भारतीय रेलवेः 7 कारखाने निगम बनेंगे, हज़ारों नौकरियां दांव पर

बनारस वही जगह है जहां अपने पिछले कार्यकाल में पीएम नरेंद्र मोदी ने एक सभा में भारतीय रेलवे को न बेचने की क़सम खाई थी।

हालांकि उसके बाद भी मोदी-1 सरकार पर्दे के पीछे रेलवे को टुकड़ों टुकड़ों में बेचने की कार्रवाई जारी रखे रही।

बंपर जीत के बाद सत्ता पर दोबारा काबिज़ हुई मोदी-2 सरकार ने शपथग्रहण के एक पखवाड़े में ही बनारस के डीरेका समेत 7 रेलवे कारखानों को निगम बनाने के बहाने निजी हाथों में देने की कोशिश शुरू हो गई है।

ख़बर के अनुसार, मोदी सरकार वाराणसी के डीरेका समेत रेलवे के सात कारखानों को निगम बनाने का फैसला कर लिया है।

दोबारा पीएम बनने के तुरंत बाद ही नरेंद्र मोदी ने सभी सरकारी उपक्रमों को निजी हाथों में देने के लिए 100 दिन का एक्शन प्लान दे दिया है।

रेलवे बोर्ड ने 18 जून को अगले 100 दिन के एक्शन प्लान में अपनी सभी प्रोडक्शन यूनिटों को एक कंपनी बनाकर उसके अधीन करने का प्रस्ताव दिया है।

निजी लाभ पर रहेगा ध्यान

प्लान के मुताबिक, सभी उत्पादन इकाईयां निजी लाभ के आधार पर कामकरेंगी।

इन सातों कारखानों को भारतीय रेलवे की नई इकाई इंडियन रेलवे रोलिंग स्टॉक कंपनी के अंडर लाया जाएगा, जिसका मैनेजिंग डायरेक्टर अलग होगा।

इस योजना के तहत रायबरेली के माडर्न कोच फैक्ट्री का भी निगमीकरण किया जाएगा।

जिन प्रोडक्शन यूनिटों को निगम बनाए जाने हैं, उनमें हैं- चितरंजन लोकोमोटिव वर्क्स आसनसोल, इंटीग्रल कोच फैक्ट्री चेन्नई, डीजल रेल इंजन कारखाना वाराणसी, डीजल माडर्नाइजेशन वर्क्स पटियाला, व्हील एंड एक्सल प्लांट बेंगलुरु, रेल कोच फैक्ट्री कपूरथला और माडर्न कोच फैक्ट्री रायबरेली।

लागू होगी ठेकाप्रथा

अभी तक इन उत्पादन इकाईयों के कर्मचारी भारतीय रेलवे के केंद्रीय कर्मचारी हैं और उनपर रेल सेवा अधिनियम लागू होता है। इन कर्मचारियों को केंद्र सरकार की सुविधाएं मिलती हैं। जीएम ही पूरी यूनिट के लिए ज़िम्मेदार होते हैं।

निगमीकरण के बाद ग्रुप सी और डी का कोई भी कर्मचारी भारतीय रेलवे का हिस्सा नहीं होगा।

ग्रुप सी और ग्रुप डी के कर्मचारी निगम के कर्मचारी हो जाएंगे जिनपर रेल सेवा अधिनियम लागू नहीं होगा और कांट्रैक्ट पर कर्मचारी रखे जाएंगे।

कर्मचारियों को केंद्रीय सरकार की सुविधाएं नहीं मिलेंगी, सेवा शर्ते भी बदल जाएंगी।

इसे लागू करने के पीछे सरकार का तर्क है कि निगमों पर सरकार की ज्यादा जिम्मेदारी नहीं होगी और उन्हें अपना खर्च खुद जुटाना होगा।

जरूरत पड़ने पर सरकार फंड का इंतजाम करेगी लेकिन आयात या निर्यात के लिए रेलवे बोर्ड पर नई कंपनी निर्भर नहीं रहेगी।

पीएम ने निगम न बनाने का किया था वादा

लेकिन कर्मचारियों और ट्रेड यूनियनों का कहना है कि जिन इकाइयों के पास ज्यादा जमीन और करोड़ों की मशीनें हैं उनका निगमीकरण किया जा रहा है।

ग्रुप सी और डी के कर्मचारियों की नौकरी असुरक्षित हो जाएगी और ठेके पर भर्तियां होंगी।

कर्मचारियों को किसी भी तरह की सरकारी सुविधा नहीं मिलेगी। स्वायत्तता देने के नाम पर निगम को घाटे में दिखाया जाएगा और फिर धीरे से निजी कंपनियों को उन्हें बेच दिया जाएगा।

बनारस के डीरेका कर्मचारी परिषद के संयुक्त सचिव वीडी दुबे ने जीएम रश्मि गोयल के नाम को पत्र लिखकर इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया है।

उत्पादन इकाइयों के निगमीकरण के प्रस्ताव से कर्मचारियों में गहरा आक्रोश है। डीरेका में करीब 6000 कर्मचारी हैं।

चिट्ठी में कहा गया है कि डीरेका के विस्तारीकरण का शिलान्यास करते हुए खुद प्रधानमंत्री मोदी ने इसके निगमीकरण से इनकार किया था।

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