कश्मीर में हज़ारों मज़दूर फंसे, नज़रबंद लाखों मेहनतकश जनता की आजीविका छिनी

अनुच्छेद 370 और 35 ए ख़त्म करने के साथ ही पूरे जम्मू कश्मीर में कर्फ्यू लगने के बाद कश्मीर की मेहनतकश आबादी और बाहर से वहां काम करने गए मज़दूर कर्मचारियों की हालत बेहद ख़राब हो गई है।

इंटरनेट सेवाएं, टेलिविज़न, रेडियो पूरी तरह ब्लैक आउट कर दिए गए हैं। एक तरह से पूरे जम्मू कश्मीर और लद्दाख इलाक़े में सन्नाटा छाया हुआ है।

मोदी सरकार के इस फैसले से जहां पूरा जम्मू कश्मीर एक तरह से नज़रबंद है वहीं उत्तर भारत के यूपी, बिहार, असम, झारखंड से गए मज़दूर भी फंस गए हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के अनुसार घाटी में काम ठप होने की वजह से बस स्टैंडों पर घर जाने का इंतज़ार करने वाले मज़दूरों की भीड़ लगी हुई है।

दरअसल एक बार फिर सरकार ने परिणामों का ख्याल किए बिना ही विवादास्पद फैसला सुना दिया लेकिन उस समय सरकार ने उन मज़दूरों और कर्मचारियों का जरा भी ख्याल नहीं रखा जो देश के कोने कोने से आकर यहां काम कर रहे थे।

इन सब के बाद ट्रेड यूनियनों ने सरकार के इस फैसले की निंदा की है और पूरे देश में वामपंथी संगठनों और कुछ मुख्य धारा की पार्टियों ने इसका जमकर विरोध किया है।

बीजेपी की सियासी चाल में पिसते मज़दूर

ट्रेड यूनियनों का आरोप है कि रोज़गार देने में विफल मोदी सरकार ने पूंजीपतियों के पक्ष में कई श्रम क़ानूनों को ख़त्म करके दो लेबर कोड संसद से पास कराया और उसके तुरंत बाद कश्मीर के मुद्दे को राजनीतिक हित साधने के लिए सुलगा दिया है।

ये भी दिलचस्प है कि कश्मीर में अनुच्छेद 370 ख़त्म किए जाने के दो दिन बाद ही भारतीय जनता पार्टी ने चार राज्यों में चुनाव के लिए अपने प्रभारियों की घोषणा कर दी, दिल्ली, हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र।

ऐसे में आलोचकों का कहना है कि अनुच्छेद 370 को ख़त्म करना बीजेपी की सियासी चाल है और इसके चलते जम्मू कश्मीर और देश के बाकी हिस्से की मज़दूर आबादी को पिसना पड़ रहा है।

लद्दाख क्षेत्र में झारखंड के रहने वाले लाखों मजदूर में हड्डी कंपा देने वाली ठंड में यहां काम कर रहे थे लेकिन सरकार के फैसले के बाद उनकी आजीविका पर संकट छा गया है।

सरकार के इस फैसले के बीच इस देश की मेहनतकश आबादी और मज़दूर वर्ग की बात दब कर रह गई है। भारतीय मीडिया में भी इस इस फैसले को आक्रामक तरीक़े से सही ठहराया जा रहा है और और मज़दूरों की बातों पर ख़बर तक नहीं दी जा रही है। ऐसे में मीडिया संस्थानों की ईमानदारी पर भी सवाल उठता है कि आखिर ये मीडिया किसकी सेवा कर रहा है?

दरअसल खबर ये भी है कि कश्मीर से बाहर रहने वाले कश्मीरी मेहनतकश आबादी अपने घर पर संपर्क नहीं कर पा रही है क्योंकि सारी लैंडलाइन और इंटरनेट सेवाएं पूरी तरह से बंद कर दी गई हैं।

हज़ारों मज़दूरों की आजीविका छिनी

शुरू से ही शासक वर्ग का हर फैसला मजदूर वर्ग के खिलाफ ही जाता है, ठीक इसी तरह कश्मीर पर मोदी सरकार के फैसले का दंश मज़दूर झेलने पर पर मजबूर है।

दुखद बात तो ये है कि मज़दूर वर्ग के कुछ लोग भी इस फैसले का समर्थन कर रहे हैं, बिना ये जाने समझे कि आखिर सरकार के इस फैसले से भारत के मज़दूर वर्ग पर क्या असर पड़ेगा?

अब तो पाकिस्तान ने भी कड़े तेवर दिखाए हैं और भारत के साथ व्यापारिक रिश्ता ख़त्म करने की घोषणा कर दी है जिससे सीमापार होने वाला व्यापार आने वाले कई महीनो तक ठप रहने वाला है।

इस व्यापार से अपनी आजीविका कमाने वाले कश्मीरी मज़दूर कंगाली की स्थिति तक पहुंच जाएंगे। वाघा बार्डर से होने वाले व्यापार में भी बड़ी संख्या में हिंदुस्तान और पाकिस्तान के मज़दूरों को काम मिलता है, और वो सब ठप होने की आशंका है।

गौर करने वाली बात ये है कि इस फैसले से पाकिस्तान और कश्मीर के ही नहीं बल्कि भारत के मज़दूर वर्ग पर भी भारी असर पड़ने वाला है।

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