इतिहास के झरोखे से-9 : पश्चिम बंगाल में दमन और उत्पीड़न के खिलाफ मजदूर वर्ग का प्रतिरोध

By सुकोमल सेन

(‘इतिहास के झरोखे से’, यानी लेखों की एक ऐसी शृंखला जिसमें मज़दूर आंदोलन के इतिहास का कोई पन्ना हमारे सामने खुलेगा। आज पढ़िए  नवीं कड़ी में, पश्चिम बंगाल  के मजदूर वर्ग ने  सरकार द्वारा किए गए दमन व उत्पीड़न का किस प्रकार विरोध किया?)

निरंतर आगे बढ़ रहे मजदूर वर्ग के संघर्षों का मुकाबला करने के लिए सरकार ने दमनकारी उपायों का सहारा लेकर उसे भयाक्रांत करने का प्रयास किया।

पुलिस और अर्धसैनिक बलों का प्रयोग, ट्रेड यूनियनों नेताओं की गिरफ्तारी, उन पर प्रिवेंटिव डिटेंशन ऐक्ट और मेंटेनेस आफ इटंरनल सिक्योरिटी ऐक्ट लगाना और एकदम सेवामुक्त करना आदि दमन के तरीके अपनाए गए।

जैसे-जैसे मजदूर वर्ग का आंदोलन जुझारू रूप लेता गया, विशेषरूप से पश्चिम बंगाल सरकार ने निरंतर आगे बढ़ रहे मजदूरों से निपटने के लिए पूर्ण दमनकारी तंत्र झोंक दिया।

उदाहरणस्वरूप जब हिंदुस्तान स्टील इंपलाइज यूनियन द्वारा दुर्गापुर के स्टील उद्योग में हड़ताल की गई, तो इस सिटी का पूरा नगर क्षेत्र पुलिस और सी.आर.पी. की हथियार बंद छावनी में बदल  गया।

13 नेताओं को धारा 311(2) के तहत नौकरी से निष्कासित

इस आम हड़ताल के समाप्त होते ही थोड़े दिन बाद राज्य कर्मचारी आंदोलन के शीर्षस्तर के 13 नेताओं की निरंकुशतापूर्वक उत्पीड़न करने के खिलाफ एक और आम हड़ताल आयोजित हुई।

वेस्ट बंगाल गवर्नमेंट इंपलाइज एसोसिएशन एंड यूनियन्स की समन्वय समिति के पदाधिकारी और राज्य कर्मचारी आंदोलन के शीर्ष 13 नेताओं को 13 सितंबर 1971 को संविधान की धारा 311(2) सी के तहत अभियोग लगाकर, अत्यधिक गैर जनतांत्रिक तरीके से अचानक सेवा मुक्त कर दिया गया।

उनको आत्मरक्षा में कोई भी दलील प्रस्तुत करने का अवसर नहीं दिया गया।

राष्ट्रपति शासन के दौरान इन नेताओं को नौकरी से निष्कासित किए जाने से राज्य कर्मचारियों और आम मजदूरों में व्यापक रोष व्याप्त हो गया।

काम रोको आंदोलन की घोषणा

वेस्ट बंगाल गवर्नमेंट इंपलाइज एसोसिएशन एंड यूनियन्स की समन्वय समिति के नेताओं के नौकरी से निष्कासन के खिलाफ कर्मचारियों ने काम रोको आंदोलन की घोषणा कर दी।

यह काम रोको आठ दिन तक चलता रहा। इस निरंकुश निर्णय के खिलाफ विरोध प्रदर्शित करने के लिए सीटू ने सभी केंद्रीय ट्रेड यूनियन से आम हड़ताल करने का प्रस्ताव रखा।

कुछ ट्रेड यूनियन द्वारा आपत्तियां उठाने से काफी हिचकिचाहट के बावजूद सीटू की पहलकदमी पर 13 अक्टूबर 1971 को हड़ताल का आह्वान किया गया।

हड़ताल के इस आह्वान को यू.टी.यू.सी., राष्ट्रीय संग्राम समिति और किसी भी केंद्रीय ट्रेड यूनियन से अलग 12 जुलाई को निर्मित पश्चिम बंगाल की विभिन्न यूनियनों के मंच ने समर्थन किया।

देश के सभी हिस्सों में वेस्ट बंगाल डे  लागू

यद्यपि एक अतिरिक्त वक्तव्य के जरिए थोड़ी देर से यू.टी.यू.सी. (लेलिन सारिणी), एटक ने भी समर्थन किया। लेकिन एच.एम.एस. और इंटक ने हड़ताल का विरोध किया।

बड़ी संख्या में पुलिस और सीआरपी को हड़तालियों के खिलाफ लगाने, शासक पार्टी द्वारा घोषित गुंडों द्वारा विभिन्न कारखानों और उद्योगों में मजदूरों पर हमला करने के बावजूद प्रबल विरोध के रूप में हड़ताल सफल रही।

इसी बीच ऑल इंडिया स्टेट गवर्नमेंट इंपलाइज फेडरेशन ने इस निष्कासन के खिलाफ पूरे भारत के सभी राज्य के कर्मचारियों से दो घंटे के लिए काम रोको आंदोलन का आह्वान किया। जिसे वेस्ट बंगाल डे के रूप में मनाया गया।

देश के सभी हिस्सों में वेस्ट बंगाल डे को सफलतपूर्वक लागू किया गया।

(सुकोमल सेन की किताब ‘भारतीय मज़दूर वर्गः उद्भव और आंदोेलन का इतिहास’ से साभार। टंकण- शोभा मेहता)

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