क्या रेलवे के निजीकरण से पहले जानलेवा राष्ट्रवादी साजिशों का दौर चला

(by आशीष सक्सेना,वरिष्ठ पत्रकार बरेली)

निगमीकरण के बहाने निजीकरण की पटरी पर दौड़ाने से पहले रेलवे में भी ‘राष्ट्रवादी साजिशों’ का छौंका खूब लगा।

 किराए तो खूब बढ़ाये गए पर हिफाजत का बंदोबस्त नहीं

मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में रेलवे की व्यवस्थाओं को पहले आधुनिक बनाने का ‘स्वांग’ रचा गया।

मसलन, ऐसी खबरें अक्सर मीडिया में आने लगीं- ‘रेलमंत्री को एक ट्विट पर मिला रेल यात्री को इलाज’, ‘ठीक हो गए एसी’ बगैरा।

बेहतरी के बहाने रेलवे के किराए कई बार बढ़ाए गए लेकिन यात्रियों की हिफाजत का बंदोबस्त नहीं किया गया।

होता भी कैसे, संरक्षा के लाखों पदों को भर्ती करने की मंशा नहीं थी और निजीकरण के रास्ते भी खोलने थे।

नतीजतन, एक के बाद एक भीषण रेल दुर्घटनाओं का सिलसिला चल पड़ा।

कुछ अंतराल तो ऐसा बीता कि लगभग हर दूसरे दिन किसी दुर्घटना की खबर आती जिसमें दर्जनों मौतें और घायलों की सूचनाएं होतीं।

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 दुर्घटना के कारण पर पर्दा डालने की कोशिश

दुर्घटना के कारण पर पर्दा डालने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  शिगूफा छोड़ा और उन्होंने कहा कि ये आतंकी साजिश की वजह से हो रहा है।

मीडिया भी चुपचाप इसी लाइन पर चल पड़ा किसी ने सच को जानने की ज़हमत नहीं उठाई।

हर दुर्घटना में आमतौर पर ट्रैक से पैंड्रोल क्लिप न होने का कारण बताया जाने लगा, कि साजिशन उनको निकाला गया है, इसके पीछे आतंकी हाथ होने की आशंकाओं पर समाचार बनाकर ताने जाने लगे।

जबकि हकीकत ये थी कि ट्रैक पेट्रोलिंग गैंग, ट्रैकमैन आदि की कमी से निगरानी टूट चुकी थी और पैंड्रोल क्लिप चोरी हो रहे थे।

जो स्टाफ था भी, उसमें से ज्यादातर को रेल अफसरों ने अपनी खिदमत में लगा रखा था।

यात्रियों का भरोसा रेल पर कम होने लगा तो सरकारी कर्मचारियों की काहिली और लापरहवाही का चिरपरिचित आरोप भी लगाया जाने लगा, जिससे निजीकरण को जायज ठहराया जा सके।

जबकि हकीकत ये है कि सार्वजनिक संपत्ति और यात्रियों की जान से जानबूझकर खेला गया।

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53 प्रतिशत दुर्घटनाएं  का कारण ट्रेन का पटरी से उतरना

रेलवे अधिकारियों के अनुसार, पिछले पांच सालों में लगभग 600 रेल हादसे हुए। इनमें से करीब 53 प्रतिशत दुर्घटनाएं ट्रेन के पटरी से उतरने की वजह से हुईं।

भारत में 2014-15 में 131 रेल हादसे हुए और इसमें 168 लोग मारे गए।

2013-14 में 117 ट्रेन हादसे हुए और इसमें 103 लोग मारे गए।

2014-2015 में 60 फ़ीसदी रेल दुर्घटना ट्रेनों के पटरी से उतरने के कारण हुईं।

1956 से 66 के बीच 1,201 रेल हादसों में 962 दुर्घटना पटरी से उतरने के कारण हुईं।

20 नवंबर 2016 को उत्तर प्रदेश में कानपुर के पास इंदौर-पटना एक्सप्रेस का पटरी से उतर जाना रेलवे के लिए सबसे भयानक दुर्घटना है।

कानपुर के बाहरी इलाके में पुखरायां स्टेशन से छूटने के तुरंत बाद यह ट्रेन पटरी से उतर गई थी।

इस रेल दुर्घटना में 150 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 150 से अधिक लोग घायल हो गए थे।

यह दावा किया जाता है कि दुर्घटना रेलवे लाइन टूटने और ट्रेन में अधिक भीड़ होने के कारण हुई थी।

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आतंकी साजिश का राग अलापकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ा

उज्जैन ट्रेन ब्लास्ट के बारे में बताया गया कि आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट 3 मार्च 2017 को ट्रेन पर कम तीव्रता वाले विस्फोटक से हमला कर दिया, इस दुर्घटना में आठ लोग घायल हो गए थे।

सरकार ने आतंकी साजिश का राग अलापकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया।

आतंकवाद निरोधक दस्ते और जाने कौन-कौन सी एजेंसियां इस काम में लगाकर लोगों में भ्रम पैदा किया गया।

भारत में अधिकांश रेल दुर्घटनाएं पटरियों के क्षतिग्रस्त होने और अत्यधिक भीड़ के कारण ट्रेनों के पटरियों से उतरने के कारण होती हैं।

कुछ ट्रेनों के गुजरने के बाद, रेल लाइन (पटरियों) की दरारें फ्रैक्चर में बदल जाती हैं।

जिसके कारण ट्रेनें पटरी से उतर जाती हैं और इससे जानमाल का भारी नुकसान होता है।

पर्याप्त संरक्षा रेल कर्मचारी हों तो इन दुर्घटनाओं से बचा जा सकता था।

कई बार रेलवे कर्मचारियों की लापरवाही रेल दुर्घटनाओं और मौतों का मुख्य कारण बनती हैं।

रेलवे कर्मचारी शॉर्टकट पर ध्यान नहीं देते हैं या सुरक्षा नियमों और दिशानिर्देशों का पालन नहीं करते हैं।

ज्यादा समस्या उपकरणों खराबी, टूट-फूट, डिब्बों में अधिक भीड़, पुराने डिब्बे हैं।

कई आकस्मिक कारक रेल दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं।

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राष्ट्रवादी तड़के के पीछे निजीकरण का तानाबाना बुना गया

इसी पर्दे में निजीकरण का तानाबाना बुन गया और दुर्घटनाएं रोकने के लिए ट्रैक मेंटीनेंस नहीं बल्कि सौदा करने के लिए ब्लॉक लिए जाने लगे, जो अभी भी जारी हैं।

मतलब, सरकारी धन से लाइनें ठीक की जा रही हैं और कुछ स्टेशनों को सुंदर बनाया जा रहा है या बना दिया है।

ये पूरी दुकान बेचने के लिए सजाई गई है।

ये साफ सिग्रल है, जहां भी बेहतर होता स्टेशन और ट्रैक मिले, समझ लो सौदा हो गया या होने वाला है।

इस रहस्य को छुपाकर इसमें भी ‘राष्ट्रवादी तडक़ा’ लगाया जा रहा है।

जैसे, पूर्वोत्तर रेलवे के इज्जतनगर मंडल में इज्जतनगर स्टेशन काफी खूबसूरत ही नहीं, आधुनिक बंदोबस्त भी किए गए हैं।

स्वचालित सीढिय़ां, दोनों ओर से सर्कुलेटिंग एरिया, पार्किंग की व्यवस्था के अलावा ट्रैक क्लियर भी किया जा रहा है।

स्टेशन के दोनों ओर रेलवे क्रॉसिंग है, जिनको बंद करने के लिए एक ओर फ्लाईओवर बन चुका है और दूसरी ओर निर्माणाधीन है, अंडरपास भी बन रहा है।

इस ट्रैक का इस्तेमाल भविष्य में पूर्वोत्तर राज्यों से माल की आवाजाही का सीधा रास्ता तैयार करना है।

निजी कंपनियों को संचालन के वक्त बाधाओं का सामना न करना पड़े और भरपूर मुनाफा बटोरें इसलिए ऐसा कमोबेश सभी जगह किया जा रहा है।

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