अबसे बंधुआ मज़दूरी, बाल मज़दूरी, ठेका मज़दूरी, ओवरटाइम सब क़ानूनी होगा

By आकृति भाटिया

मोदी सरकार ने इस संसद सत्र में मज़दूर विरोधी दो क़ानून पास करा लिए हैं, एक है वेज कोड और दूसरा ऑक्युपेशनल सेफ़्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशन।

वेज कोड तो उस दिन पारित किया गया जिस दिन संघ की मज़दूर यूनियन बीएमएस को छोड़ सभी ट्रेड यूनियनों ने देशव्यापी विरोध प्रदर्शन आयोजित किया था।

ट्रेड यूनियनों का कहना है कि 44 श्रम क़ानूनों को ख़त्म कर मोदी सरकार चार लेबर कोड ला रही है। श्रम क़ानूनों के एक्सपर्ट का कहना है कि ये सब मज़दूरों नहीं मालिकों के हित में किया गया।

श्रम क़ानूनों में बदलाव का असर पड़ेगा आईए इस पर एक नज़र दौड़ाते हैं।

जो राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम वेतन सेट किया जाएगा उसे किस आधार पर तय किया जाएगा, उसका कोई ज़िक्र नहीं किया गया है। मसलन क्या उसमें खाना, पोषण, परिवहन, स्वास्थ्य शिक्षा का ख़र्चा भी कैसे निकल पाएगा?

इसी वेज कोड के तहत श्रम मंत्री संतोष गंगवार की ओर से 178 रुपये दिहाड़ी की तर्कहीन और भुखमरी वाली फ़्लोर वेज क्या प्रस्ताव आता है जिसके चलते राज्य सरकारें न्यूनतम वेतन को बढ़ाने की बजाय उसे पिछले रास्ते और नीचे ले जाने की कोशिश करेंगी।

मालिक पगार दे या न दे, उसकी मर्ज़ी

इन कोड्ज़ के अनुसार, 95% से अधिक मज़दूर  जो असंगठित क्षेत्र में या लघु उद्योगों में आते हैं, वो अन्य कानूनों से बाहर बाहर हो जाएंगे।

उदाहरण के लिए ऑक्युपेशनल सेफ़्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशन के तहत सिर्फ़ 10 से अधिक मज़दूरों को रोज़गार देने वाले उद्योगों पर ही ये लागू होगा।

ग़ौरतलब है कि लघु उद्योगों में ही सबसे ज़्यादा घटनाओं का डर होता है, और उन्हें इन तमाम सुरक्षाओं की और भी ज़रूरत पड़ती है।

सीवर साफ़ करने में लगे मज़दूर इसका सटीक उदाहरण हैं। यानी इस कोड के साथ ही उऩ्हें सुरक्षा उपकरण मुहैया कराना मालिक के अनिवार्य नहीं होने पर भी चलेगा

अगर मालिक कि तरफ़ से पगार न मिले या और कोई अन्याय हो, तो मज़दूर कोर्ट का दरवाज़ा खटखटा सकता था और मालिक को कठोर सज़ा हो सकती थी।

अब ऐसा करना बहुत ही मुश्किल हो चुका है, मालिकों को काफ़ी ढील मिल चुकी है। सुधर जाने के नाम पर उन्हें लम्बा समय मिलेगा और सज़ा से वो बच निकलेंगे।

सुप्रीम कोर्ट के 1982 के एक ऑर्डर के बाद से पगार ना देना एक अपराध था लेकिन अब सैलरी न देना कोई अपराध नहीं होगा।

आठ घंटे काम के अधिकार का ख़ात्मा

ठेका प्रथा को तो समाप्त करने के बजाए, एक तरह से बढ़ावा दिया जा रहा है और इसे वैध कर दिया गया है।

अगर ठेकेदार भाग जाए या वेतन देने से इंकार कर दे तो, तो मुख्य मालिक पर पगार चुकाने का कोई ख़ास दबाव नहीं दिया जा सकेगा।

फिर एडवांस देकर मज़दूरी कराना बंधुआ मज़दूरी का एक बहुत क्रूर रूप है। खुद सुप्रीम कोर्ट ने इसे बंधुआ मज़दूरी से जोड़ कर देखा है। लेकिन अब मालिकों को ये छूट दी जा रही है कि वो एडवांस देकर मज़दूरों को काम पर रख सकते हैं।

मजबूर प्रवासी मज़दूर अक्सर एडवांस के चपेट में मजबूरन मालिक की ग़ुलामी की स्थिति में आ जाते हैं। और इस प्रथा को अब कानूनी मान्यता देने जा रही है सरकार।

दिन में 8 घंटे की शिफ़्ट, जिस अधिकार के लिए विश्व भर में कई मज़दूरों ने शहादत दे दी, अब  इसे ख़त्म कर दिया गया है। क्योंकि नए कानून में ओवरटाइम को नियम बनाया गया है और मज़दूर को अलग अलग बहानों से निचोड़ने की तरकीबें आप इस कोड में पा सकते हैं।

जिन 44 श्रम कानूनों को ख़त्म किया गया है उनमें बोनस ऐक्ट भी है। हालांकि नए कानून में बोनस को लेकर कुछ बातें कही गई हैं लेकिन मूल लब्बो लुबाव यही है कि मालिक चाहे तो बोनस नहीं भी दे सकता है।

अब खुल्लम खुल्ला होगी बाल मज़दूरी

इस कानून के आने के बाद कौन मालिक चाहेगा कि वो मज़दूरों को बोनस दे।

सबसे सस्ते में श्रम करवाने की कुंजी भी इसी कोड में देखने को मिलती है जब अप्रेंटिस को मज़दूर की श्रेणी से हटा दिया जाता है।

जबकि उससे वो सारे काम भी कराए जाते हैं जो एक परमानेंट वर्कर या ठेका मज़दूर करता है।

और तो और सस्ती मज़दूरी के लिए इस कोड ने तब सारी हदें पार कर दीं जब बाल श्रम को भी वैध क़रार कर दिया। इसके तहत 15 साल से नीचे के कर्मी को भी एक “मज़दूर” का दर्जा दिया गया है।

ऐसा नहीं है कि ये प्रथाएँ पहले से चल नहीं रही थीं, बल्कि पिछले पाँच सालों में इनमें तेज़ी आई है, लेकिन अंतर यह है कि अब इन्हें क़ानूनी व काग़ज़ी तौर पर इन्हें लागू कर दिया जा रहा है।

तो क्या इसे लेबर कोड की बजाय मालिक कोड नहीं कहना चाहिए?

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One thought on “अबसे बंधुआ मज़दूरी, बाल मज़दूरी, ठेका मज़दूरी, ओवरटाइम सब क़ानूनी होगा

  • August 7, 2019 at 1:50 pm
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    Koi ni sunda kisi ki tuhade cho sadi contractor 7000 salery de reha govt to 15000 pass hoyi ha labour code wale v aye c ik war oh v paise khake chup ho gye garib bnde ki koi ni sunda sab iko jaise he ha

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