गुजरातः वडोदरा के होटल में टैंक साफ़ करने गए 7 कर्मियों की मौत

गुजरात में बडोदरा के एक होटल के सेप्टिक टैंक की सफाई करने उतरे 7 कर्मचारियों की दम घुटने से मौत हो गई।

मरने वालों में चार सफाई कर्मचारी और तीन होटल के कर्मचारी थे।

पुलिस के मुताबिक, होटल मालिक के ख़िलाफ़ डाभोई पुलिस स्टेशन में केस दर्ज किया गया है।

वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि होटल प्रबंधन ने सेप्टिक टैंक की सफाई के लिए महेश पतनवाड़िया (47), अशोक हरिजन (45), ब्रजेश हरिजन (23), महेश हरिजन (25) को बुलाया था।

चारों एक-एक कर टैंक के अंदर उतरे। काफी देर तक इनमें से कोई बाहर नहीं आया तो मदद के लिए होटल के कर्मचारी विजय चौधरी (22), सहदेव वसावा (22) और अजय वसावा (22) भी नीचे गए और उसमें दम घुटने मौत हो गई।

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टैंक में गैस का दबाव ज्यादा होने से मौत हुईं

किसी के बाहर नहीं निकलने पर प्रबंधन ने डाभोई नगर निगम और पुलिस को सूचना दी। बताया जा रहा है कि निगम के पास ऐसे संसाधन नहीं थे, जिससे टैंक में फंसे लोगों की मदद की जा सके।

इसके बाद दमकल कर्मचारियों को बुलाकर सभी को निकाला गया। दमकल अधिकारी निकुंज आजाद ने बताया कि टैंक में गैस का दबाव ज्यादा होने से इन लोगों की मौत हुई है।

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लगातार जान गंवा रहे सफाई कर्मचारी

आज भी हम गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश व अन्य कई राज्यों में मैला उठाने की प्रथा के कड़वे सच को देख सकते हैं। यहां हर रोज करीब एक सफाई कर्मी गटर में दम तोड़ देता हैं. हालांकि 2017 का सरकारी आंकड़ा 300 मौतों का है. सबसे अधिक मौत तमिलनाडु में होती है जहां अकेले लगभग आधी मौतें दर्ज की गई हैभारत दुनिया का इकलौता देश है जहां सफाई का काम दलितों के हवाले है। 2018 के सर्वे में ये संख्या 53,236 हो गई है। हाध से मैला साफ करने के काम से जुड़े रहने वाले 22,327 सफाई कर्मियों की हर साल जान जाती है।

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बुनियादी सुरक्षा उपकरणों घोर कमी

सफाई कर्मचारियों को सफाई के दौरान बुनियादी सुरक्षा उपकरण भी मुहैया नहीं दिया जाता है, बिना ड्रेस, जूते, मास्क, दस्ताने, के ही सेप्टिक टैंक की सफाई के लिए उनको गटर में उतार दिया जाता है।

जबकि सफाई के दौरान कर्मियों के लिए सुरक्षा सामग्री उपलब्ध कराना अनिवार्य है। यही कारण है कि सफाई कर्मचारियों की मौत की घटनाएं बढ़ रही है।

सफाई कर्मचारी बिना सुरक्षा उपकरण के हाथों से नाले-नालियों की सफाई करते हैं। जिससे सफाई कर्मियों को त्वचा में जलन व एलर्जी जैसे अन्य बिमारीयों का सामना करना पड़ता है।

भाग-2ः भारत सरकार नहीं चाहती हाथ से मैला साफ़ करने की प्रथा बंद हो?

सरकार का दोहरा रवौया

एक तरफ मोदी सरकार स्वच्छ भारत अभियान चला रही हैं। जिसके प्रचार में करोड़ो रुपयें खर्च किए जा रहे है।

वही सफाई कर्मचारी जो इस योजना को धरातल पर लागू करने करने लगे है, जिसके बिना यह योजना को चला पाना ही मुश्किल है।

उनको सफाई के दौरान बुनियादी सुरक्षा उपकरण नसीब नहीं हो रहा है।  बिना उपकरण के ही काम कराया जा रहा है।

यह रवैया सरकार की सफाई कर्मचारियों के प्रति घोर लापरवाही और दोहरी नीति को दर्शाता है।

भाग-3ः मोदी सरकार ने मैला ढोने वालों के पुनर्वास के लिए एक पैसा नहीं जारी किया

आज जब सेटेलाइट राकेट से अंतरिक्ष में युद्ध लड़ने की बात हो रही है। चंद्रयान-2 लांच होने को है और भारत के वैज्ञानिक अंतरिक्ष में भारत का आपना अंतरिक्ष स्टेशन बनाने की योजना पर लगे हैं, ये भरोसा नहीं होता कि सीवर की सफ़ाई से संबंधित तकनीक में वो बहुत कमज़ोर होंगे.

देश भर में बुनियादी उपकरण और प्रशिक्षण की कमी के कारण रोज सैकड़ों सफाईकर्मी दम तोड़ रहे हैं।

सरकारी और समाज की लापरवाही का ही नतीजा है कि कुछ लोग इन मौतों को दुर्घटना की बजाय हत्या कह रहे हैं।

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