UP में ग्रेनाइट कंपनी ने मंदी का हवाला देकर 72 मज़दूरों को नौकरी से निकाला

उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में स्थित एक ग्रेनाइट कंपनी ने अपने 70 से ज्यादा मज़दूरों को नौकरी से निकाल दिया है।

कंपनी से हटाए जाने के विकोध में सभी मज़दूरों ने हड़ताल भी कि।

ये कंपनी ललितपुर जिले के कालापहाड़ और मडवारी गांव में ग्रेनाइट खनन का काम करती है।

यहां के एक मज़दूर ने वर्कर्स यूनिटी से फोन पर बातचीत के दौरान इस मामले के विषय में बताते हुए कहा कि कंपनी ने साल 2018 से मज़दूरों के पीएफ का पैसा जमा नहीं किया था।

इसके बाद कंपनी ने सभी मज़दूरों के तीन महीने (जुलाई, अगस्त, सितंबर) का वेतन रोक दिया। मज़दूरों ने जब इसकी शिकायत जिलाधिकारी से की तब कंपनी ने मज़दूरों का दो महीने का वेतन जारी किया गया।

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मज़दूरों ने किया विरोध

इसके बाद कंपनी ने 11 सितंबर 2019 को एक नोटिस जारी करते हुए 72 मज़दूरों को दो समूहों में बांटकर 15-15 दिन काम पर आने और उन्हें उसी का वेतन देने की घोषणा कर दी।

इसके लिए कंपनी ने तर्क दिया कि वह गंभीर वित्तीय संकट का सामना कर रही है, इसलिए वह अपने कुछ प्लांटो को बंद कर रही है।

नोटिस मिलने के बाद कंपनी के फैसले से प्रभावित होने वाले सभी 72 मज़दूर हड़ताल पर बैठ गए और विरोध में काम पर न जाने का ऐलान कर दिया।

इस दौरान बीते चार अक्टूबर को मज़दूरों ने कंपनी प्रबंधन को एक पत्र लिखा। इस पत्र में उन्होंने कंपनी के स्थानीय प्रबंधन द्वारा कर्मचारियों के भारी मानसिक और आर्थिक शोषण किए जाने का आरोप लगाते हुए कहा कि न तो उन्हें समय से वेतन दिया जाता है, न ही कभी स्वास्थ्य परीक्षण किया जाता है, न तो आकस्मिक दुर्घटना के संबंध में कोई इंतजाम है।

पत्र में उन्होंने लिखा कि समय से भुगतान न होने के कारण वे भुखमरी के कगार आ गए हैं।

उन्होंने पत्र लिखते हुए ये आरोप लगाया कि प्रबंधन कंपनी के घाटे में चलने की बात कहकर उन्हें गुमराह कर रही है और उनके वेतन में कटौती करने या उन्हें निकालने की तैयारी कर रही है।

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कंपनी ने निकालने का दिया आदेश 

इसके बाद मज़दूरों की हड़ताल को देखते हुए कंपनी ने सभी मज़दूरों को 14 अक्टूबर से ही कंपनी से निकालने का आदेश दे दिया।

कंपनी से निकाले गए मज़दूर ने आगे बताया कि पीएफ, वेतन और दिवाली का बोनस न मिलने की शिकायत करने के बाद कंपनी ने उन लोगों को बाहर निकालने का फैसला किया है।

मूल वेतन अधिक होने के बावजूद कंपनी कम वेतन देती है और महंगाई भत्ता भी नहीं दिया जाता है।

वो आगे बताते हैं कि कंपनी में करीब 90 मज़दूर हैं, जिसमें से 72 मज़दूरों को निकाला जा रहा है।

इसमें 26 मज़दूर स्थायी हैं, 26 मस्टर रोल पर और 26 दिहाड़ी मजदूर हैं।

 

वेतन मिलने में होती थी देरी 

उनका कहना है कि एक महीने का वेतन दूसरे महीने के आखिर में दिया जाता था और वेतन देने में हमेशा ही देरी होती थी बावजूद इसके हम लोगों को कहीं बाहर न जाना पड़े इस डर के कारण काम करते रहते थें।

वो आगे बताते है कि काम से निकालने के बदले मुआवजे के रूप में कंपनी ग्रेच्यूटी और छह महीने का अतिरिक्त वेतन देने की बात कर रही है।

लेकिन 15-20 सालों से यहां काम करते आ रहे मज़दूरों की उम्र अब 40-50 के बीच हो गई है। यहां से निकाले जाने के बाद इस उम्र में उनको और कही काम नहीं मिलेगा।

कंपनी से निकाले गए मज़दूरों में दिहाड़ी मजदूरी करने वाले एक मज़दूर ने बताया कि उन्हें कंपनी में काम करते हुए 15-20 साल हो गए हैं

लेकिन आज तक उनका पीएफ नहीं कटा है पर जब उन लोगों ने पीएफ सहित अपनी कुछ मांगों को लेकर शिकायत की तब उन्हें निकाल दिया गया।

वो आगे बताते हैं कि वो रोजाना कंपनी में काम करने के लिए जाते हैं लेकिन कंपनी उनसे काम नहीं करवा रही है।

कंपनी कह रही है कि अब तुमको काम नहीं मिलेगा, कहीं भी जा सकते हो। जो भी तुम्हारा पैसा है वो नवंबर तक मिल जाएगा,

काम तो चालू करना है लेकिन तुम लोगों को हटाना है, तुम लोग नेतागिरी करते हो और यहां-वहां शिकायत करते हो, हम लोग तो चाहते हैं कि काम चालू हो जाए और जैसे इतने सालों से करते आ रहे हैं वैसे करते रहेंगे।’

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हक की आवाज उठाने पर कंपनी ने निकाल

वो आगे बतातें है कि जब हमने अपने हक में आवाज उठाई तब कंपनी ने हमें निकाल दिया। हम सभी लोग काम करना चाहते हैं।

पहले वाले प्रबंध निदेशक के रिटायर होने के बाद नए माइनिंग एजेंट ने हम लोगों को हटा दिया है।

उनका कहना है कि हमें पेंशन, मेडिकल और अन्य सुविधा मिलनी चाहिए लेकिन कोई सुविधा नहीं मिल रही है।

निकाले जाने के बाद हमने न्याय की मांग को लेकर शिकायत भी की हम गरीब और मजदूरो को करीब 18 हजार वेतन मिलना चाहिए लेकिन अभी 12 हजार से भी कम मिलता है।

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मज़दूरों का वेतन बढ़ाने का हुआ था फैसला

उन्होंनें आगे बताया कि 1 साल पहले हमारी शिकायत पर सहायक श्रमायुक्त ने कंपनी के अधिकारियों को झांसी बुलाकर कहा था कि किसी आदमी का वेतन 18 हजार से कम नहीं होना चाहिए और वेतन बढ़ाने के लिए एक हफ्ते का समय भी दिया था लेकिन कंपनी ने वेतन नहीं बढ़ाया।

उनका कहना है कि कुछ लोग यहां 1996 से काम कर रहे हैं, अब अचानक निकाल दिए जाने के बाद कुछ समझ नहीं आ रहा है कि क्या करें और अगर निकाल भी रहें हैं तो कम से कम सही पैसा दें।

वो आगे बतातें हैं कि उनके घर की परिस्थितियां ठीक नहीं है और अचानक से नौकरी जाने से उनके सामने विकट स्थिति पैदा हो जाएगी स्थाई मज़दूर हो या ठेका सभी का यही हाल है।

उनका आगे कहना है कि ये लोग सभी के साथ फर्जीवाड़ा कर रहे हैं। तीन-चार साल पहले ये लोग 150 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से देते थे।

लेकिन अधिकारियों को दिखाने के लिए दूसरा रजिस्टर रखते थे जिसमें हमें 15 दिन उपस्थित, 15 दिन अनुपस्थित और एक दिन का वेतन 300 रुपये दिखाते थे।

मज़दूरों द्रारा पीएफ कमिश्नर कानपुर से शिकायत के बाद कंपनी ने पीएफ का पैसा जमा तो करा दिया पर अभी तक नौकरी की मांग को लेकर किसी भी तरह का बयान नहीं दिया है।

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