संसद के पहले सत्र में ही श्रम कानूनों पर चलेगा हथौड़ा

नई सरकार संसद के अपने पहले ही बजट सत्र में श्रम क़ानूनों बदलाव के लिए एक नया बिल पेश करने जारी है। सरकार दावा कर रही है कि इन बदलावों को लेकर सभी प्रमुख ट्रेड यूनियनों से सलाह मशविरा कर लिया गया है। लेकिन आरएसएस और भाजपा से जुड़े भारतीय मजदूर संघ ने ही इसे मोदी सरकार का मनमाना रवैया करार दे दिया है।  श्रम क़ानूनों को बदलने के लिए मोदी सरकार इतना व्यग्र है कि वो पहले संसद सत्र से ही इस पर हाथ लगा देना चाहती है।

44 श्रम कानूनों को ख़त्म कर उनकी जगह चार संहिताएं

इसके तहत मोदी सरकार 44 श्रम कानूनों को ख़त्म कर उनकी जगह चार प्रमुख संहिताएं लाने जा रही है।

1- मजदूरी 2-औद्योगिक सुरक्षा और कल्याण, 3- सामाजिक सुरक्षा और 4- औद्योगिक संबंध।

लेकिन बीएमएस के विरोध के बाद ये साफ़ हो गया है कि मोदी सरकार अपने सबसे क़रीबी यूनियन की सलाह नहीं सुन रही तो उसने बाकी यूनियनों की चिंताओं को कितना सुना होगा।

सरकार इस बहाने सभी प्रमुख श्रमिक यूनियनों के बीच व्यापक सहमति का दावा कर रही है क्योंकि प्रस्तावित विधेयक में सभी प्रकार के रोजगार के लिए राष्ट्रीय न्यूनतम मज़दूरी को शामिल करने की बात कही जा रही है।

बरेली से सांसद और केंद्रीय लेबर मिनिस्टर संतोष गंगवार ने कैबिनेट की पहली बैठक के बाद पत्रकारों से कहा था

हम आगामी कार्यक्रमों में नए श्रम कानून विधेयक लाएंगे। सभी ट्रेड यूनियनों से इस पर विचार-विमर्श कर लिया गया है।

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औद्योगिक संबंध कोड श्रम क़ानूनों को जंगल राज बना देगा

हालांकि विरोध को देखते हुए संकेत हैं कि सरकार एक झटके में सभी चार कोड पेश नहीं कर पाएगी।

बीएमएस ने मोदी सरकार के वेतन सुधारों का भले स्वागत किया है लेकिन उसने बाकी तीन लेबर कोड के प्रस्तावों की आलोचना की है।

सरकार के प्रस्तावों के अनुसार, ईएसआई और ईपीएफ़ को ख़त्म कर दिया जाएगा और उन्हें अन्य केंद्रीय स्कीमों के साथ विलय कर दिया जाएगा।

सामाजिक सुरक्षा निधि का निजीकरण कर दिया जाएगा।

भारतीय मजदूर संघ का दावा है कि प्रस्तावित औद्योगिक संबंध कोड श्रम क़ानूनों को जंगल राज बना देगा।

क्योंकि यह श्रमिकों की भर्ती और निकालने को आसान बना देगा।

यह हड़ताल करने के अधिकार पर प्रतिबंध लगाता है, यह सुरक्षा प्रावधानों को कम करता है।

काम के घंटे, छुट्टी और भत्ते की सुरक्षा से संबंधित नियमों को इतना ढीला कर देगा कि इसके रहने न रहने का कोई मतलब नहीं रह जाएगा।

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एकतरफावाद के युग की शुरुआत

भारतीय मजदूर संघ के अध्यक्ष सीके साजी नारायणन ने इंडिया टुडे टीवी से कहा, “हमने चार में से तीन श्रम संहिता पर आपत्ति जताई है, हम मजदूरी कोड पर सरकार के साथ हैं।

सीके साजी नारायणन ने कहा, “सरकार परामर्श के बारे में सकारात्मक है, मंत्री जेनेवा की यात्रा कर रहे हैं।

वह 18 जून को वापस आएंगे, हमें यकीन है कि हमारी चिंताओं को शामिल करने के लिए चर्चा होगी।”

वाम दलों से जुड़ी ट्रेड यूनियनों ने इन बदलावों का विरोध किया है।

सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (सीटू) ने आरोप लगाया है कि मोदी सरकार कॉर्पोरेट के दबाव में फँस गई।

सीटू के महासचिव तपन दास ने कहा, “श्रम के सुरक्षा मानकों को हटाना और एकतरफावाद के युग की शुरुआत करना भारतीय श्रम बाज़ार के लिए घातक है।

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हायर एंड फ़ायर की नीति

यूनियन बनाने के अधिकार को ख़त्म करना और बिज़नेस आसान करने के नाम पर हायर एंड फ़ायर नीति लागू करना ख़तरनाक है।”

जबकि पूंजीपति वर्ग इस बात से बिल्कुल निश्चिंत है कि ये बदलाव होकर रहेंगे।

एसोचैम के उप महासचिव सौरव सान्याल ने इंडिया टीवी से कहा, “44 श्रम कानूनों को ख़त्म कर एक में मिला कर जो बदलाव किए जा रहे हैं वो स्वागत योग्य है।

यह घरेलू अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने वाला साबित होगा।”

सरकार को उम्मीद है कि श्रम कानूनों को संहिताबद्ध करने से निवेश और विकास में तेजी आएगी।

लेकिन इस विधेयक को राज्यसभा में कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है जहां मोदी सरकार को बहुमत हासिल नहीं है।

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