मोजर बेयर कर्मचारियों ने किया बीजेपी कैंडिडेट का बहिष्कार

इनकम टैक्स के छापे के बाद चर्चा में आयी ग्रेटर नोएडा की कंपनी मोजर बेयर के कर्मचारियों  से वर्कर्स यूनिटी की ओर से बात की नित्यानंद गायेन ने।

पिछले हफ्ते आयकर के छापे के बाद चर्चा में आयी ग्रेटर नोएडा के उद्योग विहार के प्लाट नं 66 में स्थित मोजर बेयर कंपनी जो मुख्य रूप से सी.डी व डी.वी.डी का उत्पादन करती थी।

इस कम्पनी को वर्ष 2017 में बिना किसी कारण बताए मैनेजमेंट ने गैर कानूनी तरीके से बंद कर दिया गया, जिस कारण कंपनी में काम कर रहे लगभग 3,000 कर्मचारी बेरोजगार हो गए।

लॉकआउट के बाद उन कर्मचारियों को ग्रेच्युटी पीएफ आदि का बकाया कुछ नहीं दिया गया। मज़दूर पूछ रहे हैें कि आखिर अब उनका क्या होगा?

वे कई सालों से इस कंपनी में काम कर रहे थे और अचानक बेरोजगार हो गए।

2011 से ही कर्मचारियों का उत्पीड़न

कंपनी के सेक्रेटरी डोरा सिंह ने बताया कि सन् 2011 में मैनेजमेंट द्वारा कर्मचारियों पर अत्याचार शुरू हो गए थे। आये दिन यह अत्यचार बढ़ता जा रहा था।

धीरे-धीरे मैनेजमेंट ने बस सेवा, मेडिकल सेवा जैसी सुविधाओं को खत्म कर दिया।

कंपनी के निदेशक दीपक पुरी और अनिता पुरी ने मज़दूरों पर जबरदस्ती हड़ताल करने का झूठा आरोप लगाया।

डोरा सिंह के मुताबिक, जबकि मजदूरों का कहना है कि वह सभी 4 तारीख को ड्यूटी पर मौजूद थे।

कारखाने में घुसने के लिए जब उन्होंने गेट खोलने की कोशिश की तो मजदूरों को अंदर नहीं जाने दिया गया।

मोजर बेयर के एक कर्मचारी अजित सिंह ने कहा कि 11 अप्रैल को इस इलाके में लोकसभा के पहले चरण का चुनाव है।

उन्होंने कहा कि इस बार मोजर बेयर से जुड़े मज़दूर परिवारों को एक शख्स भी इस बार बीजेपी को वोट नहीं देगा।

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कंपनी के गेट के सामने प्रदर्शन करते मोजर बेयर के कर्मचारी। फ़ोटोः डोरी सिंह
बहाने से मज़दूरों को बाहर निकाल दिया

मैनेजमेंट ने सुप्रीम कोर्ट का हवाला देते हुए हॉल चेंज के बहाने से मज़दूरों को कंपनी से बाहर निकाल दिया।

मज़दूर यूनियन अपनी समस्या को  लेकर डी.एल.सी, डी.एम, सी.एम योगी आदित्यनाथ के पास गए पर उनकी तरफ से ऐसा कोई भी कदम नहीं उठाया गया।

उनकी सरकार से शिकायत है कि मजदूरों के हित में कोई सम्मानजनक व कोई राहत देने वाला निर्णय नहीं लिया गया।

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काफ़ी संघर्ष के बाद लॉकआउट के ख़िलाफ़ मज़दूरों को आंशिक सफलता मिली। फ़ोटोः डोरी सिंह
आत्मदाह की कोशिश

मोजर बेयर के कर्मचारी प्रदीप नागर बताते हैं कि जब मज़दूर सी.एम. योगी आदित्यनाथ के पास अपनी समस्या को लेकर गए, तो उन्होंने एक आदेश पास किया जिसमें 180 दिन में कोई भी कंपनी तालाबंदी नहीं कर सकती, यह गैरकानूनी है।

इस आदेश को लेकर जब मजदूर कंपनी में पंहुचे तो डी.एम. ने उस आदेश का पालन नहीं किया।

उसके बाद क्षेत्रीय सासंद डॉ. महेश शर्मा के घर के आगे 15 दिन की हड़ताल के बाद भी मज़दूरों के हित में कोई कदम नहीं उठाया गया।

अंत में यूनियन के 2,280 मजदूर डी.एम. के आवास के सामने  धरने पर बैठे गए।

कई मज़दूरों ने आत्मदाह की कोशिश की। शासन पर न्याय को लेकर दबाव बना उसके बाद कंपनी का ताला खोला गया।

नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल में आवेदन

वहीं मोजर बेयर यूनियन के प्रेसिडेन्ट महेश शर्मा बताते हैं कि मज़दूर यूनियन ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल में आवेदन दर्ज कराया।

31 जनवरी 2018 को कोर्ट के द्वारा तालाबंदी को गैरकानूनी करार दे कर उसे काम बहाल किए जाने का तथा कर्मचारियों को काम पर वापस लेने का ऑर्डर दिया।

यूनियन प्रेसिडेन्ट कहते हैं कि मेरे अनुसार यह बीजेपी सरकार की एक सोची समझी राजनीति थी। क्योंकि वह मजदूरों के हित में काम करना ही नहीं चाहती थी।

जब कोर्ट द्वारा लॉकआउट को गैरकानूनी करार दिया गया उसके बाद उन्होंने अपनी इज्ज़त बचाने के लिए अगले दिन शासनादेश जारी करा दिया।

वो कहते हैं, “जबकि माननीय योगी जी से हमारी 25 दिसंबर को दूसरी मुलाकात हुई थी! यदि सरकार को कानूनी तौर पर ये काम करना ही था तो 31 जनवरी तक का इंतजार क्यों किया गया।”

वो कहते हैं कि यह प्रश्न चिन्ह् है, उसके बाद जब कंपनी से लॉकआउट हटा लिया ।

मज़दूरों का कहना है कि इस आदेश पर भी यहां की  मैनेजमेंट ने बड़े ही शातिराना अंदाज़ में इलाहाबाद हाईकोर्ट से स्टे ले लिया।

18 महीनों में 2 बार वेतन मिला

यूनियन पदाधिकारियों का कहना है कि हमने तीन पेशियों में पहुंचे और लॉकआउट को भी हटाया गया लिहाजा हम लड़ते रहे।

मजदूरों को 1 सितंबर 2017 से अब तक कोई वेतन नहीं मिला और कोर्ट में एप्लिकेशन दायर करने के बाद में केवल 15,000 एक बार और 17,000 एक बार, टोटल 32,000 रु. मिले यानी पिछले 18 महीनों में केवल 2 बार वेतन मिला है ।

यूनियन प्रेसिडेंट का कहना था, “आप समझ सकते हैं कि आज के समय में लगभग 18,000 रु एक परिवार में महीने का खर्च होता है।”

“ऐसे में हमारे मजदूर साथी किस तरह अपनी जीवन याचिका चला रहे होंगे और किस तरह हमारे बच्चे शिक्षा ले पा रहे हैं इसका दुख दर्द कोई नहीं समझ सकता।”

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लॉकआउट से 12 मज़दूरों की मौत

महेश शर्मा करते हैं कि लगभग 12 मज़दूर इस घटना से आहत होकर के अब इस दुनिया में नहीं रहे। दुख कि बात यह है कि आज भी यह संघर्ष जारी है।

क्योंकि मजदूर अपने हक के लिए कितना भी लड़ ले, लेकिन उद्योगपतियों के सामने टिकने की हिम्मत मजदूरों में नहीं है।

मजदूरों का हक उन्हें तभी मिलेगा जब मज़दूर वर्ग एकजुट होकर अपने हक के लिए आवाज़ उठाएंगे।

रमेश कुमार वर्मा अपनी पीड़ा को बताते हुए कहते हैं कि आज डेढ़ साल बीत गया है पर मजदूरों के हित के लिए किसी भी सरकार ने कुछ नहीं किया।

हमने मदद के लिए इतनी गुहार लगायी पर किसी भी तरह की कोई मदद नहीं मिली।

आज मज़दूर भूखे मर रहे हैं पर मजदूरों के लिए कोई भी शुभचिंतक फैक्ट्री तक नहीं आया।

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कोई नहीं आया मज़दूरों के हक़ में

सरकार की नीति होनी चाहिए मज़दूर को बचाने के लिए क्या किया जाए लेकिन ये सोचने वाला न आज देश का नेता है, न ही कोई बुद्धिजीवी लोग इसके लिए कुछ कदम उठाना चाहते हैं ।

यदि कोई कुएं में गिर जाए तो मीडिया वाले तथा तमाम राजनेता आ जाते हैं। ख़बर कवर करने की होड़ लग जाती है।

वर्मा कहते हैं कि ‘लेकिन यहां 3000 मजदूर भूखे मरने के कगार पर हैं लेकिन हमें पूछने वाला कोई नहीं है।’

(नित्यानंद से बातचीत के आधार पर ख़बर लिखी है शोभा मेहता ने।)

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