सेफ़्टी कोड बिल में मज़दूरों नहीं मालिकों की सेफ़्टी का ख़ास ख्याल- तीसरी किस्त

(मोदी सरकार 44 श्रम क़ानूनों को ख़त्म कर उनकी जगह चार श्रम संहिताएं या लेबर कोड लाने जा रही है। ये हैं मजदूरी संहिता, औद्योगिक सुरक्षा और कल्याण संहिता, सामाजिक सुरक्षा संहिता और  औद्योगिक संबंध संहिता। इनमें से दो लेबर कोड्स को संसद में पेश भी किया जा चुका है। इसके ख़िलाफ़ ट्रेड यूनियनों ने राष्ट्रीय स्तर पर विरोध करने का फैसला किया है और दो अगस्त को व्यापक धरना प्रदर्शन भी आयोजित किया। संघर्षरत मेहनतकश के संपादक मुकुल नए श्रम क़ानूनों पर लेखों की एक शृंखला लिख रहे हैं, जिसे हम साभार प्रकाशित कर रहे हैं। पढ़िए  तीसरी किस्त। सं. )

By मुकुल

मोदी सरकार ने व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशाओं की श्रम संहिता-2019 द्वारा देश के सभी कार्यबल के लिए सुरक्षा और स्वस्थ कार्य स्थितियों का विस्तार करने के बहाने मज़दूरों पर एक और बड़ा हमला बोला है।

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, यह संहिता व्यावसायिक सुरक्षा के लिए ही है। 44 मौजूदा श्रम क़ानूनों को ख़त्म करके चार संहिताओं की कड़ी में यह बिल 10 जुलाई को केन्द्रीय मंत्रीमण्डल द्वारा पारित होकर 23 जुलाई को लोकसभा में प्रस्तुत हुआ।

संहिता में मज़दूरों के स्वास्थ्य, सुरक्षा कल्याण के दावों के साथ बेहतर कार्य स्थितियों, व्यवसाय की सुगमता, संहिता परिपालन व्यवस्था को एक लाइसेंस, एक पंजीकरण तथा एक रिटर्न के साथ विवेक संगत बनाने, नियोक्ता के संसाधनों और प्रयासों की बचत, श्रमिकों और नियोक्ताओं के बीच संतुलन बनाने आदि द्वारा कुल मिलाकर मालिकों के लाभ और मुनाफे को बढ़ाने की बात लिखी है।

इससे स्पष्ट है कि संहिता मज़दूरों को कुचलकर मालिकों को हर तरीके से लाभ पहुँचाने के लिए बनी है।

जहाँ मालिकों को देने की बारी है, उन क्षेत्रों में 10/20 के दायरे से बढ़ाकर 50 से अधिक वर्कर पर लागू करने की बात की है (औद्योगिक संबंध संहिता)।

लेकिन इस संहिता में 10 या अधिक कर्मचारियों वाले सभी प्रतिष्ठानों पर लागू किया गया है।

इसमें आईटी व सेवा क्षेत्र सहित सभी उद्योग, व्यापार, व्यवसाय और विनिर्माण प्रतिष्ठानों, एक मात्र कर्मी वाले खदानों और गोदी में लागू होगा।

यही नहीं, श्रमजीवी पत्रकारों और सिनेमा कर्मियों की परिभाषाओं के अंदर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कार्यरत श्रमिकों और ऑडियो विजुअल उत्पादन के सभी रूपों को शामिल किया गया है और अंतर-राज्य प्रवासी श्रमिक की परिभाषा को बदल दिया गया है।

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ये श्रम क़ानून हो जाएंगे ख़त्म

13 केंद्रीय श्रम अधिनियम- फैक्ट्री अधिनियम, 1948; खदान अधिनियम, 1952; डॉक वर्कर्स अधिनियम, 1986; भवन और अन्य निर्माण श्रमिक अधिनियम, 1996; प्लांट श्रमिक अधिनियम, 1951; अनुबंध श्रम अधिनियम, 1970; अंतर-राज्य प्रवासी कामगार अधिनियम, 1979; श्रमजीवी पत्रकार और अन्य न्यूज़ पेपर एम्प्लाइज अधिनियम, 1955; श्रमजीवी पत्राकार अधिनियम, 1958; मोटर ट्रांसपोर्ट श्रमिक अधिनियम, 1961; बिक्री संवर्धन कर्मचारी अधिनियम, 1976; बीड़ी और सिगार श्रमिक अधिनियम, 1966 और द सिने वर्कर्स और सिनेमा थियेटर वर्कर्स अधिनियम, 1981 – निरस्त हो जायेंगे।
संहिता में अनुच्छेद की संख्या 622 से घटकर 134 हो गई है।

फोटो साभार गूगल

सेफ़्टी कोड या व्यावसायिक सुरक्षा संहिता में क्या है?

1-विधेयक में कर्मचारी एवं मज़दूर की परिभाषा स्पष्ट नहीं किया गया है। इससे कंपनियों को सीधा लाभ होगा जबकि वेतनभोगी श्रमिकों के अधिकारों का हनन होगा।

2-एक बड़ा हमला काम के मनमाने घण्टों की छूट का है। ‘सरकारी इजाजत’ से मनमाने शिफ्ट ड्यिटी कराने की छूट होगी।

3-सप्ताह में 6 दिन काम की सीमा के साथ यह जोड़ा गया है कि ‘विशेष स्थिति में’ अनुमति लेकर लगातार दिवसों में काम कराया जा सकता है। इस दौरान के साप्ताहिक अवकाश दो माह में कभी देने की छूट होगी। 10 दिन लगातार काम के बाद अवकाश देने की बाध्यता भी खत्म होगी।

4-व्यावसायिक सुगमता के प्रोत्साहन के बहाने विधेयक में अनेक पंजीकरणों के बदले एक प्रतिष्ठान के लिए एक पंजीकरण का प्रस्ताव है। अभी श्रमिक हित के लिए 6 कानूनों के अंतर्गत अलग पंजीकरण की व्यवस्था है।

5-मालिकों की सरलता के लिए पाँच श्रम कानूनों के अंतर्गत अनेक समितियों का स्थान एक राष्ट्रीय व्यावसायिक सुरक्षा तथा स्वास्थ्य सलाहकार बोर्ड लेगा।

6-प्रतिष्ठानों के लाभ के लिए 13 श्रम कानूनों में अनेक लाइसेंसों और रिटर्न के स्थान पर एक लाइसेंस तथा एक रिटर्न के प्रावधान।
वर्तमान में विभिन्न कानूनों में क्रेच, कैंटीन, प्रथम चिकित्सा सहायता, कल्याण अधिकारी जैसे विभिन्न प्रावधानों को खत्म करके कर्मचारियों के ‘कल्याण’ के लिए एक प्रावधान होंगे।

7-नियोक्ता उत्पादकता बढ़ाने के लिए प्रतिष्ठान के निर्धारित आयु के ऊपर के कर्मियों के लिए वार्षिक स्वास्थ्य जांच की सुविधा होगी।

8-प्रबन्धन कम्पनी हित में स्वयं नियम बनाएगा, निर्धरित मानकों का पालन करेगा, स्वयं प्रमाणित करके फैसिलिटेटर को देगा। मज़दूर उन्हीं नियमों को मानने के लिए बाध्य होगा।

9-निरीक्षण व्यवस्था में अनेक परिवर्तन किए गए हैं। इनमें वेब आधारित रेंडम कम्प्यूटरीकृत निरीक्षण योजना, अधिकार क्षेत्र मुक्त निरीक्षण, निरीक्षण के लिए इलेक्ट्रॉनिक रूप से जानकारी माँगना और जुर्मानों का संयोजन आदि शामिल हैं। यानी नियोक्ता को बताकर निरीक्षण होगा।

10-इस संहिता में स्वास्थ्य व सुरक्षा मानकों पर काफी लम्बे-चौड़े प्रावधान किये गये हैं। लेकिन अनुपालन की गारण्टी में काफी झोल है।

11-संहिता में महिलाओं की सुरक्षा के कई दावों के बीच असल में सस्ते श्रम के श्रोत के रूप में उनसे मनमाने काम व शिफ्ट ड्यिटी के रास्ते खुल गये हैं।

12-इसमें सस्ते श्रम के लिए बाल श्रम के लिए भी रास्ता सुगम बनाया गया है।

13-कारखानों में आये दिन दुर्घटनाएं आम बात हैं, जहाँ अंगभंग से लेकर मौत की घटनाएं लगातार घटित होती रहती हैं। लेकिन दुर्घटना मुआवजे से संहिता में मालिकों को भारी राहत दी गयी है।

यहाँ तक कि संसद की प्रवर समिति ने भी दुर्घटना से पीड़ित श्रमिकों के लिये 10 लाख रुपए तक के मुआवज़े की सिफारिश की थी, फिर भी इस विधेयक में महज पचास हज़ार रुपए का प्रावधान किया गया है

13-स्वास्थ्य व सुरक्षा मानकों के उल्लंघन पर विषेष स्थिति में चीफ फैसिलिटेटर जाँच कमेटी बनायेगा, जिसका दर्जा सलाहकार बोर्ड जैसा होगा। रिपोर्ट के आधार पर वो सिर्फ सलाह देगा।

14-फ़ैक्टरी मालिकों पर मज़दूरों की जान से खेलने के लिए दण्ड प्रावधान कमजोर हो जायेगा, जबकि फ़ैक्टरी दुर्घटनाओं और उसमें अपाहिज होने और जान गँवाने वाले मज़दूरों की संख्या में निरन्तर बढ़ोत्तरी हुई है।

15-इंस्पेक्टर के स्थान पर फैसिलिटेटर की नियुक्ति का प्रावधान किया गया है। लेबर इंस्पेक्टर की भूमिका मुख्यतः कंपनियों द्वारा कानून का पालन कराने तथा नियोक्ताओं से कर्मचारियों एवं श्रमिकों के हितों की रक्षा सुनिश्चित करने में निहित होती थी। जबकि अधिकार विहीन फैसिलिटेटर के पद का सृजन वस्तुतः कंपनियों के हितों की सेवा के लिए है।

16-निरीक्षक/फैसिलिटेटर उद्योग की ‘गोपनियता’ को बनाए रखेगा और कोई सूचना बाहर नहीं करेगा। यानी मालिकों की मनमानी पर पर्दा डालेगा।

तो मज़दूरों की गर्दन को काट, मालिकों की सेवा में होगा काम, जय श्री राम!

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