रेलवे का राष्ट्रीयकरण-निजीकरण एक ही नीति के दो चेहरे, ब्रिटेन का उदाहरण सामने है

By मुकेश असीम

कुछ ‘विशेषज्ञ’ सलाह दे रहे हैं कि अब तो संसद में जोरदार बहुमत है, अब मोदी जी को मारग्रेट थैचर से प्रेरणा लेनी चाहिए। थैचर ब्रिटेन की लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहीं।

बात ब्रिटेन की है पर कहानी सारी दुनिया की है। ब्रिटेन में मारग्रेट थैचर के ज़माने में रेल का निजीकरण हुआ, अब उसी कंज़रवेटिव पार्टी की टेरीज़ा मे सरकार उसका वापस राष्ट्रीयकरण कर रही है।

जब निजीकरण हुआ तो बनी-बनाई रेलवे लाइनें, रेलगाड़ियाँ और पूरा ढांचा निजी क्षेत्र को बिना इकन्नी खर्च हुए मिला, उन्हें बस सालाना शुल्क देना था।

उन्होंने कुछ साल में ही भाड़ा तीन गुना बढ़ा दिया, पर उन्हें हमेशा ‘घाटा’ ही होता रहा! सरकार उन्हें और रियायतें देती रही, पर घाटा होता रहा, भाड़ा भी बढ़ता रहा।

पर कमाल की बात ये कि वे घाटे के बावजूद भी ‘देशसेवा’ में रेल को चलाते रहे और इतने घाटे के बावजूद भी निजी क्षेत्र के मालिक और भी दौलतमंद बनते गए।

इन्हीं मालिकों में से एक रिचर्ड ब्रांसन हैं, जिनकी वर्जिन एयरलाइन और मीडिया प्रिय हरकतों के बारे में भारत में भी बहुत से लोग वाक़िफ़ हैं।

ब्रांसन की कंपनी भी लंदन से लीड्स, न्यूकैसल, ग्लासगो की पूर्वी तटीय रेल को ‘घाटे’ में चलाती रही और ब्रांसन ‘घाटे’ में रहते हुए भी ज़मीन से आसमान में नए-नए कारोबार शुरू करता रहा और अमीर बनता गया।

ब्रांसन का खेल

कुछ दिन पूर्व अचानक ब्रांसन ने ऐलान कर दिया कि अब उसे और घाटा बर्दाश्त नहीं इसलिए अब वह शुल्क नहीं दे सकता। तो सरकार ने क्या किया?

आज उस कंपनी का राष्ट्रीयकरण हो गया – कंपनी को उसकी सारी देनदारियों (यानी कर्ज़े) समेत सरकार ने ले लिया, यहाँ तक कि कंपनी के सारे प्रबंधक उन्हीं पदों और वेतन पर बने रहे।

कुल मिलाकर कहें तो जब तक कारोबार में दिखावटी घाटे के बावजूद मलाई मौजूद थी, कंपनी निजी रही; जब मलाई खत्म हुई और असली वाला घाटा शुरू हुआ तो घाटे का ‘राष्ट्रीयकरण’ कर दिया गया!

कमाल की बात यह कि लंदन से बर्मिंघम, मैंचेस्टर, लिवरपुल की पश्चिम तट रेल भी ब्रांसन की ही दूसरे नाम की कंपनी के पास है, पर उसका राष्ट्रीयकरण नहीं हुआ, क्योंकि ब्रांसन ने उसे चलाने से मना नहीं किया (वहाँ अभी मलाई की गुंजाइश बाकी है!)।

सरकार इशारे समझती है

यानी कौन कंपनी निजी रहे, किसका राष्ट्रीयकरण हो यह तय ब्रांसन कर रहा है, सरकार सिर्फ फैसले पर अमल कर रही है!

यही पूंजीवाद में निजीकरण -राष्ट्रीयकरण की नीति का मूल है – जब पूँजीपतियों को निजीकरण से लाभ हो तो सरकारें प्रतियोगिता को प्रोत्साहन देने लगती हैं; जब पूँजीपतियों को राष्ट्रीयकरण में फ़ायदा दिखे तो सरकारें ‘समाजवाद’ और ‘कल्याण’ की बातें करने लगती हैं।

दुनिया भर के संसदीय वामपंथी इसे ही ‘शांतिपूर्ण रास्ते से समाजवाद’ की ओर अग्रसर होना बताकर वाह-वाह में जुट जाते हैं।

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