तीसरी कड़ी  में भारतीय ट्रेड यूनियन अधिनियम 1926 के शुरूआती दौर के बारे में।)

साम्राज्यवादी शासक ट्रेड यूनियन गतिविधियों को प्रोत्साहन देने और ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं की रक्षा करने के लिए कानून को बनाने और उसकी वैधानिक मान्यता देने की आवश्यकता  महसूस नहीं करते थे।

प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति  के ठीक बाद ही भारत में संगठित ट्रेड यूनियन आंदोलन ने स्वरूप ग्रहण कर लिया था, फिर भी भारतीय ट्रेड यूनियन अधिनियम 1926 में ही पारित हुआ।

लेकिन यह अधिनियम इस प्रकार से बनाया गया कि ट्रेड यूनियनों को खुद इससे रक्षा करनी पड़ी।

यद्यपि भारतीय दंड संहिता 1913 में संशोधन कर ट्रेड यूनियनों को वस्तुतः गैरकानूनी संगठन के रूप में वर्गीकृत कर दिया गया था।

सन् 1921 में बी.पी. वाडिया के कानूनी अभियोजन के समय से ही ट्रेड यूनियनों के संबंध में कानून बनाने की मांग उठ रही थी।

लंबे समय से ट्रेड यूनियन कार्रवाइयों के बारे में ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं की रक्षा के लिए कोई कानून नहीं था।

Naval Mutiny @Advaidism
आज़ादी के पहले मुंबई में भातीय जल सेना यानी नेवी के सिपाहियों का विद्रोह हुआ था जिसमें सूती मिल के मज़दूरों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था। दूसरे दिन टाइम्स ऑफ़ इंडिया प्रकाशित ख़बर। फ़ोटो साभारः @Advaidism/Twitter
भारतीय ट्रेड यूनियन आंदोलन का शैशव काल

बी. पी. वाडिया के अभियोजन के बाद ए.आई.टी.य़ू.सी. ने लंदन की वर्कर्स वेलफ़ेयर लीग के माध्यम से ब्रिटिश सरकार से उस विषय पर विचार विमर्श का प्रयास किया।

तदनुसार ब्रिटिश ट्रेड यूनियन कांग्रेस का एक प्रतिनिधि मंडल सपरूजी सकलतवाला के नेतृत्व में भारत राज्य के सचिव मि. मांटेग्यू से 22 मार्च 1921 को मिला।

प्रतिनिधि मंडल ने मि. मांटेग्यू को यह समझाने का प्रयास किया कि भारतीय ट्रेड यूनियन आंदोलन के शैशव काल में सरकार को उन लोगों की मदद करनी चाहिए जो लोग मजदूरों को संगठित करने के लिए समर्पित हैं।

सरकार को भारत के अधिकारियों को यह महसूस कराना चाहिए कि मजदूरों को संगठित होने का कानूनी अधिकार है और उनके इस अधिकार को सरकारी शक्ति और प्रभाव से सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए।

भारत सरकार ने सन् 1921 में एक सर्कुलर जारी कर इस बारे में अपना रुख स्पष्ट किया। सर्कुलर में ट्रेड यूनियन के उद्देश्य और संविधान तय करने की आवश्यकता बताई गई।

वहीं ट्रेड यूनियन आंदोलन को सही और विवेकपूर्ण दिशा में चलाने पर बल दिया गया। लेकिन 1921-22 के दौरान आंदोलन की घोषणा हो जाने से सरकार ने इस मामले को आगे बढ़ाने में कोई रुचि नहीं दिखाई।

यूनियन पर कंट्रोल चाहते थे अंग्रेज़

सन् 1921 में लेजिस्लेटिव असेंबली के नामित सदस्य एन.एम. जोशी ने विधानसभा (असेंबली) में ट्रेड यूनियन के पंजीकरण और वास्तविक ट्रेड यूनियन गतिविधियों के लिए ट्रेड यूनियन पदाधिकारियों की नागरिक और आपराधिक मामलों के दायित्व से सुरक्षा संबंधी प्रस्ताव पेश किया।

सम्राज्यवादी शासकों ने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया क्योंकि उनके लिए ट्रेड यूनियन गतिविधियों का मतलब कानून और व्यवस्था  से अधिक कुछ नहीं था।

उनके कहने का आशय था कि मिस्टर जोशी हिंसक गतिविधिओं के लिए सुरक्षा पाने का प्रयास कर रहे हैं, इसलिए यह प्रस्ताव एक खतरनाक चाल है।

इसके बाद सर थामस हॉलैंड ने केवल ट्रेड यूनियनों का पंजीकरण करने और ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं को कोई कानूनी सुरक्षा न प्रदान करने सम्बन्धी प्रस्ताव पेश किया।

विधानसभा ने यह प्रस्ताव पारित कर लिया। इस बुनियादी संशोधन से जोशी के प्रस्ताव के दोनों उद्देश्य मात खा गए।

भारतीय ट्रेड यूनियन ऐक्ट 1926 बना पर ढेरों पाबंदियों के साथ

भारतीय ट्रेड यूनियन ऐक्ट 1926 के नियमानुसार, यूनियनों का पंजीकरण उसका संविधान और लेखा परीक्षक द्वारा जांच हुआ खाता अनिवार्य है।

इस ऐक्ट के नियमानुसार, ट्रेड यूनियनों की कार्यकारिणी के 50 प्रतिशत सदस्य उसी उद्योग में  कार्यरत होने चाहिए और बाहर के सदस्यों का प्रतिशत पचास से अधिक नहीं होना चाहिए।

इस ऐक्ट ने यूनियन कोष के खर्च को सख्ती से वैध उद्देश्यों तक सीमित कर दिया और नागरिक और राजनितिक कार्यों के लिए कोष के प्रयोग पर पाबन्दी लगा दी।

भारतीय ट्रेड यूनियन ऐक्ट 1926 और उसी दौरान इंग्लैंड में प्रचलित ट्रेड यूनियन ऐक्ट में बहुत अंतर था। भारत का ऐक्ट पंजीकरण और गैर पंजीकृत यूनियनों में  फर्क करता था पर ग्रेट ब्रिटेन में इस प्रकार का अंतर नहीं था।

ट्रेड यूनियन गतिविधिओं पर कठोर प्रतिबन्ध लगाना, उनके कोष पर आपत्ति उठाना और ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं को यूनियन गतिविधियों के लिए नागरिक और अपराधमूलक जिम्मेदारी से सुरक्षा प्रदान करने से इंकार करना।

ये सरकार द्वारा भारतीय ट्रेड यूनियन आंदोलन के प्रति औपनिवेशिक रुख का परिचायक है।

पंजीकृत ट्रेड यूनियन के कोष के सम्बन्ध में इन औपनिवेशिक प्रतिबंधों के साथ-साथ, भारतीय दंड संहिता की धार 120बी को लागू करना वास्तव में गैर पंजीकृत यूनियनों की सामूहिक कार्रवाइयों को गैर कानूनी घोषित करना था।

भारत में ‘रॉयल कमीशन आन लेबर ‘ द्वारा, गैर पंजीकृत यूनियनों के सदस्यों और पदाधिकारियों पर सरकार द्वारा कानूनी कार्रवाइयों के अनेक साक्ष्य एकत्र किये गए।

सांकेतिक तस्वीर। फ़ोटोः वर्कर्स यूनिटी
इस नकारे ट्रेड यूनियन एक्ट का पुरज़ोर विरोध

सन् 1927 में ए.आई.टी.यू.सी के सातवें दिल्ली अधिवेशन में  इस ऐक्ट का कड़ा विरोध हुआ। अधिवेशन में इंग्लैंड की तरह भारतीय ट्रेड यूनियनों के फंड से सरकारी प्रतिबंधों को समाप्त करने की मांग की गई।

सन् 1928 में एन.एम. जोशी ने लेजिस्लेटिव असेम्बली में गैर पंजीकृत  यूनियनों को कानूनी सुविधाएं प्रदान करने के लिए एक बिल पेश किया लेकिन बिल पारित नहीं हो सका।

इसके साथ ही साथ उद्योग मंत्री सर थॉमस हॉलैंड ने ऐक्ट के बारे में उठी आपत्तियों की सरकारी व्याख्या प्रस्तुत करते हुए कहा कि इस ऐक्ट का उद्देश्य ट्रेड यूनियन को ‘स्वस्थ दिशा’ में  विकसित करना है।

ऐक्ट के नियमों और सरकारी प्रवक्ता की अभिव्यक्ति से यह बिलुकल साफ़ हो गया कि सरकार ट्रेड यूनियनों को सरकारी निर्धारित लाइन के अनुरूप विकसित करना चाहती है।

इस ऐक्ट के तीन वर्ष बाद ट्रेड डिसप्यूट ऐक्ट पारित होने पर सरकार द्वारा ट्रेड यूनियनों पर कठोर नियंत्रण कायम करने की मंशा स्पष्ट रूप से सामने आ गई।

तत्कालीन मजदूर नेता, पंजीकृत और गैर पंजीकृत ट्रेड यूनियनों के बीच विभेदीकरण और खास तौर पर गैर पंजीकृत यूनियनों को वस्तुतः गैर कानूनी करार देने के सख्त ख़िलाफ़ थे।

उनकी भावना थी कि भारतीय ट्रेड यूनियन आंदोलन की आरम्भिक अवस्था में गैर पंजीकृत यूनियनों का होना स्वाभाविक था और इसलिए ऐसी यूनियनों को भी कानूनी सुरक्षा प्रदान करना सरकार की जिम्मेदारी है।

दो मजदूर नेताओं (एन.एम. जोशी और लाला लाजपत राय) ने लेजेस्लेटिव असेम्बली मेँ इसका प्रबलतापूर्वक  समर्थन किया।

…और यूनियन कोष पर पाबंदी लगा दी गई

रॉयल कमीशन ऑन लेबर इन इंडिया 1931 ने भी अपनी रिपोर्ट में सरकार द्वारा ट्रेड यूनियन गतिविधियों को ‘सही’ और ‘विवेक पूर्ण’ लाइन पर चलाने के लिए, इस घोषित नीति को सही ठहराया और आगे कहा कि ट्रेड यूनियन आंदोलन के हित में ऐसा ऐक्ट बहुत पहले ही लागू होना चाहिए था।

भारत में जब ट्रेड यूनियनों का गठन लागू हुआ और देश के विभिन्न भागों में आंदोलन फूट पड़ा तब घबराहट से घिरी साम्राज्यवादी सरकार ने ट्रेड यूनियन को अर्थवाद की सीमाओं में बांधकर रखने और इसे राजनीतिक स्वरूप ग्रहण करने से रोकने के लिए चारों तरफ से घेरा डालने और शिकंजा कसने की कार्यनीति अपनाई।

आतंकित साम्राज्यवादी इस कोशिश में थे कि मज़दूर वर्ग राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन में किसी प्रकार शामिल न हो।

इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए सरकार ने ट्रेड यूनियन ऐक्ट में अनेक प्रतिबंधों के साथ, खास तौर पर यूनियन कोष को राजनीतिक इस्तेमाल से रोकने के लिए नियम बनाएं इन प्रावधानों को लागू करने से भारतीय ट्रेड यूनियन आंदोलन के

विकास में साम्राज्यवाद का नंगा हस्तक्षेप दिखाई दिया।

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