हिमाचल के एचएफ़सीएल में मांगपत्र दिया तो कंपनी ने 13 मज़दूरों को निकाला

हिमाचल प्रदेश के सोलन स्थित एक कारखाना एच एफ सी एल लिमिटेड में काम करने वाले मज़दूरों को कंपनी प्रबंधन द्रारा लगातार परेशान किया जा रहा है।

इसके साथ ही कंपनी ने मज़दूरों के मांग पत्र को स्वीकार न करने के साथ कंपनी से 13 लोगों को निकाल दिया।

कंपनी यूनियन के एक मज़दूर ने वर्कर्स यूनिटी को फोन पर बातचीत के दौरान बताया कि एच एफ सी एल लिमिटेड एक टेलीकॉम कंपनी है जिसका हेड ऑफिस दिल्ली के ग्रेटर कैलाश में हैं और कंपनी की फैक्ट्री सोलन में हैं।

उनका कहना है कि यहां 28-30 सालों से काम कर रहे मज़दूरों ने कंपनी को एक मांग पत्र दिया था जिसे मज़दूर हर तीन साल बाद कंपनी मैनेजमेंट के सामने पेश करते थे।

लेकिन इस बार जब अपनी मांगों को लेकर मज़दूरों द्रारा मांग पत्र पेश किया गया तो मैनेजमेंट और मज़दूरों के बीच गतिरोध पैदा हो गया।

मांग पत्र पेश करते ही कंपनी मैनेजमेंट ने कंपनी में तालाबंदी कर दी और लगभग 63 मज़दूरों के काम पर आने को लेकर रोक लगा दी।

इस कंपनी में लगभग 200 की संख्या में मज़दूर काम करते है, कंपनी ने लगभग 3 माह तक हिमाचल सरकार की अनुमति के बिना कारखाने में तालाबंदी जारी रखी।

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कंपनी ने नहीं माना कोर्ट का फैसला

वो आगे बतातें है कि बाद में इस मामले को लेकर मज़दूरों ने लेबरकोर्ट में आवाज उठाई।

जिसके बाद लेबर कोर्ट ने कंपनी को तालाबंदी खोलने और मज़दूरों को वापस काम पर लेने का फैसला सुनाया बवजूद इसके कंपनी ने कोर्ट का फैसला मानने से इंकार कर दिया।

हिमाचल सरकार ने भी कंपनी में तालबंदी खत्म करने का ऑर्डर दिया और जब मज़दूरो ने काम पर वापस जाने की मांग की तो कंपनी गेट के बाहर भारी संख्या में पुलिसबल तैनात कर दी गई।

उनका आरोप है कि 3 माह के बाद तालाबंदी खोलने के सरकारी आदेशों के बावजूद भी पुलिस और प्रबंधकों की गुंडागर्दी ने किसी भी मज़दूर को काम पर नहीं जाने दिया।

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workers unity

महिला मज़दूर को आईं चोटें

असल में एच एफ सी एल लिमिटेड कंपनी में ज्यादात्तर महिला मज़दूर काम करती हैं और जब उन्होंने कंपनी में काम करने जाने की कोशिश की तो उनके साथ पुलिस द्रारा धक्का मुक्की की गई और उनके मुंह पर ही गेट बंद कर दिया।

इस दौरान महिला मज़दूर समेत अन्य मज़दूरों को भी काफी चोटें आई, जब मज़दूरों ने स्थानीय एसएचओ से ये सवाल किया कि वो किस कानून के तहत उनको काम पर जाने से रोक जा रहा है तो एसएचओ ने कोई जवाब नहीं दिया।

इसके बाद मज़दूरों ने स्थानीय एसपी को पत्र लिखकर कहा की अगर आप का पुलिस विभाग हमें काम पर जाने से रोकता है तो पुलिस विभाग ही हमे वेतन देगा।

जिसके बाद पुलिस पीछे हट गई और वहां स्थानीय एसडिएम ऑफिसर को इस मामले का संज्ञान दिया जिसके बाद एसडिएम ने कंपनी प्रबंधन और मज़दूरों यूनियन को समझौते के लिए बुलाया।

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एसडिएम के सामने दोंनों पक्षों का हुआ समझौता

इस दौरान एसडिएम के सामने दोंनों पक्षों से एक अंडरटेकिंग ली गई जिसके बाद कंपनी ने तालाबंदी खोलने को फैसला लेकर मज़दूरों को वापस काम पर ले लिया।

लेकिन जैसे ही ये मज़दूर वापस काम पर गए, मैनेंजमेंट द्रारा उनको परेशान करना शुरू कर दिया गया।

और यूनियन के मुख्य तीन लोगों अध्यक्ष, प्रधान महासचिव और संयुक्त सचिव का सस्पेंशन नहीं रोका गया।

ये लोग लगभग 5 माह से स्सपेंड हैं पर अभी तक प्रबंधन द्रारा सस्पेंशन की वजह नहीं बताई गई।

इतना ही नहीं कंपनी ने यूनियन के इन तीन मुख्य लोगों के अलावा 10 और मज़दूरों का जबरन ट्रस्फर कर भारत के अलग-अलग हिस्सों में भेजने का फैसला कर दिया।

जबरन किया मज़दूरों का ट्रस्फर

जबकि मज़दूरों का कहना ह कि कंपनी नियमों के अनुसार कंपनी इस तरह से ट्रस्फर नहीं कर सकती क्योंकि वो कारखानें के मज़दूर है जिनके ऊपर फैक्ट्री एक्ट लागू होता है जिस वजह से मज़दूरों का ट्रस्फर नहीं किया जा सकता।

इसके साथ ही मज़दूरों ने जो मांग पत्र पेश किया था उसको लेकर भी कोई फैसला अब तक नहीं हुआ।

वो ये भी बताते हैं कि इन सब के बाद भी कंपनी प्रबंधन ने यूनियन से बात करने की कोई कोशिश नहीं की।

उनका कहना है कि कंपनी इस तरह का रवैया अपना कर उन्हें जानबूझकर परेशान करने का काम कर रही है।

इतने संघर्ष के बावजूद उनकी परेशानी को सुनने वाला कोई नहीं है।

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