भारत सरकार नहीं चाहती हाथ से मैला साफ़ करने की प्रथा बंद हो? (भाग-2)

By राजकुमार तर्कशील

हम कितने वर्षों से यह सुनते आ रहे हैं कि हाथ से मैला उठाना अमानवीय है, लेकिन मैला प्रथा का खात्मे का सरकार का क्या कार्यक्रम है?

सरकार मैला उठाने की प्रथा को किस रूप में देखती है? मात्र सफाई साफ़ सफ़ाई के तौर पर या जातिगत भेदभाव व उत्पीड़न के तौर?

जाने माने विद्वान आनंद तेलतुम्बड़े कहते हैं कि ‘भारत के संविधान ने छुआछूत का अंत कर दिया, लेकिन उन परिस्थितियों के लिए उसने कुछ नहीं किया जो छुआछूत को पैदा करती हैं। मैला प्रथा जाति आधारित काम है। जिसमें दलित जातियां ही लगी हुई हैं, सवर्ण जातियों द्वारा दलितों  से भेदभाव किया गया। जिनको छूने मात्र से सवर्ण अपवित्र हो जाते थे। इसीलिए मैला प्रथा जातीय उत्पीड़न व सामाजिक, आर्थिक भेदभाव पर टिका है।’

आज भी हम गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश व अन्य कई राज्यों में मैला उठाने की प्रथा के कड़वे यथार्थ को देख सकते हैं।

भाषा सिंह की पुस्तक ‘अदृश्य भारत’ में मैला उठाने की प्रथा के बजबजाते यथार्थ और सरकार के मैला निवारण कार्यक्रम की पोलपट्टी तो खोलती है। देश के अलग अलग हिस्से मे जारी यह प्रथा जातीय उत्डपीड़न के साथ जारी है।

चांद पर पहुंच गए पर गटर साफ़ करने की तकनीक कहां है

दलितों ने धर्म परिवर्तन कर दूसरे धर्मों को अपनाया लेकिन वह इस पेशे से मुक्ति नहीं पा सके। उन्हें अपनी ही जाति समुदाय से काट दिया गया, वे वहां पर भी जलालत का जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

उनकी बस्ती, शमशान, सब अलग अलग हैं। दूसरों का मल उठाना, मरे जानवरों को उठाना, सीवर की सफाई, रेल की पटरियों को साफ़ करने वाले दलित हैं। और यह पीढ़ियों से चली आ रही है, जिससे वे आजतक मुक्त नहीं हो पाए।

इसके साथ साथ हमें राजसत्ता का दोमुहांपन व भेदभावपूर्ण रवैया नजर आ रहा है। विज्ञान है, तकनीक है, हम चांद पर पहुंच गए हैं, लेकिन गटर की सफ़ाई या मैला उठाने से निजात के लिए कोई तकनीक नहीं विकसित कर पाए।

आख़िर इस समुदाय तक विज्ञान की पहुंच क्यों नही हुई? इस समुदाय को क्यों विज्ञान से दूर रखा गया?

सफ़ाई आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक बैजवाड़ा विल्सन सैनिटेशन को जाति आधारित व पुरुष सत्ता आधारित पेशा  मानते हैं।

वो सरकार के स्वच्छ भारत अभियान व निर्मल भारत अभियान को समस्या मूलक कहते हैं। यह रुख एक तरह से स्वच्छता एवं जाति के अंतर्संबंध पर पर्दा डालता है।

manual scavenger @Safai Karmachari Andolan

स्वच्छता अभियान

जाति के प्रश्न को संदर्भित किए बिना हम सफ़ाई या सैनिटेशन के सवाल से निपट नहीं सकते।

लेकिन सच्चाई तो यह है कि सरकारी हमें यह दिखाने की कोशिश कर रही हैं, कि अब वह पुराना भारत नहीं है बल्कि नया भारत है जहां हम अनुशासित हैं। हम अपनी सफाई करते हैं।

इसके विपरीत ज़मीन पर क्या घटित हो रहा है, सफ़ाई कौन कर रहा है? सीवर या सेप्टिक टैंक में उतर कर कौन साफ कर रहा है? और सफाई के दौरान मर कौन रहा है? और सेल्फी कौन ले रहा है?

असल सच्चाई तो यह है कि स्वच्छ भारत अभियान केवल शौचालय निर्माण पर केंद्रित है। इस पूरे अभियान में मैला ढोने की प्रथा का अंत कहीं नहीं है।

जाति आधारित इस काम से मुक्ति दिलाने मे सरकारें लीपापोती करती रही हैं। यह खेल आज़ादी के बाद ही शुरू हो गया, जो अब तक लगातार चलता आ रहा है।

पहली समिति 1949 को बी.एन. बर्वे की अध्यक्षता में बनी। जिसका काम सफाई कर्मियों की स्थिति का अध्ययन, उनके कामों की मौजूदा स्थितियों को बेहतर करने के रास्ते और सुझाव देना था।

सरकारी दोमुहापन

इस समिती ने अपनी रिपोर्ट 1957 मे दे दी, लेकिन हुआ कुछ नहीं।

उसके बाद 1957 मे  गृहमंत्रालय ने खुद एनआर मल्कानी की अध्यक्षता में एक समिति गठित की, लेकिन समिति के सुझाव सुझाव ही रहे।

1965 में सरकार ने सफ़ाई कर्मियों की जजमानी के ख़ात्मे के सवाल की जांच पड़ताल के लिए समिति गठित की लेकिन सिफारिशें अपनी मौत मर गईं।

ऐसे ही अनगिनत कमेटियां समितियां बनाई गईं, लेकिन उनकी सिफारिश धरी की धरी रह गई।

मंत्रालय के नाम भी बदले गए लेकिन वही ढाक के तीन पात। ये चंद उदाहरण हैं जो सरकार के दोमुहेपन व भेदभाव को दर्शाते हैं।

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(क्रमशः – लेखक हरियाणा के रहने वाले हैं। स्वेच्छा से पत्रकारिता के छात्र हैं और सामाजिक बदलाव के मुद्दों पर लिखते हैं।)

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One thought on “भारत सरकार नहीं चाहती हाथ से मैला साफ़ करने की प्रथा बंद हो? (भाग-2)

  • May 18, 2019 at 4:55 am
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    हां, सरकारों को ही नही, हम सबको इन सिवर सफाई कर्मचारियों की ही नही, सरकारी स्थाई व अस्थाई सफाई कर्मचारियों के हकों के लिए भी लड़ना चाहिए। मैं लड़ता रहा हूं। BSNL में अधिकारी की पोस्ट पर रहते हुए भी समय निकाल कर, छुट्टियां लेकर इनके पीछे भागता रहा हूं। एक और केवल एक विशेष बात कि सामाजिक रूप से अप्रतिष्ठित एवं तिरस्कृत कार्य के करने वालों से अज्ञानतावस संवेदनहीन बने बाकी के अधिकतम लोग घृणा करेंगे ही। इसी वजह से इन सफाई कर्मचारियों में स्वयं के प्रति भी सम्मान बचा ही नही है। स्वयं के प्रति भी केवल घृणा ही बची है। इसलिए इनका अपना जीवन यापन एवं परिवेश भी कमोबेश गंदा ही रहता है। इनकी कर्महीनता, अज्ञानता, अभाव, शोषण सहना, अनपढ़ता, पिछड़ापन आदि आदि इनके लिए तुष्टिकरण के हथियार बनकर रह गए हैं। शोषण से उबरने का विचार भर भी इन्हें शोषण सहते रहने की बनिस्बत ज्यादा कष्टकर लगता है।
    ऐसे में जरूरी है कि इनके लिए संघर्ष के साथ साथ , इनमें मानवीय एहसास भी पैदा किया जाए। यह भी सही है कि आत्मामहीनतम लोगों में मानवीय ऐहसास पैदा करना बनिस्बत अति मुश्किल कार्य है। किंतु करना ही होगा। यही स्थाई हल है। बेशक, यह क्रांति करने जैसा है। और क्रांति एक लम्बा रास्ता है। अब तक इनके लिए सामने आए संघर्षी लोग यही गल्ती करते रहे कि अपने अभियान को क्रांति से नही जोड़ा ! स्वाभिमान पैदा किए बिना स्थाई हल असम्भव है। बगावतें सफल तो हो जाती हैं किंतु दूरगामी परिणाम देने वाली साबित नही हो पाती।
    मैं इन सफाई कर्मचारियों को परिकोसंस (सेफ्टी मेजर्स) के लिए समझाता भी था। इनके लिए अकेला लड़ता भी था। किंतु मृतक के अभिभावक स्वयं मैदान छोड़कर आधे अधूरे मुवावजे में ही समझौता कर लेते थे।
    मेरी वजह से ही हरियाणा में इन अस्थाई व ठेका प्रथारत कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन निजी बैंक खातों द्वारा मिलना शुरू हुआ था। किंतू यें मना करने पर भी, न हटाए जाने की जिम्मेदारी लेने के बावजूद भी अपने एटीएम ठेकेदार को देकर रखते थे। इन्हें अस्थाई भर्ती नही किया जा सकता। मेरे अकेले के संघर्ष के बल पर ही हरियाणा सरकार ने इन सबको पक्का करने के लिए इनकी डाक्टरी भी करवा ली थी।
    किंतू मैं इन्हें लगातार समझाता रहा कि स्वाभिमानी व अपने काम के प्रति इमानदार बनो। किंतछ इन्होने ऐसा नही किया। मजबूरन मुझे अपना हाथ वापिस खींचना पड़ा और यें स्थाई नही हो सके। मैं इनमें क्रांति भी करना चाहता था।
    इनके हकों के लिए सरकारों से लड़ना कतई मुश्किल नही है। मुश्किल है तो इनमें मानवीय अहसास का जगाना। अभी भी इन्हें अपने से व व्यवस्था से लड़ने के लिए तैयार करने की कोशिश करता हूं। किंतू यें वैसे ही शोषित ही रहना चाहते हैं।
    अमरनाथ पारचा जींद हरियाणा। 9468302723

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