रॉयल एनफ़ील्ड संघर्षः 40 मज़दूरों को बर्ख़ास्त किया, 3 यूनियन नेताओं का ट्रांसफ़र

चेन्नई के पास रॉयल एनफ़ील्ड के ओरागडम प्लांट का प्रबंधन 16 फरवरी को 10 दिनों की हड़ताल पर जाने वाले 500 कर्मचारियों को सबक सिखाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रहा है।

ये मज़दूर यूनियन बनाने और उसे मान्यता देने की मांग को लेकर हड़ताल पर गए थे।

प्रबंधन की कार्रवाईयों का खामियाज़ा भुगत रहे यूनियन के नेताओं का कहना है कि प्रबंधन ने यूनियन को मान्यता देने से इनकार कर दिया है।

कंपनी सबक सिखाने की मंशा से यूनियन नेताओं को प्रताड़ित कर रही है।

लेबर न्यूज़ नामके फ़ेसबुक पेज चलाने वाले राजावेलु के अनुसार, ‘रॉयल एनफ़ील्ड एम्प्लाईज़ यूनियन’ पंजीकृति हो चुकी है।

यूनियन के सूत्रों के अनुसार, लेकिन कंपनी ने इसके जनरल सेक्रेटरी को दूसरे प्लांट में ट्रांसफ़र कर दिया गया है।

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40 कर्मचारी बर्खास्त, 3 यूनियन पदाधिकारी ट्रांसफ़र

यूनियन के सदस्यों का कहना है कि इस तरह की डराने वाली रणनीति के कारण ही कर्मचारियों को हड़ताल पर जाने का अंतिम सहारा लेने को मजबूर किया गया था।

न्यूज़ क्लिक ने एक वर्कर से हवाले से कहा है, “हमने 12 फरवरी को प्रबंधन को हड़ताल का नोटिस दिया था और उसी दिन, प्रबंधन ने उन श्रमिकों को धमकी देना शुरू कर दिया जो यूनियन की गतिविधियों के अगुवा थे।”

उस वर्कर ने कहा, “पहले भी वर्करों ने स्थाई किए जाने की मांग को लेकर संघर्ष किया था।”

उनके अनुसार, “जब हम इस आश्वासन के बाद ड्यूटी पर लौटे कि हमारी मांगें पूरी होंगी तो हमें प्रबंधन के निर्देश पर पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ा, हालांकि हमारा विरोध शांतिपूर्ण था।”

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श्रमिकों ने बताया कि प्रबंधन द्वारा आश्वासन दिए जाने पर उन्होंने हड़ताल खत्म कर दी, लेकिन अब लगभग 40 कर्मचारियों को बिना कारण बताओ नोटिस के बर्खास्त किया जा रहा है।

यूनियन के तीन पदाधिकारियों, जिनमें महासचिव भी शामिल हैं, को राजस्थान और पश्चिम बंगाल में ट्रांसफ़र किया जा रहा है।

सीटू के कांचीपुरम जिला सचिव ई.मुथु कुमार ने कहा, “क्षेत्र में काम करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियां ट्रेड यूनियनों के गठन को स्वीकार करने से कतराती हैं।”

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अभी पिछले साल ही हुई थी 50 दिन लंबी हड़ताल

वो कहते हैं, “पिछले साल 50-दिवसीय हड़ताल समाप्त होने के बाद प्रबंधन ने कर्मचारियों को वेतन बढ़ोत्तरी और परमानेंट किए जाने संबंधी मांगों को स्वीकार किया था। लेकिन वो वादे पर टिकी नहीं रहीं।”

अह स्थानांतरित और निलंबित स्थायी कर्मचारी खुद को बहाल किए जाने की संभावनाएं तलाश रहे हैं, जबकि ट्रेनी कर्मचारियों को प्रबंधन की कड़ाई का सबसे अधिक ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ रहा है।

इस सबके बीच, राज्य सरकार मूकदर्शक बनी हुई है।

इस हालात पर टिप्पणी करते हुए यूनियन के एक नेता ने कहा कि स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (एसईज़ेड) में बहुराष्ट्रीय कंपनियां मज़दूरों को बुनियादी अधिकारों से भी वंचित रख रही हैं और उनका शोषण करना जारी रखे हुए हैं।

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