माइक्रोमैक्स मजदूरों का संघर्ष 200 दिन बाद भी लगातार जारी

उत्तराखंड के पंतनगर में स्थित भगवती प्रोडक्ट्स लिमिटेड माइक्रोमैक्स कंपनी के खिलाफ मज़दूरों का संघर्ष 200 दिन बाद भी लगातार जारी है।

दरअसल पिछले साल 27 दिसंबर 2018 को प्रबंधन ने 303 मज़दूरों की गैरकानूनी छंटनी कर कंपनी को राज्य से बाहर ले जाने की कोशिश की, जिसके बाद माइक्रोमैक्स के मजदूरों ने पिछले 200 दिनों से विरोध प्रदर्शन जारी रखा है।

माइक्रोमैक्स के कर्मचारी सूरज सिंह का कहना है कि जहां एक तरफ मज़दूर तमाम कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं।

वहीं राज्य की भाजपा सरकार, शासन-प्रशासन, श्रम विभाग और पुलिस द्वारा कंपनी मालिकों को संरक्षण देने की पूरी कोशिशें की जा रहीं हैं।

19 जुलाई को समस्त यूनियनों की बैठक

प्रबंधन की लाख कोशिशों के बावजूद भी कंपनी गेट पर मज़दूरों का धरना प्रदर्शन पिछले 200 दिनों से दिन-रात जारी है, इतना ही नहीं पिछले 22 दिनों से यहां क्रमिक अनशन भी चल रहा है।

तो दूसरी तरफ कानूनी लड़ाई भी जारी है।

वहीं इस आंदलोन को तेज करने के लिए श्रमिक संयुक्त मोर्चा के अध्यक्ष दिनेश तिवारी, नेस्ले के चंद्र मोहन लखेड़ा, वोल्टास के मनोज आदि ने माइक्रोमैक्स के मजदूरों के साथ 19 जुलाई को समस्त यूनियनों की बैठक करने का निर्णय लिया है।

आपको बता दें कि छँटनी की सूची में शामिल ना होने के बावजूद भी माइक्रोमैक्स में काम करने वाले भगवती श्रमिक संगठन के अध्यक्ष सूरज सिंह बिष्ट की ग़ैरकानूनी गेट बंदी कर दी और बाद में कथित रूप से निलंबित भी कर दिया।

प्रबंधन कर रही सौतेला व्यवहार

गौरतलब है कि लगातार मज़दूरों और श्रम अधिकारों पर हमले होने से देश के कोने कोने में आंदोलन उभर रहे हैं।

कई जगहों पर मज़दूरों के महीनों से प्रदर्शन करने के बाद भी प्रशासन और प्रबंधन के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही हैं।

ऐसे में ट्रेड यूनियनों को सोचना होगा कि इन सैकड़ों दिनों के विरोध प्रदर्शन से आगे की रणनीति क्या होगी।

आपको बता दें कि चेन्नई के असाही वर्कर महीनों से प्रदर्शन कर रहे हैं।

साथ ही सोनीपत मुर्थल के बडवाइज़र कंपनी के मज़दूरों के धरना प्रदर्शन को भी 500 दिन पूरे हुए हैं।

1500 दिनों से रिटायर्ड आर्मी के जवान ओआरओपी की मांग को लेकर जंतर मंतर पर धरने पर बैठे हैं।

आज देश के कोने-कोने में मजदूरों की जो हालत बद से बदतर होती जा रही है लेकिन प्रशासन अपने कानों में रूई डाले बैठी है।

अब वक्त है कि मज़दूरों के अधिकारों के लिए ट्रेड यूनियनें एकता स्थापित करें और एक समग्र लड़ाई की रूपरेखा तैयार करें।

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