NSSO के रिपोर्ट के अनुसार निजी संस्थाओं में मज़दूरों का जमकर शोषण

हाल ही में नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन कि रिपोर्ट से इस बात का खुलासा हुआ है कि देश में  निजी संस्थाओं के मज़दूरों को सबसे ज्यादा घंटे काम करना पड़ता है। 

निजी संस्थाओं में मज़दूरों  का जमकर शोषण

निजी संस्थाओं में मज़दूरों का जमकर शोषण हो रहा है। उनकी हलात लगातार खराब होती जा रही है।

नौकरीपेशा लोगों के शोषण में वृद्धि उस समय हुई जब 1999 में वाजपेयी सरकार बनी और श्रम कानूनों में संसोधन किया गया।

2014 में जब मोदी सरकार बनी तो उद्योगपतियों के हौसले फिर से बुलंद हो गए।

मोदी सरकार पिछली बार ही श्रम कानून में संसोधन कर कर्मचारियों के अधिकारों में कटौती करने वाली थी।

क्योंकि राज्य सभा में सरकार अल्पमत थी तो सरकार के मंसूबे कामयाब नहीं हो पाए।

पर इतना जरूर हो गया व्यापारियों ने कर्मचारियों का शोषण शुरू कर दिया।

बेरोजगारी और पारिवारिक जिम्मेदारियों की वजह से युवा इस शोषण को झेलने पर मज़बूर है

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काम के जयादा घंटे

हाल ही में नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन कि  रिपोर्ट से इस बात का खुलासा हुआ कि देश में नौकरीपेशा लोगों को मजदूरों से भी सबसे ज्यादा काम करना पड़ता है।

रिपोर्ट के अनुसार शहरों में प्राइवेट नौकरी करने वाले पुरुषों को हफ्ते में करीब 60 घंटे काम करना पड़ रहा है।

जबकि शहरी मज़दूर को हर हफ्ते 49 घंटे काम करना पड़ता है।

स्वरोजगार में लगे शहरी लोग 58 घंटे काम करते हैं।

साथ ही यह कहा गया कि हफ्ते में प्राइवेट नौकरीपेशा लोग 60.3 घंटे काम करते हैं।

इसके अलावे रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत में एक ग्रामीण मजदूर सप्ताह में 48 घंटे काम करता है।

जबकि शहरों में यह समय बढ़कर 56 घंटे हो जाता है।

इससे यह पता चलता है कि ग्रामीण मजदूरों की तुलना में शहरी मजदूर ज्यादा काम करते हैं।

आपको बता दें कि नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन ने ये आंकड़े वर्ष 2017-18 की चार तिमाहियों के दौरान एकत्रित किए थे।

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