आज़ादी को याद करतीं चंद कविताएं और नज़्म

(इस तस्वीर में जो दो बच्चे हैं उनमें से एक नौ साल के हैदर ख़ान का नाम असम में चल रहे राष्ट्रीय नागरिक  रजिस्टर यानी एनआरसी के फ़ाइनल ड्राफ्ट में शामिल नहीं किया गया।)

अधिनायक

(कवि- रघुवीर सहाय)

राष्ट्रगीत में भला कौन वह
भारत-भाग्य-विधाता है
फटा सुथन्ना पहने जिसका
गुन हरचरना गाता है।

मखमल टमटम बल्लम तुरही
पगड़ी छत्र चँवर के साथ
तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर
जय-जय कौन कराता है।

पूरब-पच्छिम से आते हैं
नंगे-बूचे नरकंकाल
सिंहासन पर बैठा, उनके
तमगे कौन लगाता है।

कौन-कौन है वह जन-गण-मन-
अधिनायक वह महाबली
डरा हुआ मन बेमन जिसका
बाजा रोज़ बजाता है।

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किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है

(बाबा नागार्जुन)

किसकी है जनवरी,
किसका अगस्त है?
कौन यहाँ सुखी है, कौन यहाँ मस्त है?

सेठ है, शोषक है, नामी गला-काटू है
गालियाँ भी सुनता है, भारी थूक-चाटू है
चोर है, डाकू है, झुठा-मक्कार है
कातिल है, छलिया है, लुच्चा-लबार है
जैसे भी टिकट मिला
जहाँ भी टिकट मिला

शासन के घोड़े पर वह भी सवार है
उसी की जनवरी छब्बीस
उसी का पन्द्रह अगस्त है
बाक़ी सब दुखी है, बाक़ी सब पस्त है…..

कौन है खिला-खिला, बुझा-बुझा कौन है
कौन है बुलन्द आज, कौन आज मस्त है?
खिला-खिला सेठ है, श्रमिक है बुझा-बुझा
मालिक बुलन्द है, कुली-मजूर पस्त है
सेठ यहाँ सुखी है, सेठ यहाँ मस्त है
उसकी है जनवरी, उसी का अगस्त है

पटना है, दिल्ली है, वहीं सब जुगाड़ है
मेला है, ठेला है, भारी भीड़-भाड़ है
फ्र‍िज है, सोफ़ा है, बिजली का झाड़ है
फै़शन की ओट है, सब कुछ उघाड़ है
पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो
मास्टर की छाती में कै ठो हाड़ है!
गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो
मज़दूर की छाती में कै ठो हाड़ है!
गिन लो जी, गिन लो जी, गिन लो
बच्चे की छाती में कै ठो हाड़ है!
देख लो जी, देख लो जी, देख लो
पब्लिक की पीठ पर बजट पर पहाड़ है!

मेला है, ठेला है, भारी भीड़-भाड़ है
पटना है, दिल्ली है, वहीं सब जुगाड़ है
फ़्रि‍ज है, सोफ़ा है, बिजली का झाड़ है
महल आबाद है, झोपड़ी उजाड़ है
ग़रीबों की बस्ती में

उखाड़ है, पछाड़ है
धत तेरी, धत तेरी, कुच्छो नहीं! कुच्‍छो नहीं
ताड़ का तिल है, तिल का ताड़ है
ताड़ के पत्ते हैं, पत्तों के पंखे हैं

पंखों की ओट है, पंखों की आड़ है
कुच्छो नहीं, कुच्छो नहीं…..
ताड़ का तिल है, तिल का ताड़ है
पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है

किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है!
कौन यहाँ सुखी है, कौन यहाँ मस्त है!
सेठ ही सुखी है, सेठ ही मस्त है
मन्त्री ही सुखी है, मन्त्री ही मस्त है
उसी की है जनवरी, उसी का अगस्त है!

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कौन आज़ाद हुआ

(अली सरदार जाफ़री)

किसके माथे से गुलामी की सियाही छुटी
मेरे सीने मे दर्द है महकूमी का
मादरे हिंद के चेहरे पे उदासी है वही
कौन आज़ाद हुआ ?

खंज़र आज़ाद है सीने मे उतरने के लिए
वर्दी आज़ाद है वेगुनाहों पर जुल्मों सितम के लिए
मौत आज़ाद है लाशों पर गुज़रने के लिए
कौन आज़ाद हुआ ?

काले बाज़ार मे बदशक्ल शैतानों की तरह
क़ीमतें काली दुकानों पर खड़ी रहती है
हर ख़रीदार की जेबों को कतरने के लिए
कौन आज़ाद हुआ ?

कारखानों मे लगा रहता है
साँस लेती हुई लाशों का हुजूम
बीच मे उनके फिरा करती है बेकारी भी
अपने खूंखार दहन खोले हुए
कौन आज़ाद हुआ ?

रोटियाँ चकलों की कहवाये हैं
जिनको सरमाये के दलालों ने
नफ़ाख़ोरी के झरोखों में सजा रखा है
बालियाँ धान की गेंहूँ के सुनहरे गोशे
मिस्रो यूनान के मजबूर गुलामो़ं की तरह
अजनबी देश के बाज़ारों मे बिक जाते हैं
और बदबख़्त किसानों की तड़पती हुई रूह
अपने अल्फ़ाज़ में मुंह ढांप के सो जाती है

कौन आजाद हुआ ?

महकूमी – शोषण, दहन – जबड़ा,
सरमाए – पूंजी, गोशे – किनारे या कोने,
बदबख़्त – बुरी हालत, अफलास – गरीबी

(इस नज़्म में एक शब्द को बदलकर शैतानों किया गया है, मुआफ़ी के साथ।)

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सुब्ह-ए-आज़ादी (अगस्त-47)

(फ़ैज़ अहमद फ़ैज़)

ये दाग़ दाग़ उजाला ये शब-गज़ीदा सहर

वो इंतिज़ार था जिस का ये वो सहर तो नहीं

ये वो सहर तो नहीं जिस की आरज़ू ले कर

चले थे यार कि मिल जाएगी कहीं न कहीं

फ़लक के दश्त में तारों की आख़िरी मंज़िल

कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त-मौज का साहिल

कहीं तो जा के रुकेगा सफ़ीना-ए-ग़म दिल

जवाँ लहू की पुर-असरार शाह-राहों से

चले जो यार तो दामन पे कितने हाथ पड़े

दयार-ए-हुस्न की बे-सब्र ख़्वाब-गाहों से

पुकारती रहीं बाहें बदन बुलाते रहे

बहुत अज़ीज़ थी लेकिन रुख़-ए-सहर की लगन

बहुत क़रीं था हसीनान-ए-नूर का दामन

सुबुक सुबुक थी तमन्ना दबी दबी थी थकन

सुना है हो भी चुका है फ़िराक़-ए-ज़ुल्मत-ओ-नूर

सुना है हो भी चुका है विसाल-ए-मंज़िल-ओ-गाम

बदल चुका है बहुत अहल-ए-दर्द का दस्तूर

नशात-ए-वस्ल हलाल ओ अज़ाब-ए-हिज्र हराम

जिगर की आग नज़र की उमंग दिल की जलन

किसी पे चारा-ए-हिज्राँ का कुछ असर ही नहीं

कहाँ से आई निगार-ए-सबा किधर को गई

अभी चराग़-ए-सर-ए-रह को कुछ ख़बर ही नहीं

अभी गिरानी-ए-शब में कमी नहीं आई

नजात-ए-दीदा-ओ-दिल की घड़ी नहीं आई

चले-चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई।

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