आख़िर खुल गई सत्तापक्ष विपक्ष की मज़दूर विरोधी पोल

शर्मनाक : मोदी सरकार की तानाशाही

आख़िरकार सरकार ने मज़दूरों के देशव्यापी प्रदर्शन के दिन ही वेज कोड को राज्यसभा से भी पास करा लिया।

सरकार मज़दूरों के ख़िलाफ़ श्रम क़ानूनों में बदलाव लाने को लेकर इतना निश्चिंत है कि पूरे देश में मज़दूरों के विरोध प्रदर्शन का भी कोई असर नहीं पड़ा।

यहां तक कि प्रदर्शन करने पहुंचे मज़दूरों को संसद मार्ग से पहले ही रोक दिया गया, जहां आम तौर पर हर छोटे बड़े प्रदर्शनों की बेरोक टोक इजाज़त होती है।

दो अगस्त को ही राज्यसभा में वेज कोड यानी मज़दूरी संहिता विधेयक 2019 पर बहस हुई। इसे लोकसभा में 30 जुलाई को ही पारित कर दिया गया था।

इस प्रकार मजदूर विरोधी इस विधेयक पर संसद की पूरी मुहर लग गई है और क़ानून बनने से ये एक क़दम दूर है।

मोदी सरकार के कार्यकाल में हो रहे मज़दूर विरोधी फैसले

राज्यसभा में इस विधेयक को सेलेक्ट कमेटी में भेजे जाने की वाम दलों की मांग को सरकार ने खारिज कर दिया और विधेयक को स्थाई समिति के पास भेज दिया। अब केवल राष्ट्रपति की मुहर ही लगनी बाकी है।

यह पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान मिले प्रचंड बहुमत का ही कमाल है कि मोदी सरकार ने 2 महीने के कार्यकाल के दौरान एक के बाद एक ताबड़तोड़ मजदूर विरोधी फैसले ले रही है।

दरअसल, देसी विदेशी पूंजीपतियों ने भारी चंदा देकर इसीलिए मोदी की सरकार दोबारा बनवाई है।

और अब मोदी सरकार बेखौफ होकर पूँजीपतियों का कर्ज़ उतारने में पूरी ताक़त से जुट गई है।

मोदी सरकार का यह कदम मजदूरों को अधिकार विहीन बंधुआ मजदूर बनाने की दिशा में एक कड़ी भर है।

90 फ़ीसदी मेहनतकश आबादी होगी प्रभावित

मोदी सरकार के हौसले तो बुलंद हैं लेकिन विपक्ष भी मज़दूरों के अधिकारों को लेकर एक आपराधिक उदासीनता से भरा हुआ है।

इसका उदाहरण है कि जब राज्य सभा में इस अहम विधेयक पर चर्चा हो रही थी तो सदन में कुछ चंद सदस्य ही बैठे नज़र आए।

जबकि इस विधेयक से देश की 90 फ़ीसदी मेहनतकश आबादी पर असर पड़ने जा रहा है।

जिन सदस्यों ने इस विधेयक पर बोला वो भी संदर्भ से बिल्कुल अलग था।

ये साफ़ था कि कोई भी सदस्य तैयारी करके नहीं आया था। बल्कि ऐसा लग रहा था कि ये बिल क्या है, क्या असर पड़ेगा, इसके बारे में किसी को कोई अंदाज़ा नहीं ही है।

संसद में उन लोगों पर चुटकियों में फैसला हो रहा है जो इस देश की जीडीपी में 60 प्रतिशत से भी ज़्यादा योगदान करते हैं।

नीति निर्माता और सरकार ने मज़दूरों को निराश ही नहीं किया है बल्कि उनके ख़िलाफ़ पहले से चले आ रहे युद्ध को और तेज़ करने पर मुहर लगाई है।

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