माइक्रोमैक्स मज़दूरों की जीत, गेट से हटाने का स्टे खारिज़, धरना 140वें दिन भी जारी

रुद्रपुर, उत्तराखंड के सिडकुल क्षेत्र की माइक्रोमैक्स कंपनी के गेट पर 140 दिनों से धरने पर बैठे मज़दूरों को हटाने की अपील को कोर्ट ने खारिज कर दिया है।

भगवती प्रोडक्ट्स (माइक्रोमैक्स) प्रबंधन द्वारा अस्थाई निषेधाज्ञा के आदेश में संशोधन करने लिए प्रार्थना पत्र दिया गया था, जिसमें उन्होंने फैक्ट्री गेट से 500 मीटर का स्टे देने की पुनः अपील की थी।

इससे पहले भी कंपनी द्वारा न्यायालय से स्टे की अपील को मज़दूरों के पक्ष में खारिज कर दिया गया था.

कंपनी गेट पर लगातार 140 वें दिन भी धरना जारी है।

इस बीच अन्य कंपनी के मज़दूर भी धरना स्थल पर पूरी शिफ्ट के साथ जाकर संघर्ष को समर्थन दे रहे हैं।

एक झटके में निकाला था 300 मज़दूरों को

सिडकुल की कई यूनियनों ने समर्थन में धरने में शामिल होने का साप्ताहिक दिन तय कर दिया है, इससे प्रतिदिन लगातार मज़दूरों की भागीदारी बनी हुई है।

ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता मुकुल के अनुसार, मज़दूरों की इस बिरादराना एकजुटता और आर्थिक सहयोग देने से संघर्ष और मज़बूत हुआ है।

गौरतलब है कि औद्योगिक क्षेत्र सिडकुल स्थित भगवती प्रोडक्ट्स लिमिटेड (माइक्रोमैक्स) के 303 मज़दूरों को एक झटके में बाहर कर दिया गया था।

प्रबंधन, इस माह बार-बार अवकाश घोषित करके गुपचुप रूप से कंपनी की मशीनें शिफ्ट करने में जुटा रहा।

बीते साल 29 दिसम्बर की सुबह जब मजदूर कंपनी गेट पहुंचे तो उन्हें वहां दो नोटिसें चस्पा मिलीं- एक, 8 जनवरी 2019 तक सवेतन अवकाश के संबंध में और दूसरी, 303 परमानेंट मज़दूरों की सेवा समाप्ति के संबंध में।

प्रबंधन ने इसकी कोई भी अनुमति सरकार से नहीं ली, जबकि श्रम विभाग ने छुट्टी के लिए अनुमति लेने को ज़रूरी नहीं बताया था।

micromax rudrapur @Pramod Kumar Fulara

यूनियन बनाने की कोशिखों पर बदले की कार्रवाई

बार-बार बंदी के बीच 29 दिसंबर को श्रमिकों ने प्रदर्शन किया था और कुमाऊं कमिश्नर की जनसुनवाई में जाकर अपनी शिकायत दर्ज करवाई थी।

मज़दूरों को कंपनी बंद होने का आभास पहली बार तभी हो गया था जब जब ज़िला अधिकारी उधम सिंह नगर ने कहा कि नेतागिरी के कारण कंपनियां यहां से जा रही हैं, माइक्रोमैक्स और कुछ और कंपनियां जाने वाली हैं।

यानी जिला प्रशासन को ये बात पता थी कि कंपनी शिफ्ट होने वाली है, फिर भी कोई कार्रवाई नहीं की गई।

गौरतलब है कि मजदूरों ने अपनी यूनियन गठित की थी और उसके पंजीकरण के लिए श्रम विभाग में आवेदन किया था, जहां वेरिफिकेशन भी हो चुका था।

लेकिन श्रम विभाग तीन महीने तक यूनियन की फाइल दबाए रखा, इसी बीच मौका पाकर प्रबंधन ने मजदूरों की छँटनी कर दी।

औद्योगिक क्षेत्रों में ये एक रवायत सी बनती जा रही है कि यूनियन बनाने की कोशिश होते ही अगुवा मज़दूरों और उनके समर्थकों को छंटनी के बहाने बाहर कर दिया जाए।

सरकारी छूट पाने का हथकंडा

मजदूरों का आरोप है कि ज्यादातर कंपनियां राज्य से सब्सिडी और टैक्स की छूट खा-पचाकर, मजदूरों के पेट पर लात मारकर एक राज्य से दूसरे राज्य भाग जाती हैं।

नई जगह नई सब्सिडी व टैक्स का लाभ उठाने और सस्ते दर पर नए मजदूर भर्ती कर अपना काम आगे बढ़ाती हैं।

और यह सब कुछ सरकार, श्रम अधिकारियो व पुलिस-प्रशासन की मिलीभगत से होता है।

माइक्रोमैक्स में अधिकतर श्रमिक या तो डिप्लोमा होल्डर हैं या बीटेक इंजीनियर, जो 10 से 12 हजार रुपये की मामूली पगार पर काम कर रहे हैं।

छँटनी के शिकार सभी मज़दूर कम से कम 5 साल से काम कर रहे थे।

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