क्या लालच के फलों ने 14 लाख रेलकर्मियों को बदहाली के कगार पर ला दिया है

(लेखक: आशीष सक्सेना,वरिष्ठ पत्रकार बरेली)

बिल्कुल ताजा तस्वीर है, आठ जुलाई की सुबह की।

इज्जतनगर रेल मंडल कारखाना के ठीक सामने रोड नंबर छह की समाप्ति से पहले चौराहे की।

चौराहे पर एक लाल कपड़ा, दर्जनभर नीबू, फूटे हुए मुर्गी के अंडे, शीशा, सिंदूर, दस का नया नोट बिखरे पड़े हैं।

यहां से गुजरने वाले इससे बचकर निकल रहे हैं।

पूर्वोत्तर रेलवे के केंद्रीय विद्यालय का रास्ता भी यही है।

इस चौराहे से तीन चार बंगले छोडक़र पूर्वोत्तर रेलवे मजदूर यूनियन (नरमू) का प्रेम कार्यालय है, जिसमें नरमू के केंद्रीय अध्यक्ष बसंत चतुर्वेदी रहते हैं।

उनके बंगले के लगभग सामने एनई रेलवे मेंस कांग्रेस के नेता रजनीश तिवारी का बंगला है।

इन बंगलों के आसपास कई दूसरे बंगले खाली हैं।

आसपास रेलवे के तमाम क्वार्टर भी खाली पड़े खंडहर की शक्ल ले चुके हैं।

हालांकि पूरा क्षेत्र हराभरा है और फलदार वृक्ष भी काफी हैं।

चौराहे पर तंत्र-मंत्र का सामान किसी और ने नहीं, किसी रेल कर्मचारी के परिवार की ओर से ही रखा जाता होगा, क्योंकि वहां गैर रेलकर्मचारी नहीं रहते।

चौराहे पर ये नजारा मैं पिछले तीन साल से तो लगातार देख ही रहा हूं, क्योंकि बेटी को स्कूल छोडऩे का रास्ता यही है।

एक बार तो मैंने एक रेलवे नेता से कहा भी कि रोज दर्जनभर अंडे और दर्जनभर नींबू का सेवन अगर वह परिवार खुद करता तो तीन साल में उन सबकी सेहत बहुत अच्छी हो गई होती।

खैर, इससे भी गंभीर बात है ये है कि  ये सब करने वाला रेल कर्मचारी का परिवार लंबे समय से किसी गंभीर समस्या से जूझ रहा होगा, जिसकी वजह से उसको यही एक रास्ता समझ में आया और लगातार यही कर रहा है।

ऐसी तमाम परेशानियां रेलकर्मियों को हैं, जिनसे रेल यूनियनों को कोई वास्ता नहीं रह गया है। नेता अफसरों की तरह हो चुके हैं।

वे कुछ देखना या सुनना नहीं चाहते, खासतौर पर आम कर्मचारी से दूरी बनाए रखते हैं। उनके दुख-दर्द से कोई लेना देना नहीं।

रेलवे कॉलोनियों में पहले जैसे रौनक नहीं बची है, जहां सामूहिक कार्यक्रम होते थे, बच्चों की चहचहाहट, खुशी और गम में एक परिवार की तरह माहौल। ये सब कोयले का इंजन बदलकर डीजल इंजन आने के बाद से ही शुरू हो गया।

कॉलोनियों की खुशबू ही बदल गई।

फिर भी ये कॉलोनियां शहर और कस्बों के फेफड़े की तरह हैं अपनी हरियाली की वजह से।

इन फेफड़ों को टीबी का रोग यूनियनों ने लगाया, जिन्होंने कर्मचारियों को मजदूर वर्ग की राजनीति से दूर कर दिया।

जैसे-जैसे उनका खुद का धन, वैभव और ऐशोआराम का लालच बढ़ता गया, वैसे-वैसे वे मजदूरों को सिर्फ उन्हीं मुद्दों पर जुटाकर ठंडे हो जाते जिनका मकसद वक्ती तसल्ली और बेहतरी हो सकता है, पीढिय़ों या मजदूर वर्ग के लिए नहीं।

आखिर ये कॉलोनियां खाली क्यों हो गईं। इसका जवाब रेल कर्मचारी दे सकते हैं। सिर्फ एचआरए की खातिर। यूनियनों ने एचआरए के लिए दर्जनों ज्ञापन दिए, विरोध-प्रदर्शन किए, मंडल से लेकर रेलवे बोर्ड तक इसके लिए पैरवी की।

ऐसे अहसान वे श्रमिकों पर लादते हैं आज भी।

क्वार्टर में रहने का किराया कटता है माना तीन सौ रुपये, लेकिन एचआरए हो गया पांच-दस हजार, तो कोई क्यों रहे।

अगला तरीका हुआ कि प्राइवेट कॉलोनी में किराए पर रहे और कुछ बचत करें। सरकार भी यही चाहती थी, जिससे सामूहिकता का बोध और एकता की आसानियां खत्म हो जाएं।

ऐसा हो गया।

अब जो कुछ बचे-खुचे कर्मचारी बचे, वे कब तक रहेंगे, रिटायरमेंट, वीआरएस या सीआरएस मिलने तक।

जो लोग इन क्वार्टरों में रह रहे हैं, उनको खासी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।

क्वार्टरों की हालत खस्ता हो चुकी है और उनकी मरम्मत से न रेल प्रशासन को कोई मतलब है और न ही यूनियनों को। पेयजल लाइन का भी यही हाल है।

सफाई का काम भी अब न के बराबर है, लोग जहां-तहां कूड़ा डंप करने को मजबूर हैं।

बिजली के मामले में बिल्कुल उल्टा हो चुका है।

पहले नजदीकी प्राइवेट कॉलोनियों के लोग रेलवे की चमक देखकर जलते थे और अब क्वार्टरों में रहने वाले रेल कर्मचारियों के परिवारों को भीषण बिजली कटौती का सामना करना पड़ता है।

अधिकांश का तो समय खत्म हो ही चुका है।

अब नई भर्तियां नहीं होना है।

इज्जतनगर रेल कारखाने में जहां कभी 12-14 हजार लोग काम करते थे आज डेढ़-दो हजार भी नहीं बचे।

इनका भी पत्ता काटने के लिए मान्यता प्राप्त यूनियनों की शह पर सालभर रिटायर्ड रेल कर्मचारियों को रखा गया, जिससे ये तो दिखाया जा सके कि वर्क फोर्स भरपूर है, लेकिन उनका पता था कि उत्पादन क्षमता इससे नहीं बढ़ेगी और यही बहाना मिल जाएगा आगे के लिए।

यही हुआ। इस कारखाने में अब सिर्फ वैगन निर्माण का काम बचेगा, कोच संबंधी काम खत्म हो जाएगा। हरी ड्रेस में ठेके के मजदूर आ भी गए जो 250-300 रुपये की दिहाड़ी पर काम कर रहे हैं।

पहले से मौजूद स्थायी युवा कर्मचारियों का तबादला अन्य जगहों पर करने की योजना बन रही है।

आखिरकार इस पूरी प्रक्रिया से होना क्या है। गौर से देखिए, इन दिनों सभी जगह रेलवे अभी भूमि को संरक्षित करने का काम कर रही है।

दीवार या एंगल से घेरकर।

जो कॉलोनियां कभी बाहर जंगल में थीं, आज बेशकीमती हो चुकी हैं। इनका निजी हाथों में आने का मतलब है, खरबों का कारोबार।

यहां पूरा शहर बस सकता है, मल्टीस्टोरी बिल्डिंग और मॉल।

लेकिन जो नहीं बचेगा वो होगी हरियाली, सामूहिकता और एकता।

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