होंडा मानेसर ने 1000 नए कैजुअल भर्ती किए, फिर भी प्रोडक्शन पूरा नहीं

होंडा मानेसर में पिछले 72 दिन से ढाई हज़ार मज़दूर दिन रात धरने पर बैठे हैं लेकिन उनके साथ कंपनी का अभी तक कोई समझौता नहीं हो पाया है।

निकाले गए इन मज़दूरों ने बताया कि कंपनी ने 25 दिसम्बर के पहले तक 1000 कैजुअल मज़दूरों की भर्ती की है।

धरने पर बैठे एक मज़दूर ने बताया कि नए कैजुअल मज़दूरों को लगभग 17000 रुपये प्रतिमाह वेतन पर भर्ती किया गया है।

उल्लेखनीय है कि पांच नवंबर से पहले कंपनी 10-10 साल से काम करने वाले कैजुअल मज़दूरों की छंटनी कर रही थी।

इन मज़दूरों का कहना है कि उन्हें 14000 रुपये तनख्वाह दी जाती थी और परमानेंट वर्करों की तरह काम लिया जाता था।

उधर मानेसर में होंडा प्लांट के बाहर मैदान में ढाई महीने से धरना जारी है। मज़दूर रोज़ सुबह धरना स्थल पर पहुंचते हैं और शाम को जाते हैं।

नौकरी से निकाले जाने के कारण इन मज़दूरों को खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

एक मज़दूर ने बताया कि उसका कमरा धारूहेड़ा में है और वहां से कंपनी में आना जाना था। जबसे नौकरी गई है, उसे रोज़ 20 रुपये ख़र्च कर आना पड़ता है और इतना पैसा भी जुगाड़ पाना कठिन साबित होने लगा है।

वो भी कैंटर, ट्रक से लिफ़्ट लेकर जान जोख़िम में डालकर लटकते हुए यात्रा करनी पड़ती है। सभी मज़दूरों की हालत लगभग ऐसी ही है।

इस मज़दूर ने बताया कि कई मज़दूरों को मज़बूरी में कमरा खाली कर किसी दूसरे मज़दूर के कमरे में पनाह लेनी पड़ी है।

लेकिन जिन मज़दूरों को चार महीने पहले निकाल दिया गया था उनकी हालत तो भुखमरी जैसी हो गई है।

पिछले ढाई महीने में दर्जनों बार मैनेजमेंट और डीएलसी के साथ बैठक हुई है लेकिन अभी तक कोई हल नहीं निकला है।

मज़दूरों की मांग है कि कंपनी छंटनी के नाम पर निकाले गए लोगों को काम पर वापस ले।

अगर कंपनी उन्हें निकालती है तो सालों से काम करने वाले मज़दूरों को उनकी सर्विस के हिसाब से प्रति वर्ष एक लाख रुपये का हर्जाना दिया जाए।

होंडा मज़दूरों ने आठ जनवरी को देशव्यापी आम हड़ताल में भी हिस्सा लिया था और उस दिन होंडा कंपनी में काम करने वाले मज़दूरों ने भी एक सभा में हिस्सा लिया।

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