सीवरों, और सेप्टिक टैंकों में हमें मारना बंद करो’ (भाग-1)

By राजकुमार तर्कशील

(सफ़ाई कर्मचारियों की भयावह स्थिति को लेकर सरकारें कितनी गंभीर हैं ये गटर में होने वाली मौतों से पता चलता है। आज़ादी के बाद से देश की एक बड़ी आबादी को किस तरह गुलामी जैसी स्थिति    यों में जाना पड़ रहा है, इसकी पड़ताल करती हुई लेखों की शृंखला की ये पहली कड़ी पढ़िए।)

लगातार होती मौतें

पिछले वर्ष दिल्ली के मोती नगर में सेप्टिक टैंक की सफाई करने के दौरान 5 मजदूरों की मौत हो गई।

गौरतलब है कि 5 मजदूरों की यह मौत ना तो किसी मीडिया की कवरेज बनी और ना ही किसी राजनीतिक दल के लिए विमर्श बनी।

लेकिन यह घटना कोई पहली घटना नहीं थी और आखरी भी नहीं।

स्थान अलग अलग हो सकते हैं, लेकिन घटना में एक समानता है- बगैर किसी सुरक्षा के नालों और सेप्टिक टैंक में सफाई करने की मजबूरी।

मानव मल उठाना, मैला प्रथा राष्ट्रीय शर्म  है।

लेकिन सफाई कर्मचारियों पर बने आयोग के हवाले से बताया गया है कि हर साल देश के अलग-अलग हिस्सों में 22,000 से अधिक लोग सीवर सफाई के दौरान मर रहे हैं।

यह तो सरकारी आंकड़ा है, दरअसल सीवर की सफाई के दौरान मरने वालों की संख्या हमेशा विवादित रही है। इन ‘हत्याओं’ को लेकर पूरे देश में आंदोलन भी होते रहे हैं।

10 दिसंबर 2015 को डिब्रूगढ़ से शुरू होकर, दिल्ली पहुंची सरकारी सफाई कर्मचारी आंदोलन की अगुवाई में निकली भीम यात्रा का विशेष फोकस सीवर एवं सेप्टिक टैंकों में होने वाली मौतों पर था।

इसका प्रमुख नारा था- ‘सूखे संडासों, सीवरों, और सेप्टिक टैंकों में हमें मारना बंद करो।’

bhim yatra @abhishek kumar
भीम यात्रा। फ़ोटो साभारः अभिषेक कुमार
तारिख़ पर तारीख़़

लेकिन मैला प्रथा का अंत अब तक क्यों नहीं हो पाया? अब तक  यह प्रथा क्यों बनी हुई है? जबकि हमारा संविधान हर नागरिक के सम्मान की बात करता है।

मैला ढोने की प्रथा खत्म करने से जुड़़ा पहला कानून 1993 में आया था जिसके अनुसार, हाथ से सफाई करने वाले कामगारों के रोजगार एवं शुष्क शौचालय निषेध अधिनियम के तहत मैला ढोने की प्रथा और सूखी लैट्रिन को प्रतिबंधित कर दिया गया था।

विडंबना यह है कि इस अधिनियम में मैला ढोने वालों की परिभाषा स्पष्ट नहीं थी। इसमें खाली शुष्क शौचालयों के साफ करने वालों को शामिल किया गया था।

अधिकारियों के बचाव का रास्ता छोड़ दिया गया, अधिनियम के अध्याय 4 अनुच्छेद 14 में सज़ा का प्रावधान है, लेकिन आज तक किसी को कोई सज़ा नहीं मिली।

सरकार  की गंभीरता देखिए 5 जून 1993 को एंप्लॉयमेंट ऑफ मैन्युअल स्कैवेंजर्स एंड कंस्ट्रक्शन आफ ड्राई लैट्रिन प्रोहिबिशन एक्ट पारित हुआ, लेकिन भारत के राजपत्र में 1997 तक प्रकाशित नहीं हो पाया।

2000 तक किसी राज्य ने  इसकी घोषणा नहीं की थी। इससे संबंधित संसद में 2013 में एक और अधिनियम पारित किया गया।

2013 का क़ानून

इसके अनुसार नाले, नालियों, सेप्टिक टैंक की सफाई के लिए रोजगार या ऐसे कामों के लिए लोगों  की सेवा लेना भी प्रतिबंध कर दिया गया।

हाथ से सफाई करने वाले मज़दूरों के रोज़गार एवं उसके पुनर्वास संबंधित अधिनियम 2013 में सफाई कर्मियों को पहचानने और उनके पुनर्वास करने, उनको वैकल्पिक रोजगार देने पर जोर दिया गया।

इसमें उन मजदूरों को भी हाथ से मैला साफ़ करने वालों की श्रेणी में रखा गया जो सीवर टैंक या रेलवे की पटरियां साफ करते हैं।

इसके अलावा मार्च 2014 में सर्वोच्च न्यायालय ने सफाई कर्मचारी आंदोलन और अन्य बनाम भारत संघ में अपने फैसले में मैला ढोने की प्रथा को संविधान के अनुच्छेद 14, 17, 21 और 23 के ख़िलाफ़ बताया था।

ये भी पढ़ेंः नहीं रुक रही सफाईकर्मियों की मौत, दिल्ली में फिर 2 की मौत

(शेष अगली कड़ी में पढ़िए…)

(लेखक हरियाणा के रहने वाले हैं। स्वेच्छा से पत्रकारिता के छात्र हैं और सामाजिक बदलाव के मुद्दों पर लिखते हैं।)

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