अभिजीत बनर्जी की प्रयोगशाला से निकली है गैस सिलेंडर बांटने, खाते में पैसा जमा करने की नीति

(भारतीय मूल के अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी को अर्थशास्त्र में इस साल का नोबल पुरस्कार दिया गया है। चूंकि वो जेएनयू से पढ़े हैं और कुछ उस समय वाम छात्र आंदोलन में सक्रिय थे इसलिए उन्हें लेकर सोशल मीडिया पर एक बाइनरी खड़ी हो रही है या तो विरोध में या उनके पक्ष में। विरोधी उनकी विचारधारा और मौजूदा मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों की आलोचना के लिए उनकी लानत मलानत कर रहे हैं जबकि समर्थक वाम आंदोलन के गढ़ कहे जाने वाले जेएनयू की साख़ का हवाला दे गौरवान्वित हो रहे हैं। लेकिन उनके कामों पर छिटपुट ही टिप्पणियां आई हैं। ऐसे में मुकेश असीम की टिप्पणी से सहमत असहमत हुआ जा सकता है लेकिन इस पर भी ग़ौर फ़रमाना मज़दूर वर्ग के लिए बेहद ज़रूरी है। सं.)

By मुकेश असीम

20 चूहे लो, 10 को प्रयोग वाली ‘दवा’ दो, 10 को दवा के नाम पर बस मीठी गोली या शरबत।

जिन्हें मीठी गोली दी जाती है उन्हें कंट्रोल समूह कहते हैं। कुछ दिन बाद तुलना कर दवा का असर देखा जाता है। इसे कहा जाता है रैंडम कंट्रोल ट्रायल्स (आरसीटी)।

अभिजीत बैनर्जी ने एमआईटी में ‘अब्दुल जमील लतीफ़ गरीबी प्रयोगशाला’ में काम करते हुये गरीबों पर ऐसे RCT प्रयोग करने की योजनायें बनाईं।

प्रयोगशाला के बाहर इसके शुरुआती सबसे क़ामयाब प्रयोगकर्ता बांग्लादेश के ग्रामीण बैंक के मोहम्मद युनूस थे जिन्हें बहुत पहले नोबल मिला।

बाद में वो फ्रॉड साबित हो गए और अभी कुछ दिन पहले जेल भी गये।

बेसिक इनकम, डायरेक्ट बेनिफ़िट ट्रांसफ़र है योगदान

स्वयं सहायता समूह (SHG) के ग़रीब सदस्यों को 24-36% के सूदखोर ब्याज वाले माइक्रोफ़ाइनेंस कर्ज़, प्रत्यक्ष लाभ हस्तानांतरण (DBT), मोदी की LPG बाँटने की योजना, बेसिक इनकम योजना आदि सब इन्हीं प्रयोगों के उदाहरण हैं।

कांग्रेस की ‘न्याय’ या मोदी की ‘किसान मानधन’ दोनों DBT के उदाहरण हैं।

गरीबी के लिए कोई शोषणकारी व्यवस्था ज़िम्मेदार नहीं जिसे बदला जाये, इसके बजाय गरीबों पर चूहों की तरह RCT प्रयोग कर पता लगाया जाये कि कौन सी दवा क्या असर करेगी।

यह है अभिजीत बनर्जी का वो महान योगदान जिसके लिए उन्हें अर्थशास्त्र का नोबल पुरस्कार मिला है।

नोबल विजेताओं की गरीबी पर कार्रवाई प्रयोगशाला का भारत में एक प्रसिद्ध प्रयोग उदयपुर का है जिसमें एक छोटे क्षेत्र में बताया गया कि बच्चों के टीकाकरण के साथ 1 किलो दाल भी दी जायेगी।

नतीजा क्या हुआ- इस क्षेत्र में गरीब लोगों ने टीकाकरण अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक कराया। आप इससे गरीबी, सरकारी नीतियों और अर्थशास्त्र के बारे में क्या समझते हैं?

पिछले वर्ष का नोबल टहोका या कुहनी मार सिद्धांत (nudge theory) के लिए दिया गया था, स्वच्छता अभियान जिसका खास उदाहरण है।

स्वच्छता अभियान का आइडिया

इस बार के बजट पूर्व आर्थिक सर्वेक्षण में कुहनी मार सिद्धांत के और व्यापक उपयोग की बात है। ये अलग बात है कि कुहनी मारते-मारते – स्वच्छता अभियान लिंचिंग पर पहुँच चुका है।

ये दो उदाहरण बुर्जुआ आर्थिक जगत में व्यवहारवादी आर्थिक सिद्धांत के नाम से विख्यात धारा के हैं जिसके अनुसार वर्गीय आर्थिक व्यवस्था, उत्पादन संबंध, संपत्ति संबंध, शोषण की दर, राजनीति, आदि का गरीबी से कोई संबंध नहीं।

गरीबी एवं कुपोषण, रोग, बेरोज़गारी, आदि के मूल में लोगों का व्यवहार है। लोगों के ग़लत व्यवहार और आदतों को बदलकर इनमें से बहुत सी समस्याओं का समाधान किया जा सकता है।

अतः ‘कल्याणकारी’ सरकारों को नीतियाँ बनाने से पूर्व ये प्रयोग कर उनके परिणाम देखने चाहिये। स्वच्छता अभियान, स्किल इंडिया, नोटबंदी, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT), किसान मानधन, न्याय, आदि सब ऐसी नीतियों के उदाहरण हैं।

ये न कहें कि बनर्जी बाबू ने नोटबंदी की आलोचना की है क्योंकि इन अर्थशास्त्रियों में भी कई प्रतिद्वंद्वी समूह हैं।

ब्राह्मणवाद कोई अजूबी बात नहीं है, हर स्थान-काल में शोषक व्यवस्थाओं को अपने शासन को चलाने के लिए ऐसे सिद्धांतों की आवश्यकता रहती है।

आधुनिक पूंजीवाद में भी ऐसा श्रम विभाजन मौजूद है – विवि के प्रोफेसर, थिंक टैंक, शोधसंस्थान, पत्रकार, आदि कुछ सही किंतु आंशिक तथ्यों के आधार पर उसके लिए ऐसे मनमोहक सिद्धांत गढ़ने का काम करते हैं जिनके लिए पूंजीपति वर्ग उन्हें उच्च वेतन देता है।

ऐसे सिद्धांतों पर लहालोट लोग

ऐसे ही 1950 के दशक में सिद्धांत आया था कि अब नया पूंजीवाद आ गया है जिसमें शोषण कम हो रहा है और कुल उत्पादन में श्रमिकों का हिस्सा बढ़ रहा है।

असल में विश्वयुद्ध में स्थिर पूंजी के भारी ध्वंस से परिवर्तनशील पूंजी अर्थात श्रमिकों की मांग उस वक्त बढ़ी थी किंतु युद्ध में जवान श्रमिकों की करोड़ों की तादाद में मौत से उनकी पूर्ति घटी थी इसलिए कुछ वर्षों के लिए मजदूरी दर बढ़ गई थी।

पर संशोधनवाद के प्रभाव में वैचारिक रूप से कमज़ोर कम्युनिस्ट आंदोलन पर इसका बहुत प्रभाव पड़ा और बहुतों ने क्रांति-व्रांति छोड़कर बस मजदूरी बढ़वाने को ही लक्ष्य मान लिया क्योंकि अगर बुर्जूआ जनतंत्र में ही मजदूरों का शोषण कम हो रहा है तो सर्वहारा अधिनायकत्व के लिए कठिन संघर्ष क्यों किया जाए?

अभी उन वाम ट्रेड यूनियनों के अधिकांश सदस्य फासिस्टों के साथ खड़े हैं।

अभी भी मार्क्स को न पढ़ने वाले मार्क्सवादी बैनर्जी को पढ़ेंगे (पढ़ने में कोई बुराई भी नहीं, मुग्ध हुये बिना पढ़ा जाए तो!), पूंजीवादी जनतंत्र में अपना विश्वास दृढ़ करेंगे। राजनीतिक लड़ाई और वर्ग संघर्ष की कोई जरूरत है ही कहाँ, चलो गरीब लोगों का व्यवहार बदलें! 

(फ़ेसबुक पेज से साभार।)

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